अशोक भाटिया
पंजाब की सियासत हमेशा से देश की राजनीति में एक अलग और विशिष्ट स्थान रखती रही है। सीमावर्ती राज्य होने के कारण यहाँ की सुरक्षा, सामाजिक ताना-बाना और आर्थिक चुनौतियाँ राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती हैं। हाल के दिनों में पंजाब के राजनीतिक परिदृश्य में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य के चुनावी रण में सीधे तौर पर कदम रखा। उनकी रैलियों, घोषणाओं और आक्रामक राजनीतिक तेवरों ने पंजाब की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी है। इस प्रविष्टि से न केवल राज्य के चुनावी समीकरणों में बदलाव के संकेत मिल रहे हैं, बल्कि लंबे समय से चले आ रहे पारंपरिक गठबंधनों और राजनीतिक प्राथमिकताओं को भी एक नया आकार मिलता दिख रहा है।
जालंधर की रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंच पर ‘हरी पगड़ी’ पहनकर आना एक बड़ा राजनीतिक संकेत था. हरी पगड़ी पारंपरिक रूप से पंजाब में किसानों और कृषि क्रांति का प्रतीक मानी जाती है। इसके जरिए उन्होंने यह संदेश देने की कोशिश की कि वे किसानों की भावनाओं और पहचान का सम्मान करते हैं और भाजपा किसान विरोधी नहीं है. प्रधानमंत्री ने अपने भाषणों में चतुर राजनीतिक चाल चलते हुए पड़ोसी राज्य हरियाणा का उदाहरण पेश किया. उन्होंने रेखांकित किया कि हरियाणा में भाजपा सरकार किसानों की 24 फसलों पर MSP दे रही है. इसके माध्यम से पंजाब के किसानों के बीच यह नैरेटिव सेट करने की कोशिश की जा रही है कि यदि पंजाब में भी ‘डबल इंजन सरकार’ आती है, तो यहाँ के किसानों को भी वैसा ही वित्तीय और ढांचागत लाभ मिल सकता है, जो आम आदमी पार्टी या कांग्रेस सरकार नहीं दे पा रही है।
पंजाब का राजनीतिक इतिहास मुख्य रूप से शिरोमणि अकाली दल और कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमता रहा है। पिछले कुछ वर्षों में आम आदमी पार्टी ने यहाँ एक मजबूत ताकत के रूप में उभरकर सत्ता हासिल की, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय हो गया। अब, भारतीय जनता पार्टी द्वारा अकेले चुनाव लड़ने के फैसले और प्रधानमंत्री मोदी के सीधे कमान संभालने से यह मुकाबला पूरी तरह से चतुष्कोणीय और बेहद जटिल हो गया है।अकाली दल के साथ दशकों पुराने गठबंधन के टूटने के बाद, भाजपा को पंजाब में एक जूनियर पार्टनर या सिर्फ शहरी इलाकों तक सीमित पार्टी के रूप में देखा जाता था। लेकिन प्रधानमंत्री की एंट्री ने भाजपा को एक स्वतंत्र और आक्रामक विकल्प के रूप में पेश किया है। प्रधानमंत्री की जनसभाओं में उमड़ी भीड़ और उनके भाषणों के तेवर यह साफ करते हैं कि भाजपा अब राज्य में केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए नहीं, बल्कि मुख्यधारा की ताकत बनने के इरादे से उतर चुकी है।
प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति की एक बड़ी विशेषता यह रही है कि वे हर चुनाव को केंद्र सरकार की योजनाओं और राष्ट्रीय प्रगति से जोड़ते हैं। पंजाब में भी उन्होंने इसी रणनीति को आगे बढ़ाया है। उन्होंने जालंधर और अन्य क्षेत्रों में हजारों करोड़ रुपये की रेल और सड़क बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की सौगात देकर विकास के नैरेटिव को धार दी है।पंजाब लंबे समय से भारी कर्ज, उद्योगों के पलायन और कृषि क्षेत्र में ठहराव जैसी आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में प्रधानमंत्री ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि राज्य की इन गहरी आर्थिक समस्याओं का समाधान केवल केंद्र और राज्य में एक ही दल की सरकार यानी ‘डबल इंजन सरकार’ के माध्यम से ही संभव है। यह नैरेटिव विशेष रूप से पंजाब के शहरी मतदाताओं, व्यापारियों और युवाओं को आकर्षित कर सकता है, जो राज्य में औद्योगिक पुनरुद्धार और रोजगार के नए अवसरों की तलाश में हैं।
प्रधानमंत्री ने पंजाब की धरती से राज्य की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पर तीखे हमले किए हैं। उन्होंने ‘आप’ सरकार को कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार के मोर्चे पर घेरते हुए ‘कट्टर बेईमान’ की संज्ञा दी, तो वहीं कांग्रेस को अंदरूनी कलह और दिशाहीनता का शिकार बताया।इस सीधे हमले का असर यह होगा कि अब तक जो मुकाबला ‘आप’ बनाम कांग्रेस या ‘आप’ बनाम अकाली दल के बीच सिमटा हुआ दिख रहा था, वह अब केंद्र बनाम राज्य के मुद्दों पर केंद्रित हो सकता है। विपक्ष को अब न केवल अपनी लोकलुभावन योजनाओं का बचाव करना होगा, बल्कि केंद्र द्वारा उठाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय कुप्रबंधन के सवालों का भी जवाब देना होगा। इससे क्षेत्रीय दलों को अपनी रणनीतियों में बदलाव करने और रक्षात्मक मुद्रा से बाहर आने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
