ब्रह्मलीन महात्मा सुशील कुमार जी के 89वें महाअवतरण दिवस पर विशेष आलेख
विनोद कुमार सिंह ‘तकियावाला’
विज्ञान, तकनीक और भौतिक उपलब्धियों के इस युग में मनुष्य ने पृथ्वी से लेकर अंतरिक्ष तक अपनी विजय का परचम लहरा दिया है। जीवन पहले की अपेक्षा अधिक सुविधासंपन्न हुआ है,संचार के साधनों ने दूरियों को समाप्त कर दिया है और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का युग मानव सभ्यता को नई दिशा दे रहा है।इसके बावजूद यदि कोई सबसे बड़ी चुनौती हमारे सामने खड़ी है,तो वह है—मनुष्य के भीतर बढ़ती मानसिक अशांति,तनाव, अकेलापन और आत्मिक रिक्तता। बाहरी समृद्धि के बीच भी भीतर का मन शांति की तलाश में भटक रहा है।ऐसे समय में भारतीय अध्यात्म की सनातन परम्परा पुनः प्रासंगिक हो उठती है,जिसने सदैव मनुष्य को बाहर नहीं,अपने भीतर झाँकना सिखाया है।भारत की महान गुरु-शिष्य परम्परा का इतिहास केवल धार्मिक आस्था का इतिहास नहीं, बल्कि आत्मबोध, लोककल्याण और मानवीय मूल्यों का इतिहास है।जब-जब समाज दिशाहीन हुआ,तब-तब किसी महापुरुष ने अवतरित होकर मानवता को नया मार्ग दिखाया। इन महापुरुषों ने केवल प्रवचन नहीं दिए, बल्कि अपने जीवन को ही संदेश बना दिया।ब्रह्मलीन महात्मा सुशील कुमार जी ऐसे ही विरल संतों में गिने जाते हैं,जिन्होंने आध्यात्मिक साधना को जन-जन तक पहुँचाने का एक सहज,सरल और अनुभवपरक मार्ग प्रदान किया, जिसे आज विश्व ‘इस्सयोग’ के नाम से जानता है।13 जुलाई केवल उनकी जन्मतिथि नहीं,बल्कि हजारों-लाखों साधकों के लिए आत्ममंथन, साधना और गुरु-चिंतन का पावन दिवस है।वर्ष 1938 में बिहार के भोजपुर जनपद में वैदिक विद्वान श्री श्रीशचंद्र शास्त्री तथा पूजनीया कर्पूर कमला जी के घर जन्मे महात्मा सुशील कुमार जी को अध्यात्म विरासत में मिला।उनके पिता चारों वेदों के प्रकाण्ड ज्ञाता, संस्कृत के विद्वान तथा आर्य समाज के प्रतिष्ठित आचार्य थे।भारत सरकार उन्हें थाईलैंड,श्रीलंका सहित अनेक देशों में वेद और संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए भेजती थी।माता कर्पूर कमला जी भी विदुषी, तेजस्विनी और समाजसेवा के प्रति समर्पित थीं।ऐसे संस्कारमय वातावरण में बालक सुशील के मन में बचपन से ही सत्य,ईश्वर और जीवन के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा जाग उठी।बाल्यावस्था में उन्हें गायत्री मंत्र और वैदिक संस्कारों की शिक्षा मिली।पिता उन्हें बताते थे कि सच्ची श्रद्धा से किया गया जप मनुष्य के भीतर अद्भुत परिवर्तन ला सकता है। यही संस्कार आगे चलकर उनके आध्यात्मिक चिंतन की आधारशिला बने।जैसे-जैसे आयु बढ़ी,उनकी जिज्ञासा कर्मकाण्ड से आगे बढ़कर उस परम सत्य की खोज में परिवर्तित होती गई, जो प्रत्येक जीव के भीतर विद्यमान है।
महात्मा सुशील कुमार जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिकता और कर्मयोग एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।उन्होंने वर्ष 1961 में सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा प्राप्त की और बाद में विधि की पढ़ाई भी पूरी की।बिहार सरकार के पथ निर्माण विभाग में अभियंता के रूप में उनका प्रशासनिक जीवन प्रारम्भ हुआ। महात्मा गांधी सेतु के निर्माण में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। बोकारो इस्पात परियोजना सहित अनेक राष्ट्रीय महत्व की योजनाओं में उन्होंने अपनी प्रतिभा और ईमानदारी का परिचय दिया। