सत्य भूषण शर्मा
कुछ व्यक्तित्व केवल अपने समय के नहीं होते, वे आने वाली पीढ़ियों की सांस्कृतिक चेतना बन जाते हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण होता है कि समर्पण, साधना और दूरदृष्टि से कोई भी व्यक्ति अपनी मातृभूमि की लोकधरोहर को विश्व पटल तक पहुँचा सकता है। राजस्थानी लोकसंगीत के ऐसे ही अप्रतिम साधक थे केसरी चंद मालू (के.सी. मालू), जिनके निधन से राजस्थान ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय लोकसंगीत जगत को अपूरणीय क्षति पहुँची है। उनके जाने से मानो लोकधुनों का एक स्वर्णिम युग मौन हो गया।
राजस्थान की पहचान केवल उसके किलों, महलों और मरुस्थल से नहीं, बल्कि उसकी समृद्ध लोकसंस्कृति, लोकगीतों और लोकवाद्यों से भी है। इस सांस्कृतिक धरोहर को घर-घर और देश-विदेश तक पहुँचाने में के.सी. मालू का योगदान अविस्मरणीय रहा। उन्होंने लोकसंगीत को केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे समाज की आत्मा और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज समझा।
व्यावसायिक पृष्ठभूमि से जुड़े होने के बावजूद उनका मन लोककला के संरक्षण में रमा रहा। उन्होंने अपने संसाधनों और समय को राजस्थानी लोकगायकों, वादकों और कलाकारों के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। उस समय जब अनेक लोककलाकार मंच और पहचान के अभाव में गुमनामी का जीवन जी रहे थे, तब के.सी. मालू ने उन्हें अवसर, सम्मान और नई पहचान दिलाने का बीड़ा उठाया।
उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने केवल प्रसिद्ध कलाकारों तक स्वयं को सीमित नहीं रखा, बल्कि गाँव-ढाणियों में छिपी प्रतिभाओं को खोजकर उन्हें रिकॉर्डिंग स्टूडियो, सांस्कृतिक आयोजनों और राष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाया। अनेक ऐसे लोकगायक, जिनका नाम आज सम्मान से लिया जाता है, उनके प्रोत्साहन और संरक्षण के कारण ही व्यापक पहचान प्राप्त कर सके।
के.सी. मालू ने राजस्थानी लोकगीतों के संरक्षण के लिए व्यवस्थित संग्रह, ध्वनि रिकॉर्डिंग और प्रकाशन का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने हजारों लोकगीतों, पारंपरिक धुनों और सांस्कृतिक विधाओं को लुप्त होने से बचाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। यदि यह कार्य समय रहते न हुआ होता, तो हमारी अनेक लोक परंपराएँ इतिहास के पन्नों में खो सकती थीं।
उनकी दृष्टि केवल अतीत को संजोने तक सीमित नहीं थी। वे चाहते थे कि नई पीढ़ी अपनी लोकसंस्कृति से जुड़े, अपनी मातृभाषा पर गर्व करे और आधुनिकता के साथ अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भी सहेजकर रखे। इसी उद्देश्य से उन्होंने अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रमों, कार्यशालाओं और लोकसंगीत आयोजनों को बढ़ावा दिया। उनके प्रयासों ने राजस्थान के लोकसंगीत को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजस्थान सरकार तथा अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं ने समय-समय पर उन्हें विभिन्न सम्मानों से अलंकृत किया। किंतु उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान श्रोताओं का प्रेम, कलाकारों का विश्वास और लोकसंस्कृति की निरंतर सेवा थी। वे सादगी, विनम्रता और कर्मनिष्ठा के ऐसे उदाहरण थे, जिन्होंने कभी प्रसिद्धि को लक्ष्य नहीं बनाया; उनका लक्ष्य केवल लोकधरोहर का संरक्षण था।
आज जब वैश्वीकरण के दौर में लोककलाएँ अनेक चुनौतियों का सामना कर रही हैं, तब के.सी. मालू का जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि यदि समाज अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सहेजने के लिए संकल्पित हो जाए, तो कोई भी विरासत विलुप्त नहीं हो सकती। उनकी कार्यशैली आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक बनी रहेगी।
के.सी. मालू भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी संरक्षित लोकधुनें, उनके द्वारा प्रोत्साहित कलाकार और उनके सांस्कृतिक प्रयास सदैव जीवित रहेंगे। जब भी राजस्थान का कोई लोकगीत गूँजेगा, कोई मांड, पधारो म्हारे देश या पारंपरिक धुन सुनाई देगी, तब उनकी साधना और समर्पण स्वतः स्मरण हो आएगा। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी कि हम अपनी लोकसंस्कृति का सम्मान करें, उसे संजोएँ और अगली पीढ़ी तक उसी गरिमा के साथ पहुँचाएँ।





