राजेश जैन
दिल्ली के जंतर-मंतर पर 21 दिनों से अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक को शनिवार सुबह दिल्ली पुलिस सफदरजंग अस्पताल ले गई। पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई हाई कोर्ट के आदेश के बाद की गई। लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। यदि कोई व्यक्ति सरकार से जवाबदेही मांगते हुए शांतिपूर्ण अनशन कर रहा हो, तो क्या सरकार यह तय कर सकती है कि उसका अनशन कब और कैसे समाप्त कराया जाए?
बहरहाल, कानूनी बहस अपनी जगह है, लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी पीड़ा थी जिसने एक सामाजिक कार्यकर्ता को तीन सप्ताह तक भूख हड़ताल पर बैठने के लिए मजबूर कर दिया? और उससे भी बड़ा सवाल यह कि अब तक केंद्र सरकार का कोई वरिष्ठ मंत्री या प्रतिनिधि उनसे बातचीत करने क्यों नहीं पहुंचा?
दरअसल, यह बहस केवल सोनम वांगचुक की नहीं है। यह उस भरोसे की लड़ाई है, जिस पर देश की पूरी परीक्षा व्यवस्था खड़ी है।
मई में नीट-यूजी परीक्षा के दौरान सामने आए पेपर लीक विवाद और उसके बाद परीक्षा रद्द होने से लाखों छात्रों की महीनों की मेहनत पर पानी फिर गया। इस दौरान देशभर में कई विद्यार्थियों ने मानसिक तनाव और निराशा के चलते आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया। यह घटनाएं बताती हैं कि पेपर लीक केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि लाखों परिवारों के सपनों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा राष्ट्रीय संकट बन चुका है।
सोनम वांगचुक की मांग भी कोई राजनीतिक पद या व्यक्तिगत लाभ नहीं थी। उनकी मांग केवल इतनी थी कि पेपर लीक के लिए नैतिक जिम्मेदारी तय हो, जवाबदेही सुनिश्चित हो और परीक्षा व्यवस्था पर युवाओं का भरोसा लौटाया जाए।
किस भरोसे पर कहेंगे-‘बेटा, मेहनत कर’
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेना, संसद या अर्थव्यवस्था नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी ताकत वह विश्वास होता है कि मेहनत करने वाले व्यक्ति को उसका अधिकार मिलेगा। यही भरोसा गरीब परिवारों को अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए कर्ज लेने की हिम्मत देता है। यही भरोसा किसी गांव के छात्र को कोटा, प्रयागराज, दिल्ली या पटना जैसे शहरों में वर्षों तक संघर्ष करने की ताकत देता है।
लेकिन जब प्रश्नपत्र बिकने लगें, परीक्षाएं रद्द होने लगें और भर्ती प्रक्रियाएं वर्षों तक अधर में लटक जाएं, तब केवल एक परीक्षा नहीं टूटती। उस विश्वास में दरार पड़ती है, जिसके आधार पर एक पिता अपने बेटे से कहता है-“मेहनत करो, एक दिन जिंदगी बदल जाएगी।”
भारत के करोड़ों युवाओं, खासकर गरीब और मध्यम वर्ग के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं केवल परीक्षा नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव का सबसे बड़ा माध्यम हैं। किसान का बेटा अधिकारी बनता है, मजदूर की बेटी डॉक्टर बनती है और छोटे दुकानदार का बेटा इंजीनियर या शिक्षक। इनके पास न बड़ी पूंजी होती है, न राजनीतिक पहुंच और न ही महंगे निजी संस्थानों का विकल्प। इनके पास केवल एक ही पूंजी होती है-मेहनत।
यही वजह है कि पेपर लीक का सबसे बड़ा नुकसान उसी वर्ग को होता है जिसके पास दूसरा रास्ता नहीं है। संपन्न परिवारों के पास विकल्प होते हैं, लेकिन लाखों अभ्यर्थियों के लिए एक परीक्षा ही पूरी जिंदगी की दिशा तय करती है।