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भी उन्होंने निर्भय होकर विकास कार्य सम्पन्न कराए।हरिजन छात्रावासों, शैक्षणिक संस्थानों और ग्रामीण विकास से जुड़े अनेक कार्य उनके नेतृत्व में पूरे हुए। उत्कृष्ट सेवाओं के लिए उन्हें वर्ष 1997 में ‘इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी सम्मान’ से सम्मानित किया गया।किन्तु उनकी वास्तविक पहचान एक सफल अभियंता या कुशल प्रशासक भर नहीं थी।उनके भीतर का साधक निरंतर उस सत्य की खोज में लगा था, जिसे कोई पद, प्रतिष्ठा या पुरस्कार नहीं दे सकता। उन्होंने संसार के उत्तरदायित्वों का पूर्ण निर्वहन करते हुए यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक उपलब्धि केवल हिमालय की गुफाओं में नहीं, बल्कि गृहस्थ जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी प्राप्त की जा सकती है।
वे कहा करते थे कि गृहस्थ आश्रम त्याग का नहीं, बल्कि साधना का श्रेष्ठतम आश्रम है।यदि जीवन में सच्चे सद्गुरु का सान्निध्य मिल जाए तो परिवार ही तपोवन बन जाता है और दैनिक कर्म ही साधना का माध्यम बन जाते हैं।यह विचार भारतीय दर्शन की उस महान परम्परा को पुनर्जीवित करता है, जिसमें राजा जनक जैसे गृहस्थ भी ब्रह्मज्ञानी कहलाए।18 मई 1963 को उनका विवाह पूज्य माँ विजया जी के साथ हुआ। यह केवल एक वैवाहिक संबंध नहीं था,बल्कि दो आध्यात्मिक यात्राओं का दिव्य संगम था। माँ विजया जी भी बाल्यकाल से ही ईश्वरभक्ति और साधना के प्रति समर्पित थीं। दोनों ने साथ-साथ साधना की कठिन राह तय की।प्रारम्भ में उन्हें एक लौकिक गुरु से दीक्षा मिली,किन्तु साधना की गहराइयों में उन्होंने अनुभव किया कि स्वयं सद्गुरु भगवान शिव उनका मार्गदर्शन कर रहे हैं।यह अनुभूति उनके जीवन की निर्णायक आध्यात्मिक घटना बनी।इसी साधना के परिणामस्वरूप जन्म हुआ ‘इस्सयोग’ का—एक ऐसा साधना-पथ,जो किसी जाति,धर्म, भाषा या संप्रदाय की सीमाओं में बँधा नहीं है।महात्मा जी ने इसे सम्पूर्ण मानवता की साझा आध्यात्मिक धरोहर के रूप में प्रस्तुत किया।उनका उद्देश्य कोई नया पंथ स्थापित करना नहीं, बल्कि मनुष्य को उसके भीतर स्थित परम चेतना से जोड़ना था।
वे कहा करते थे कि बाहरी पूजा, आडम्बर और कर्मकाण्ड तभी सार्थक हैं, जब उनका उद्देश्य अंतर्मन की शुद्धि हो।यदि मनुष्य अपने भीतर उतरना सीख जाए,तो परमात्मा की अनुभूति दूर नहीं रहती।इसी विश्वास के साथ उन्होंने इस्सयोग को सहज,सरल और अनुभवपरक साधना के रूप में जन-जन तक पहुँचाया।महात्मा सुशील कुमार जी ने घोषणा की थी—”इस्सयोग न भूतो,न भविष्यति—एक आध्यात्मिक क्रांति है।” उनका विश्वास था कि इस्सयोग की लयावस्था साधना साधक को बहुत कम समय में उस आत्मिक शांति का अनुभव करा सकती है,जिसकी खोज में लोग वर्षों तक भटकते रहते हैं।उन्होंने यह भी कहा कि एक समय आएगा जब इस्सयोग विश्व के विशाल भूभाग तक पहुँचेगा और मानवता के आध्यात्मिक पुनर्जागरण का माध्यम बनेगा।आज जब मनुष्य बाहर की दुनिया जीत चुका है, लेकिन स्वयं से हारता जा रहा है, तब महात्मा सुशील कुमार जी का यह संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है कि वास्तविक विजय बाहर नहीं, भीतर प्राप्त होती है।