पंजाब की जनसांख्यिकी बेहद अनूठी है। यहाँ लगभग 32 प्रतिशत दलित आबादी है, जो देश के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में आनुपातिक रूप से सबसे अधिक है। इसके साथ ही, सिख और हिंदू मतदाताओं का संतुलन राज्य की सत्ता की चाबी तय करता है। प्रधानमंत्री मोदी की रणनीति इन सभी वर्गों को एक साथ साधने की दिख रही है।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में सिख समुदाय के लिए कई ऐतिहासिक कदम उठाए हैं, जैसे करतारपुर साहिब कॉरिडोर को खोलना, गुरु तेग बहादुर जी का प्रकाश पर्व लाल किले से मनाना, वीर बाल दिवस की शुरुआत और 1984 के दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने की कोशिशें। प्रधानमंत्री अपनी रैलियों में इन कदमों का जिक्र कर सिख मतदाताओं के मन में यह विश्वास जगाने की कोशिश कर रहे हैं कि उनकी सरकार पंथिक भावनाओं का सम्मान करती है।
इस समय पंजाब की राजनीति में विभिन्न डेरों (जैसे डेरा सचखंड बलान और राधा स्वामी सत्संग ब्यास) का गहरा प्रभाव है, जिनसे बड़ी संख्या में दलित और पिछड़े वर्ग के लोग जुड़े हैं। प्रधानमंत्री का इन डेरों के संतों और प्रमुखों से मिलना सीधे तौर पर इस विशाल मतदाता वर्ग को एक सकारात्मक संदेश देने का प्रयास है। यदि भाजपा इस वर्ग में सेंध लगाने में सफल रहती है, तो यह पंजाब की पारंपरिक राजनीति के लिए सबसे बड़ा उलटफेर होगा।
एक सीमावर्ती राज्य होने के नाते पंजाब में राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बेहद संवेदनशील है। ड्रोन के जरिए हथियारों और ड्रग्स की तस्करी, और सीमा पार से पैदा होने वाले खतरे हमेशा चिंता का विषय रहे हैं। प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अक्सर इस बात पर जोर देते हैं कि पंजाब जैसे संवेदनशील राज्य में एक मजबूत और दृढ़ इच्छाशक्ति वाली सरकार की जरूरत है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता न करे।नशीली दवाओं (ड्रग्स) के संकट से पंजाब की युवा पीढ़ी लंबे समय से प्रभावित रही है। प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे को सीधे तौर पर उठाते हुए इसे राज्य के भविष्य के साथ खिलवाड़ बताया है। राष्ट्रवाद और आंतरिक सुरक्षा के इस मिश्रण से भाजपा उन मतदाताओं को एकजुट करने का प्रयास कर रही है, जो राज्य की शांति और स्थिरता को सर्वोपरि मानते हैं।
भले ही प्रधानमंत्री मोदी की एंट्री से भाजपा के कार्यकर्ताओं में नया जोश आया है और राजनीतिक विमर्श बदला है, लेकिन पंजाब की राह पार्टी के लिए कांटों भरी भी है।
जैसे तीन कृषि कानूनों के खिलाफ हुए लंबे किसान आंदोलन की यादें अभी भी पंजाब के ग्रामीण इलाकों, विशेषकर मालवा क्षेत्र में ताजा हैं। हालांकि सरकार ने कानून वापस ले लिए थे, लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी और अन्य मुद्दों को लेकर किसानों का एक बड़ा वर्ग अभी भी केंद्र सरकार से असंतुष्ट है। प्रधानमंत्री के लिए ग्रामीण पंजाब और किसान यूनियनों के इस विरोध को शांत करना एक बड़ी चुनौती होगी।इसके अलावाअकाली दल के साथ लंबे समय तक रहने के कारण भाजपा का अपना कैडर मुख्य रूप से शहरों तक ही सीमित रहा। ग्रामीण इलाकों में बूथ स्तर पर मजबूत संगठन खड़ा करना रातोंरात संभव नहीं है। भले ही कई बड़े नेता दूसरी पार्टियों से टूटकर भाजपा में शामिल हुए हैं, लेकिन उन्हें जमीन पर स्वीकार्यता दिलाना और स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ उनका तालमेल बिठाना एक कठिन काम है।
वैसे पंजाब के सियासी समर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एंट्री महज एक चुनावी औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह पंजाब की पारंपरिक राजनीतिक दिशा को बदलने का एक गंभीर प्रयास है। उनके आने से राज्य का चुनाव अब स्थानीय मुद्दों और मुफ्त की योजनाओं के वादों से आगे बढ़कर राष्ट्रीय सुरक्षा, औद्योगिक विकास, और केंद्र-राज्य संबंधों के व्यापक फलक पर पहुंच गया है।
यह एंट्री ‘आप’ के लिए अपनी सत्ता बचाने की, कांग्रेस के लिए अपने अस्तित्व को पुनर्जीवित करने की और अकाली दल के लिए अपनी खोई हुई पंथिक जमीन वापस पाने की परीक्षा बन गई है। वहीं भाजपा के लिए यह साबित करने का मौका है कि वह बिना किसी क्षेत्रीय बैसाखी के भी पंजाब के मतदाताओं के दिल में जगह बना सकती है। आने वाले दिन इस बात का फैसला करेंगे कि प्रधानमंत्री का यह आक्रामक अंदाज पंजाब के जटिल सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने में कितना गहरा असर छोड़ पाता है, लेकिन एक बात तय है कि पंजाब की राजनीति अब वैसी नहीं रहेगी जैसी वह मोदी की एंट्री से पहले थी। चुनाव परिणाम जो भी हों, पंजाब एक नए राजनीतिक संक्रांति काल से गुजर रहा है।





