प्रदीप शर्मा
इतिहास गवाह है कि जब भी किसी नये उपकरण का आविष्कार हुआ, उसने मानव श्रम को आसान बनाया. पहिये ने हमारे पैरों की थकान हरी, भाप के इंजनों ने बाहुबल की निर्भरता को अप्रासंगिक किया और कंप्यूटर ने जटिल गणनाओं को पलक झपकते ही संभव बना दिया. पर, इन तमाम युगांतकारी परिवर्तनों के बीच मनुष्य का मस्तिष्क अक्षुण्ण और सुरक्षित था. सोचना, मौलिक जिज्ञासा करना, संदेह प्रकट करना और वैचारिक अंतर्विरोधों से जूझना केवल और केवल मनुष्य का विशेषाधिकार रहा. पर आज इतिहास में पहली बार हम एक ऐसे मोड़ पर आ खड़े हुए हैं, जहां तकनीक हमारे इसी सर्वोच्च विशेषाधिकार यानी ‘सोचने की क्षमता’ को चुनौती दे रही है.
आज चैटजीपीटी, जेमिनी, क्लॉड और डीपसीक जैसे एआइ प्लेटफॉर्म केवल पारंपरिक सर्च इंजनों की तरह सूचनाएं एकत्र नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे मानव मस्तिष्क की नकल करते हुए निबंध लिख रहे हैं, जटिल शोध-पत्र तैयार कर रहे हैं, कविताएं रच रहे हैं और सॉफ्टवेयर के कोड लिख रहे हैं. एकेडमिक और बौद्धिक जगत में इसका असर साफ दिखने लगा है. आज शोध का पहला चरण ‘प्रॉम्प्ट’ लिखना हो गया है और अंतिम चरण ‘कॉपी-पेस्ट’ करना. इस कारण बौद्धिक परिपक्वता का दायरा लगातार सिकुड़ता जा रहा है. ‘एमआइटी मीडिया लैब’ की एक हालिया जांच में पाया गया कि जो छात्र अपने एकेडमिक कार्यों के लिए चैटजीपीटी जैसे एआइ टूल्स पर अत्यधिक निर्भर थे, उनके इइजी माप में मस्तिष्क की सक्रियता काफी कम दर्ज की गयी. तर्क-वितर्क करने की गुणवत्ता भी बेहद निम्न स्तर की पायी गयी.
इसी तरह, गार्लिक द्वारा 2025 में 17 से 25 वर्ष के 666 युवाओं पर किये गये एक व्यापक अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि एआइ पर निर्भरता के कारण युवाओं के ‘क्रिटिकल थिंकिंग स्कोर’ में उल्लेखनीय गिरावट आयी है. इस डिजिटल शॉर्टकट ने साहित्यिक चोरी (प्लेगरिज्म) को भी एक नया, परिष्कृत और अदृश्य चेहरा दे दिया है. आज बड़े भाषा मॉडल इंटरनेट पर मौजूद अरबों स्रोतों से सामग्री उठाते हैं और उसे इस तरह से पुनर्गठित करते हैं कि मौजूदा प्लेगरिज्म डिटेक्शन सॉफ्टवेयर भी कई बार चकमा खा जाते हैं. परिणामतः, हम एक ऐसी बौद्धिक पीढ़ी का निर्माण कर रहे हैं जो तात्कालिक उत्तर देने में तो माहिर है, लेकिन उसमें नये प्रश्नों को जन्म देने की क्षमता समाप्त हो रही है.
इससे भी बड़ा संकट यह है कि जब एआइ को किसी प्रश्न का सही उत्तर नहीं पता होता, तो वह अपनी प्रोग्रामिंग के आधार पर मनगढ़ंत तथ्य और आंकड़े तैयार कर देता है. इतिहास में पहली बार ऐसा दौर आया है जब गलत और भ्रामक सूचनाएं इतनी सुगठित, व्याकरण सम्मत और आश्वस्त करने वाली भाषा में प्रस्तुत की जा रही हैं कि वे सच से भी ज्यादा सच दिखने लगी हैं. यह केवल तकनीकी खामी नहीं है, लोकतंत्र, न्यायपालिका, चिकित्सा अौर पत्रकारिता जैसे स्तंभों के लिए गंभीर अस्तित्वपरक संकट है. हमें इस भ्रम से भी बाहर निकलना होगा कि एल्गोरिदम पूरी तरह से निष्पक्ष और तटस्थ होते हैं. मशीनें अंततः वही सीखती हैं जो मनुष्य उन्हें सिखाता है. यहां सबसे बड़ा प्रश्न नैतिक जवाबदेही का है. यदि किसी एआइ जनित गलत चिकित्सा सलाह से किसी मरीज की जान चली जाये, या मशीन की त्रुटि के कारण अदालत में कोई निर्दोष दोषी सिद्ध हो जाये, तो कटघरे में किसे खड़ा किया जायेगा?
इस आभासी दुनिया का एक और स्याह पहलू है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में ही दुनियाभर के डाटा सेंटरों ने वैश्विक बिजली का 1.5 प्रतिशत (लगभग 415 टेरावॉट-ऑवर) हिस्सा डकार लिया. अनुमान है कि 2030 तक यह खपत बढ़कर 945 टेरावॉट-ऑवर हो जायेगी. संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय की 2026 की हालिया चेतावनी की मानें, तो एआइ सर्वरों और सुपरकंप्यूटरों को ठंडा रखने के लिए होने वाली पानी की खपत 2030 तक 1.3 अरब लोगों की घरेलू पानी की जरूरत के बराबर हो जायेगी और उसका कार्बन उत्सर्जन अर्जेंटीना जैसे बड़े देश के कुल उत्सर्जन को पार कर जायेगा. इस वैश्विक संकट को देखते हुए दुनिया के अग्रणी देशों ने संभलना शुरू कर दिया है. चीन ने अपनी प्राथमिक कक्षाओं में जेनरेटिव एआइ के स्वतंत्र उपयोग पर कड़ा अंकुश लगाया है. वहीं अमेरिका ने प्रतिबंध के बजाय ‘एआइ साक्षरता’ का मार्ग चुना है. भारत में भी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने एआइ के अनधिकृत उपयोग को अकादमिक कदाचार की श्रेणी में शामिल किया है.
हालांकि, भारतीय संदर्भ में एक व्यावहारिक उलझन यह भी आ रही है कि कई बार एआइ डिटेक्टर सॉफ्टवेयर छात्रों के मौलिक लेखन को भी मशीन जनित घोषित कर देते हैं. इसलिए, भारत को केवल सॉफ्टवेयर पर निर्भर रहने के बजाय वाइवा, विशेषज्ञ समीक्षा और पारदर्शी प्रकटीकरण की नीतियों को समान महत्व देना होगा. एआइ हमारी भाषा सुधार सकता है, शुरुआती मसौदा तैयार कर सकता है और विशाल डाटा को व्यवस्थित कर सकता है, पर संवेदनशीलता, अनुभव, नैतिक विवेक, अंतरात्मा की आवाज और मौलिक चिंतन आज भी केवल मनुष्य की ही थाती हैं. हमें ‘एआइ के साथ सोचना’ सीखना होगा, न कि ‘एआइ द्वारा सोचा जाना’ स्वीकार करना होगा.