श्रद्धा,सेवा,समर्पण और आत्मबोध—यही वह चार स्तंभ हैं जिन पर सुखी व्यक्ति, स्वस्थ समाज और सशक्त राष्ट्र का निर्माण संभव है।महात्मा सुशील कुमार जी का सम्पूर्ण जीवन इसी सत्य का साक्षात् उदाहरण था। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि संसार छोड़कर ही ईश्वर की प्राप्ति संभव है। उनका स्पष्ट मत था कि परिवार, समाज और अपने दायित्वों का ईमानदारी से निर्वहन करते हुए भी साधना के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचा जा सकता है। उनके व्यक्तित्व में कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और राजयोग का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। यही कारण है कि उनके संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति केवल प्रभावित ही नहीं होता था, बल्कि अपने जीवन को नई दिशा देने के लिए प्रेरित भी होता था।
महात्मा जी का मानना था कि अध्यात्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को मनुष्य से जोड़ना है। यदि साधना के बाद भी अहंकार, द्वेष, ईर्ष्या और भेदभाव बना रहे, तो वह साधना अधूरी है। सच्चा साधक वही है, जिसके भीतर करुणा, सेवा, विनम्रता और समर्पण का भाव स्वतः विकसित होने लगे। इस्सयोग की साधना इसी आंतरिक परिवर्तन का माध्यम है। यह मनुष्य को बाहर की नहीं, भीतर की यात्रा पर ले जाती है। वहीं से जीवन का वास्तविक रूपांतरण प्रारम्भ होता है।आज का समाज अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। विज्ञान और तकनीक ने जीवन को गति दी है, किन्तु इस तीव्र गति ने मनुष्य के भीतर धैर्य और संतुलन को भी चुनौती दी है। परिवारों में संवाद कम हो रहे हैं, सामाजिक रिश्तों में आत्मीयता घट रही है और युवा पीढ़ी अनेक प्रकार के मानसिक दबावों से जूझ रही है। ऐसे समय में यदि अध्यात्म को केवल कर्मकाण्ड के रूप में देखा जाएगा, तो वह समाज की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाएगा। आवश्यकता उस अध्यात्म की है, जो जीवन को सरल बनाए, मन को स्थिर करे और व्यक्ति को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध कराए। इस दृष्टि से इस्सयोग का संदेश समकालीन समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देता है।महात्मा सुशील कुमार जी का विश्वास था कि आने वाला समय केवल आर्थिक या तकनीकी प्रतिस्पर्धा का नहीं होगा, बल्कि आध्यात्मिक जागरण का भी होगा। भौतिक प्रगति तभी सार्थक होगी, जब उसके साथ नैतिकता, संवेदनशीलता और आत्मिक चेतना का विकास भी होगा।उन्होंने अपने साधकों से केवल ध्यान करने का आग्रह नहीं किया,बल्कि सेवा को साधना का अभिन्न अंग बनाया। उनका कहना था कि जिस साधना का परिणाम समाज के कल्याण में दिखाई न दे, वह साधना अपने उद्देश्य को पूर्ण नहीं करती।
उनके जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण अध्याय 13 जुलाई 2003 से जुड़ा है। इसी पावन दिन उन्होंने अपने मानस संतानों के आध्यात्मिक कल्याण और लोकमंगल की भावना से पूज्य सद्गुरुदेव माँ विजया जी के माध्यम से दिल्ली में शक्ति पिंड माँ मनोकामना देवी की स्थापना का शुभारंभ कराया। उस समय उन्होंने सहज भाव से कहा था कि भविष्य में साधकों की संख्या इतनी बढ़ेगी कि यह स्थान छोटा पड़ जाएगा और शक्ति पिंड की स्थायी स्थापना करनी पड़ेगी। समय बीतने के साथ उनकी यह भविष्यवाणी अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई।
