पूरी रथोत्सव में भगदड़ : दोषी सरकार

Stampede during the entire chariot festival: Government to blame

सीता राम शर्मा चेतन

मन अत्यंत उदास, हताश और आक्रोश से भरा है । भगवान जगन्नाथ के 16 जुलाई 2026 के पूरी रथ यात्रा उत्सव में हुई भगदड़ में दो व्यक्ति की मौत की अधिकारिक पुष्टि हुई है और लगभग डेढ़ सौ लोग घायल हुए हैं । इस रथ यात्रा उत्सव में शामिल होने के लिए मैं भी रांची से जगन्नाथ पूरी गया था । लगभग साढ़े तीन बजे तक मैं भी उस घोर अव्यवस्थित, लापरवाह, भीड़ का हिस्सा था । जिसको लेकर सत्ता और शासन बारह-तेरह हजार पुलिसकर्मी और सैकड़ों अधिकारियों के इंतजाम की बात करते हैं । भगदड़ संभवतः पांच बजे के बाद हुई पर सच कहूं तो मेरे लिए भगदड़ जैसी स्थिति तो साढ़े तीन बजे ही थी जब घबराकर मैं भारी मशक्कत के बाद सड़क के किनारे आने में सफल हुआ और फिर भगवान जगन्नाथ के रथ की डोर थामने का संकल्प त्याग कर वापस रेलवे-स्टेशन की ओर चल दिया । बता दूं कि पूरी में रथ यात्रा उत्सव में शामिल हर श्रद्धालु भक्त का लक्ष्य भगवान जगन्नाथ के रथ की डोर थामना, खींचना होता है । प्रचलित मान्यता है कि ऐसा करने से या फिर सिर्फ एक बार सच्चे हृदय से ईश्वर का नाम लेने मात्र से मनुष्य को भगवान का विशेष आशीर्वाद और जीवनोपरांत मोक्ष मिलता है । मेरा स्पष्ट मानना है कि मानवीय जीवन के लिए मोक्ष प्राप्ती का ऐसा क्षणिक, अति विशिष्ट, वैकल्पिक व्यवस्था का विधान संभवतः ईश्वरीय धार्मिक विधान नहीं होगा । होना भी नहीं चाहिए । बावजूद इसके किसी शास्त्र या संत वचन पर विश्वास रखते हुए यदि भगवान जगन्नाथ के रथ की डोर थामने या खींचने को लेकर ऐसा जन विश्वास है तब भी सत्ता, शासन-प्रशासन और व्यवस्थापकों को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे दूर-दूर से आए लाखों लोगों में हर एक श्रद्धालु ऐसा कर पाए । सौभाग्य से पूरी का रथ यात्रा मार्ग इसके अनुकूल भी है, जरूरत है तो सिर्फ इस पर गंभीरतापूर्वक विचार और व्यवहार करने की । दुर्भाग्य से सत्ता, शासन-प्रशासन और व्यवस्थापक इसके प्रति ना पूरी तरह गंभीर हैं और ना ही होने की आवश्यकता महसूस करते हैं, यदि ऐसा होता तो ना ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न होती, ना कोई हादसा होता और ना ही लाखों श्रद्धालु भक्त, जो लगभग पूरे भारत के कोने-कोने से आते हैं, बिना रथ की डोर थामे, खींचे निराश वापस जाते ।

