सत्य भूषण शर्मा
दुनिया में कुछ वस्तुएँ ऐसी होती हैं जो देखने में साधारण लगती हैं, पर उनके भीतर जीवन के असाधारण संदेश छिपे होते हैं। जूता भी ऐसी ही एक वस्तु है। सामान्यतः हम उसे केवल पैरों की सुरक्षा का साधन मानते हैं, किंतु यदि उसके सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक पक्षों पर विचार करें तो वह एक चलता-फिरता जीवन-दर्शन प्रतीत होता है।
बचपन में जब किसी को कहते सुना कि “जूते ने काट लिया”, तब बड़ा आश्चर्य हुआ। मन में प्रश्न उठा कि क्या जूते के भी दाँत होते हैं? कुछ दिनों बाद किसी को जूते में तेल लगाते देखा तो पता चला कि जूता “चूं-चूं” भी करता है। तब लगा कि यह बोलने की कला भी जानता है।
एक दिन किसी व्यक्ति के बारे में कहते सुना, “वह तो जूतों का यार है।” तब समझ में आया कि जूते मित्रता निभाने में भी पीछे नहीं हैं। बाद में एक बुजुर्ग अपने शरारती पोते को डांटते हुए बोले, “तू तो जूते खाए बिना नहीं मानेगा।” तब लगा कि जूते भोजन की श्रेणी में भी शामिल हो सकते हैं!
हमारे समाज में जूतों का महत्व केवल पैरों तक सीमित नहीं है। किसी को अपमानित करने के लिए जूता दिखाया जाता है तो किसी महान खिलाड़ी को सम्मानित करने के लिए “गोल्डन बूट” प्रदान किया जाता है। एक ही वस्तु परिस्थिति के अनुसार अपमान और सम्मान दोनों का प्रतीक बन जाती है।
कहावतों की दुनिया में भी जूते का विशेष स्थान है। “जूते घिस जाना” अनुभव और परिश्रम का प्रतीक है। “जूते चटकाना” व्यर्थ भटकने का संकेत देता है। “जूते की नोक पर रखना” अहंकार का परिचायक माना जाता है। इन मुहावरों ने जूते को भाषा और साहित्य में स्थायी स्थान दिलाया है।
राजनीति में भी जूतों की अपनी अलग पहचान रही है। कभी-कभी विरोध प्रदर्शन के दौरान नेताओं पर जूते फेंके जाने की घटनाएँ समाचारों की सुर्खियाँ बन जाती हैं। इससे स्पष्ट है कि जूता केवल पहनने की वस्तु नहीं, बल्कि असहमति प्रकट करने का माध्यम भी बन सकता है।
विवाह समारोहों में जूते की भूमिका और भी रोचक हो जाती है। दूल्हे की सालियाँ उसके जूते चुरा लेती हैं और बदले में नेग मांगती हैं। यह परंपरा रिश्तों में हँसी, अपनापन और मधुरता घोलती है। सोचिए, जो जूता पूरे समय पैरों में रहता है, वही अचानक विवाह का सबसे मूल्यवान सामान बन जाता है।
लोककथाओं और फिल्मों में भी जूतों का अपना महत्व है। बचपन में “उड़ने वाले जूते” और “जादुई जूतों” की कहानियाँ सुनकर कल्पना को पंख लग जाते थे। फिल्मों में गीत गूंजता है—“मेरा जूता है जापानी”, जो आज भी लोगों की जुबान पर है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि जूतों की नागरिकता और पहचान भी चर्चा का विषय बन सकती है।
एक रोचक बात और है। किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का अनुमान कभी-कभी उसके जूतों से भी लगाया जाता है। चमकते हुए जूते अनुशासन और सजगता का संदेश देते हैं, जबकि धूल-धूसरित जूते मेहनतकश जीवन की कहानी कहते हैं। सैनिकों के चमकते बूट हों या विद्यार्थियों के स्कूल शूज़, हर जोड़ी अपने मालिक का परिचय देती है।
धार्मिक दृष्टि से जूते का महत्व और भी बढ़ जाता है। रामायण में वर्णित वह प्रसंग भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर है, जब भगवान श्रीराम के वनवास के दौरान भरत ने उनकी खड़ाऊँ को सिंहासन पर स्थापित कर राज्य का संचालन किया। इससे स्पष्ट होता है कि जूता यदि भगवान के चरणों से जुड़ जाए तो वह पूजनीय बन जाता है।
जूते की सबसे बड़ी विशेषता उसकी जोड़ी है। दोनों साथ जन्म लेते हैं, साथ चलते हैं और साथ ही घिसते हैं। एक खो जाए तो दूसरा भी लगभग बेकार हो जाता है। वे कभी आगे-पीछे नहीं चलते, न ही एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करते हैं। एक बायाँ है तो दूसरा दायाँ, लेकिन दोनों मिलकर ही यात्रा पूरी करते हैं। यह जीवन में सहयोग, सामंजस्य और साझेदारी का अनुपम संदेश देता है।
आज जब रिश्तों में स्वार्थ बढ़ता जा रहा है, तब जूतों की जोड़ी हमें सिखाती है कि जीवन की राह अकेले नहीं, साथ चलने से आसान बनती है। परिवार, मित्र और जीवनसाथी भी उसी जोड़ी की तरह होते हैं, जिनका महत्व कठिन समय में सबसे अधिक समझ आता है।
वास्तव में जूता हमें यह भी सिखाता है कि सम्मान वस्तु में नहीं, उसके उपयोग और संगति में होता है। वही जूता मंदिर के बाहर उतारा जाता है, वही सैनिक के पैरों में राष्ट्र की रक्षा करता है, वही खिलाड़ी को विश्व मंच पर सम्मान दिलाता है और वही भगवान की खड़ाऊँ बनकर श्रद्धा का केंद्र बन जाता है।
निष्कर्षतः, जूता केवल पैरों को सुरक्षित रखने वाली वस्तु नहीं, बल्कि जीवन का एक मौन शिक्षक है। वह हमें परिश्रम, अनुशासन, साथ निभाने, विनम्रता, संगति के प्रभाव और सम्मान के वास्तविक अर्थ का पाठ पढ़ाता है। यदि हम इन संदेशों को समझ लें तो हमारा जीवन भी साधारण से असाधारण बन सकता है।