बाद में अंतरराष्ट्रीय इस्सयोग समाज के समर्पित सचिव के एस वर्मा व वंदना वर्मा विशेष अनुरोध पर पूज्य सद्गुरुदेव माँ विजया जी के करकमलों से शक्ति पिंड माँ मनोकामना देवी मंदिर की स्थायी स्थापना सम्पन्न हुई। आज यह स्थान केवल एक मंदिर नहीं,बल्कि असंख्य श्रद्धालुओं की आस्था, साधना,सेवा और आत्मिक ऊर्जा का जीवंत केंद्र बन चुका है। देश के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों से भी साधक यहाँ पहुँचकर अपने सद्गुरुदेव के प्रति श्रद्धा अर्पित करते हैं और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव करते हैं।प्रतिवर्ष महाअवतरण दिवस का आयोजन केवल स्मृति का कार्यक्रम नहीं होता, बल्कि गुरु-परम्परा के मूल संदेश—श्रद्धा, सेवा और समर्पण—को जीवन में उतारने का संकल्प भी होता है। गुरु का सम्मान केवल पुष्प अर्पित करने से नहीं, बल्कि उनके बताए मार्ग पर चलने से सिद्ध होता है। यही वह संदेश है, जो महात्मा सुशील कुमार जी ने अपने सम्पूर्ण जीवन से दिया।व्यक्तिगत रूप से मुझे भी उनके सान्निध्य में कुछ अमूल्य क्षण बिताने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उन क्षणों की स्मृति आज भी मेरे लिए आध्यात्मिक प्रेरणा का स्रोत है।मैंने निकट से अनुभव किया कि सच्चा गुरु केवल ज्ञान नहीं देता,बल्कि साधक के भीतर सोई हुई चेतना को जागृत कर देता है।उसकी दृष्टि में न कोई बड़ा होता है और न छोटा; सभी आत्माएँ परमात्मा की संतान हैं।यही समभाव किसी भी महान आध्यात्मिक परम्परा की सबसे बड़ी पहचान है।आज जब हम ब्रह्मलीन महात्मा सुशील कुमार जी का 89वाँ महाअवतरण दिवस मना रहे हैं, तब यह केवल श्रद्धांजलि अर्पित करने का अवसर नहीं,बल्कि उनके विचारों की समकालीन प्रासंगिकता पर गंभीर चिंतन का भी समय है। यदि मानवता को स्थायी शांति, सामाजिक समरसता और नैतिक पुनर्जागरण की दिशा में आगे बढ़ना है, तो उसे विज्ञान और अध्यात्म,विकास और मूल्य, प्रगति और करुणा—इन सभी के बीच संतुलन स्थापित करना होगा।महात्मा जी का जीवन इसी संतुलन का सजीव उदाहरण है।उनकी सबसे बड़ी विरासत कोई भौतिक उपलब्धि नहीं,बल्कि वह आध्यात्मिक चेतना है,जिसे उन्होंने इस्सयोग के माध्यम से जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया। उनका विश्वास था कि जब मनुष्य स्वयं को पहचान लेता है,तभी वह संसार को सही अर्थों में समझ पाता है।आत्मबोध से ही सेवा का जन्म होता है, सेवा से समर्पण का और समर्पण से ईश्वरानुभूति का।
उनके श्रीचरणों में यही विनम्र श्रद्धांजलि है कि हम उनके बताए मार्ग पर चलने का प्रयास करें, अपने जीवन में सदाचार, करुणा और सेवा को स्थान दें तथा आध्यात्मिकता को केवल पूजा तक सीमित न रखकर अपने व्यवहार का हिस्सा बनाएँ। यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धा होगी और यही इस्सयोग की आध्यात्मिक क्रांति का वास्तविक विस्तार भी।परम आराध्य ब्रह्मलीन महात्मा सुशील कुमार जी एवं पूज्य सद्गुरुदेव माँ विजया जी के श्रीचरणों में कोटिशः प्रणाम।
शक्ति पिंड माँ मनोकामना देवी की जय।