यह आवश्यक रुप से विचारणीय तथ्य है कि यदि लोकमान्यता, शास्त्र सम्मत अथवा संत या गुरु वचनों के अनुसार भगवान जगन्नाथ के रथ यात्रा उत्सव में शामिल होकर उनके रथ की डोर का स्पर्श करने या उसे खींचने से बड़ा पुण्य लाभ मिलता है तो फिर लोक कल्याण अथवा लोक आस्था को पूर्ण करने हेतू क्या ऐसी सरल व्यवस्था भगवान जगन्नाथ के सेवक, पुजारी, मंदिर व्यवस्थापक समूह और सरकार को नहीं करनी चाहिए ? क्या पंक्तिबद्ध दर्शन और रथ डोर छुने, खींचने की व्यवस्था नहीं हो सकती ? पूरी में भगवान जगन्नाथ मंदिर से गुंडिचा मंदिर ( मौसी बाड़ी ) की दूरी लगभग तीन किलोमीटर है । इस यात्रा मार्ग की चौड़ाई लगभग तीन सौ फीट है । भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और मां सुभद्रा के रथ की कुल चौड़ाई लगभग एक सौ फीट होती है । यदि तीनों रथों को एक साथ दस-दस फीट की दूरी के साथ चलाया जाए तो भी उन्हें एक साथ एक सौ पचास फीट में बहुत व्यवस्थित रूप से चलाया जा सकता है । शेष एक सौ पचास फीट की चौड़ाई में पचास रेखा खींच कर उस पर रस्सी लगभग तीन किलोमीटर तक सीधी बांध दी जाए और हर आठ ( पंक्ति ) रस्सी के बाद एक रस्सी पर दस-दस मीटर की दूरी पर एक-एक सुरक्षाकर्मी ( पुलिसकर्मी ) तैनात हो तो कुल पचास में से सात पंक्ति में दस-दस मीटर की दूरी पर तैनात सुरक्षाकर्मियों की संख्या दो हजार एक सौ होगी और शेष तैंतालीस पंक्ति में बहुत आराम से रस्सी थामें लोगों की संख्या ( प्रति रस्सी तीन किलोमीटर में छह हजार के हिसाब से ) दो लाख अट्ठावन हजार होगी । अर्थात दोनों मार्ग मिलाकर कुल श्रद्धालुओं की संख्या होगी पांच लाख सोलह हजार और सुरक्षाकर्मी लगेंगे चार हजार दो सौ । एक बार में रथ खींचेंगे दो लाख अट्ठावन हजार लोग और उनके कतार में लगने, रथ खींचने और जाने में बहुत आराम से सुलभ समय लगेगा मात्र दो घंटा । अर्थात यदि सुबह सात बजे से यह आयोजन हो तो पांच बार यह चक्र बहुत आराम से चलेगा और अत्यंत व्यवस्थित तरीके से बारह लाख नब्बे हजार श्रद्धालु प्रसन्नतापूर्वक भक्तिपूर्ण माहौल में अपने भगवान का दर्शन कर और रथ खींच कर स्वंय को कृतार्थ कर पाएंगे ! यदि इसमें समय और संसाधन का बेहतर सदुपयोग हो तो यह संख्या सहजता पूर्वक अठारह लाख तक की जा सकती है । इस बार हुए आयोजन में सुरक्षाकर्मियों की संख्या दस हजार से उपर बताई जा रही है ! इतनी संख्या में तो समूची पूरी को व्यवस्थित किया जा सकता है पर सवाल यह है कि करेगा कौन ? हर एक श्रद्धालु की श्रद्धा, भक्ति और इच्छापूर्ति के लिए समूची व्यवस्था को जवाबदेह बनाएगा कौन ?

अंतिम अत्यंत आवश्यक विचारणीय प्रश्न जो पूरी के रथ यात्रा मार्ग पर

लगभग एक घंटे में मैंने महसूस किया, वीआईपी मार्ग और उनकी गाड़ियों का शोर, उन चंद लोगों की सुरक्षा के लिए लाखों लोगों को होने वाली परेशानी क्यों ? यह उन्हें समझने समझाने की जरूरत है । सच्चाई यही है कि इस सारी अव्यवस्था और व्यवस्थागत कमियों के लिए निर्विवादित रूप से दोषी वे भी हैं । फिलहाल देश और उड़ीसा में सरकार खुद को राम राज्य की समर्थक वाली समझती है, अच्छा होगा कि वह मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जनहित वाले संवेदनशील और जिम्मेवार चरित्र का निर्वाह करने का भी प्रयास करें अन्यथा धार्मिक दृष्टिकोण से अंतिम न्याय तो वही श्रीराम जो जगन्नाथ भी हैं, करेंगे । आशा पर संसार जीवीत है और आशा के साथ किए गए प्रयास सफल होते हैं । उसी अनुभूत आशा के साथ छलनी होते हृदय से शब्दों को विराम देता हूं । गंदगी पर बात फिर कभी । जब जागो तभी सवेरा ! जय जगन्नाथ !