इसे केवल राजनीतिक प्रदर्शन कहकर खारिज नहीं किया जा सकता
जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन को केवल राजनीतिक प्रदर्शन कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। जब हजारों छात्र परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग करते हैं और एक सामाजिक कार्यकर्ता अपने स्वास्थ्य की परवाह किए बिना अनशन पर बैठ जाता है, तो यह व्यवस्था के प्रति गहरे अविश्वास का संकेत है।
सरकार इन मांगों से सहमत हो या नहीं, लेकिन लोकतंत्र में संवाद का विकल्प नहीं होता। सरकार की सबसे बड़ी ताकत केवल प्रशासनिक निर्णय लेने में नहीं, बल्कि लोगों की बात सुनने और उनका विश्वास जीतने में होती है।
सरकार का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई हो रही है और परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने के प्रयास जारी हैं। यह स्वागत योग्य है। लेकिन युवाओं का भरोसा केवल गिरफ्तारियों से नहीं लौटेगा। भरोसा तब लौटेगा, जब उन्हें लगेगा कि सरकार उनकी चिंता सुन रही है और व्यवस्था को बदलने के लिए गंभीर है।
अब स्थायी समाधान की जरूरत
पेपर लीक अब किसी एक राज्य या किसी एक सरकार की समस्या नहीं रह गई है। अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग सरकारों के दौरान ऐसी घटनाएं सामने आई हैं। इसका अर्थ साफ है कि समस्या व्यवस्था की है और समाधान भी राष्ट्रीय स्तर पर ही निकालना होगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि हर बार प्रश्नपत्र परीक्षा से पहले बाजार तक कैसे पहुंच जाता है? इसका मतलब साफ है कि केवल बाहर बैठे दलाल ही नहीं, बल्कि कहीं न कहीं सिस्टम के भीतर भी सेंध है। जब तक इस संगठित नेटवर्क की आर्थिक, तकनीकी और प्रशासनिक जड़ों पर प्रहार नहीं होगा, तब तक गिरफ्तारियां केवल सुर्खियां बनेंगी, समाधान नहीं।
जरूरत है कि पूरे देश के लिए परीक्षा सुरक्षा का एक समान राष्ट्रीय मानक बनाया जाए। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर परीक्षा समाप्त होने तक हर चरण तकनीकी रूप से सुरक्षित हो। डिजिटल ट्रैकिंग, एन्क्रिप्टेड वितरण, स्वतंत्र ऑडिट और हर स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। पेपर लीक मामलों की सुनवाई फास्ट ट्रैक अदालतों में हो। दोषियों की संपत्ति जब्त करने, उन्हें आजीवन परीक्षा संबंधी गतिविधियों से प्रतिबंधित करने और परीक्षा रद्द होने पर अभ्यर्थियों को आयु सीमा में छूट तथा निश्चित समय-सीमा में पुनर्परीक्षा का कानूनी अधिकार दिया जाए।
विपक्ष की जिम्मेदारी भी केवल धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उसे संसद में ऐसे स्थायी कानूनों के लिए दबाव बनाना चाहिए जो सरकार बदलने के साथ न बदलें। वहीं सरकार को यह समझना होगा कि परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी है।
आखिर में सवाल केवल इतना नहीं है कि अगला पेपर लीक होगा या नहीं। असली सवाल यह है कि क्या इस देश का युवा आगे भी यह विश्वास रख पाएगा कि उसकी मेहनत बिकाऊ नहीं है। यदि इस सवाल का जवाब ‘हाँ’ में चाहिए, तो सरकार, विपक्ष और पूरे सिस्टम को राजनीति से ऊपर उठकर युवाओं का भरोसा बचाना होगा। क्योंकि एक देश की सबसे बड़ी संपत्ति उसकी इमारतें, सड़कें या बजट नहीं होते—उसके सपने देखने वाले युवा होते हैं। और उन सपनों की रक्षा करना हर लोकतांत्रिक सरकार की पहली जिम्मेदारी है।





