सत्ता नहीं सुनने वाली! तो फ़िर बार – बार अपनी जान दांव पर क्यों लगा रहे हैं सोनम वांगचुक?

The powers that be aren't listening! So why does Sonam Wangchuk keep putting his life on the line?

दिलीप कुमार पाठक

यह इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है कि जो वैज्ञानिक और पर्यावरणविद् पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कर चुका है, उसे अपने ही देश में न्याय मांगने के लिए बार-बार भूखा बैठना पड़ रहा है। सोनम वांगचुक, जिन्होंने कुछ समय पहले लद्दाख की बर्फीली वादियों और वहां के नाजुक पर्यावरण को बचाने के लिए शून्य से नीचे के तापमान में हफ्तों लंबा अनशन किया था, आज वही वांगचुक दिल्ली के जंतर-मंतर पर भीषण गर्मी में अपनी जान दांव पर लगाए हुए हैं। इस बार उनका अनशन केवल लद्दाख के अधिकारों के लिए नहीं है, बल्कि देश के करोड़ों युवा छात्रों के भविष्य को सुरक्षित करने और देश की परीक्षा प्रणाली में लगे ‘पेपर लीक’ के घुन को साफ करने के लिए है। यह पहली बार नहीं है जब सोनम वांगचुक ने किसी बड़े मकसद के लिए पानी और नमक पर दिन गुजारे हैं। इससे पहले लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने और राज्य का दर्जा दिलाने के आंदोलन के दौरान उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम जैसी सख्त धाराओं के तहत महीनों तक जेल की सलाखें भी झेलनी पड़ी थीं। दुनिया के प्रतिष्ठित मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित इस शख्स को अपने ही देश में अपराधी की तरह जेल में डाल दिया गया। लेकिन जेल से रिहा होने के बाद भी उनका हौसला टूटा नहीं। वे अच्छी तरह जानते हैं कि आज की व्यवस्था शांतिपूर्ण विरोध को भी किस नजरिए से देखती है, लेकिन जब देश के युवाओं का भविष्य दांव पर हो, तो वे चुप नहीं रह सके। यही कारण है कि वे अब दिल्ली में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर डटे हुए हैं। इस बार वांगचुक का यह संघर्ष देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई भयानक धांधली और बार-बार होने वाले पेपर लीक के खिलाफ है। वे इस छात्र आंदोलन के समर्थन में मजबूती से उतरे हैं और उनकी स्पष्ट मांग है कि देश की शिक्षा व्यवस्था की इस घोर विफलता की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। इस ऐतिहासिक परीक्षा घोटाले और तंत्र की लापरवाही के विरोध में वे सीधे केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि जब तक शीर्ष स्तर पर जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक दिन-रात मेहनत करने वाले होनहार और गरीब छात्रों का भरोसा इस परीक्षा प्रणाली से पूरी तरह उठा रहेगा।

जंतर-मंतर पर वांगचुक के इस नए अनशन को दो हफ़्तों से ज्यादा का समय हो चुका है। लगातार उपवास के कारण उनका वजन लगभग 8 किलो तक गिर गया है और उनकी सेहत काफी नाजुक होती जा रही है। डॉक्टरों की चिंता बढ़ रही है, लेकिन व्यवस्था अब भी मौन साधे हुए है। आगामी 20 जुलाई को, संसद के मानसून सत्र के पहले दिन, वे जंतर-मंतर से संसद भवन तक एक बड़े शांतिपूर्ण मार्च का नेतृत्व भी करने जा रहे हैं ताकि सोई हुई देश की चेतना को पूरी ताकत से जगाया जा सके। सोनम वांगचुक जैसे दूरदर्शी लोग रोज-रोज पैदा नहीं होते। उनकी जान इस देश और आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहद जरूरी है। वांगचुक को यह समझना होगा कि इस संवेदनहीन व्यवस्था के सामने अपनी जान गंवा देना कोई समझदारी नहीं है। देश को उनकी वैज्ञानिक सोच की जरूरत है, न कि उनके बलिदान की। यह आंदोलन केवल एक राजनीतिक विरोध नहीं है, बल्कि यह उस ईमानदार युवा की आवाज है जो दिन-रात मेहनत करके परीक्षा देता है और अंत में पेपर लीक की खबर सुनकर टूट जाता है। अब जिम्मेदारी देश की प्रबुद्ध जनता की है कि वह पूरी तरह से जागृत हो और वांगचुक के इस संघर्ष में उनके साथ खड़ी हो, ताकि सत्ता को अपनी हठधर्मिता छोड़कर छात्रों के प्रति अपनी जवाबदेही पूरी ईमानदारी से तय करनी ही पड़े।