ललित गर्ग
सृजन में शोर नहीं होता। साधना के जुबान नहीं होती। किंतु सिद्धि में वह शक्ति होती है कि हजारों पर्वतों को तोड़कर भी उजागर हो उठती है। यह कथन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अक्षरशः सत्य सिद्ध होता है। संघ अपने स्थापना के सौवें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। वर्ष 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा बोया गया एक छोटा-सा संगठनात्मक बीज आज भारतीय समाज के सबसे व्यापक स्वयंसेवी संगठनों में विकसित हो चुका है। इन सौ वर्षों में संघ ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे-स्वतंत्रता आंदोलन का दौर, देश का विभाजन, प्रतिबंध, आपातकाल, सामाजिक परिवर्तन, वैश्वीकरण, कोरोना महामारी और विकसित भारत की नई आकांक्षाएं। इन सभी चरणों में संघ ने स्वयं को केवल एक संगठन के रूप में नहीं, बल्कि सेवा, संस्कार, संगठन और राष्ट्रचेतना के माध्यम के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। यही कारण है कि संघ की शताब्दी केवल किसी संगठन की यात्रा का उत्सव नहीं, बल्कि इस सार्थक एवं राष्ट्र-निर्माण की विचार-यात्रा का मूल्यांकन भी है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में प्रकाशित ‘आरएसएस एट 100: एक सदी संकल्प की’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण पुस्तक बनकर सामने आती है। प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित इस कृति के लेखक श्याम जाजू और अनुपम त्रिवेदी हैं। लेखक द्वय की इस पुस्तक में संघ के अतीत एवं भविष्य की विवेचना करते हुए भारत एवं नया भारत निर्मित करने में उसकी भूमिका को उजागर किया है और उसके इतिहास में सच्चाई के प्रतिबिम्बों को उभारने पर बल दिया है। संघ के इतिहास को धूमिल किया गया, धुंधलाया गया है, अन्यथा संघ का इतिहास दुनिया के लिये एक प्रेरणा है, अनुकरणीय है। क्योंकि संघ एक ऐसा शांति-अहिंसामय संगठन है, जो हर मोड पर निरंतरता लिये हुए सृजनात्मक बना रहा है। इसी निरंतरता में संघ की पहली शताब्दी का महत्व निहित है और शायद अगली शताब्दी के संकल्पों की दिशा भी।
सम्पूर्ण दुनिया भारत की ओर देख रही है, उसमें विश्व गुरु की पात्रता निरन्तर प्रवहमान रही है, हमने कोरोना महामारी के एक जटिल एवं संघर्षमय दौर में दुनिया के सभी देशों के हित-चिन्तन का भाव रखा, सबका साथ, सबका विकास एवं सबका विश्वास मंत्र के द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने साबित किया कि वसुधैव कुटुम्बकम- दुनिया एक परिवार है, का भारतीय दर्शन ही मानवता का उजला भविष्य है। इसी विचार पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आगे बढ़ रहा है, वह एक अनोखा और दुनिया का सबसे बड़ा गैर राजनीतिक संगठन है। यह भारतीय राष्ट्रवाद की सबसे मुखर, सबसे प्रखर आवाज है। देश की सुरक्षा, एकता और अखंडता उसका मूल उद्देश्य है। जैसे-जैसे संघ का वैचारिक, सांस्कृतिक, सामाजिक प्रभाव देश और दुनिया में बढ़ रहा है, वैसे-वैसे हिंदुत्व और राष्ट्र के प्रति समर्पित इस संगठन के बारे में जानने और समझने की ललक लोगों के बीच बढ़ती जा रही है। इस विशाल संगठन के विभिन्न विषयों पर विचार तथा इसकी कार्यप्रणाली से आमजन परिचित होना चाहते हैं। जाजू एवं त्रिवेदी की पुस्तक संघ से जुड़ी जिज्ञासाओं का प्रभावी, प्रासंगिक एवं तथ्यपरक विवेचन करती है। एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होते हुए भी संघ ने भारतीय राजनीति की दिशा को राष्ट्रीयता की ओर कैसे परिवर्तित किया है, यह समझने के लिए भी यह पुस्तक पढ़ना आवश्यक है। भारत का विश्वगुरु के रूप में अभ्युदय एक महत्वपूर्ण प्रश्न रहा जिसकी विवेचना लेखक ने समग्र रूप से प्रस्तुत पुस्तक में की है, जो संघ के शताब्दी वर्ष की आयोजना का मूल केन्द्र है। इस महत्वपूर्ण पुस्तक का लोकार्पण भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन ने उपराष्ट्रपति एन्क्लेव में किया। समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय तथा अनेक विशिष्ट जनों की उपस्थिति ने इसे केवल पुस्तक-विमोचन तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि संघ की शताब्दी यात्रा पर एक राष्ट्रीय विमर्श का स्वरूप प्रदान किया। रक्षा मंत्री श्री राजनाथ सिंह ने संघ-इतिहास से जुड़ी अनेक नये सन्दर्भो एवं बातों को विवेचित करते हुए कहा कि किस तरह से संघ पिछले सौ वर्षों से राष्ट्र और समाज की सेवा कर रहा है, किंतु उसके बारे में आज भी अनेक भ्रांतियां और पूर्वाग्रह मौजूद हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक उन भ्रमों को दूर करने और संघ के वास्तविक स्वरूप को समझने का सशक्त माध्यम बनेगी। यह टिप्पणी इस पुस्तक की मूल आत्मा भी है, क्योंकि इसका उद्देश्य केवल संघ का गुणगान करना नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक यात्रा, संगठनात्मक विकास, राष्ट्र निर्माण में भूमिका तथा भविष्य की दिशा को तथ्यपरक ढंग से सामने रखना है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह संघ को केवल अतीत के संदर्भ में नहीं देखती, बल्कि विकसित भारत-2047, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, सामाजिक समरसता, आत्मनिर्भरता, सेवा, राष्ट्रीय सुरक्षा और वैश्विक भारत की उभरती भूमिका के साथ जोड़कर उसका विश्लेषण करती है। इसलिए यह केवल संघ के इतिहास का दस्तावेज नहीं, बल्कि नए भारत के वैचारिक विमर्श का भी एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है।
पुस्तक का स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा अध्याय विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लंबे समय से यह आरोप लगाया जाता रहा है कि संघ का स्वतंत्रता आंदोलन में कोई योगदान नहीं था। पुस्तक इस धारणा का ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर प्रतिवाद करती है। इसमें डॉ. हेडगेवार की स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका, उनके कारावास, भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान स्वयंसेवकों द्वारा क्रांतिकारियों को सहयोग तथा विभाजन के समय राहत और सुरक्षा कार्यों का विस्तार से उल्लेख किया गया है। पुस्तक का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसमें संघ को राजनीति से जोड़कर देखने की सीमित दृष्टि का विस्तार किया गया है। इसमें स्पष्ट किया गया है कि संघ स्वयं राजनीतिक दल नहीं है, बल्कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले व्यक्तियों का निर्माण करने वाला संगठन है। शिक्षा, ग्राम विकास, पर्यावरण, सेवा, संस्कृति, श्रमिक संगठन, छात्र आंदोलन, महिला सशक्तीकरण, अनुसूचित वर्गों के उत्थान तथा आपदा राहत जैसे अनेक क्षेत्रों में संघ प्रेरित संगठनों की भूमिका का विस्तृत परिचय दिया गया है। विशेष रूप से सेवा कार्यों का विवरण इस पुस्तक की आत्मा है। कोरोना महामारी, प्राकृतिक आपदाओं, सीमावर्ती क्षेत्रों, वनवासी समाज तथा अभावग्रस्त वर्गों के बीच संघ और उसके स्वयंसेवकों द्वारा किए गए कार्यों को तथ्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि संघ का सेवा कार्य केवल संकट के समय तक सीमित नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली सामाजिक साधना है।
पुस्तक में संघ से जुड़े अनेक मिथकों और विवादों पर भी खुलकर चर्चा की गई है। हिंदू राष्ट्र की अवधारणा, जाति व्यवस्था, आरक्षण, महिलाओं की भूमिका, अल्पसंख्यकों के प्रति दृष्टिकोण तथा लोकतंत्र के प्रति संघ की प्रतिबद्धता जैसे विषयों को विस्तार से समझाया गया है। विशेष रूप से राष्ट्र सेविका समिति के माध्यम से महिलाओं की सहभागिता का विवरण उन धारणाओं को चुनौती देता है कि संघ में महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। पुस्तक का एक आकर्षक अध्याय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़ती भूमिका को संघ की वैचारिक दृष्टि से देखता है।
वैचारिक दृष्टि से देखें तो पुस्तक बार-बार इस तथ्य को रेखांकित करती है कि संघ का मूल उद्देश्य सत्ता प्राप्ति नहीं, बल्कि चरित्रवान नागरिकों का निर्माण है। संघ के अनुसार राष्ट्र निर्माण का आधार व्यक्ति निर्माण है। शाखा इसी उद्देश्य की प्रयोगशाला है, जहां अनुशासन, सेवा, नेतृत्व और सामाजिक समरसता का अभ्यास कराया जाता है। यही कारण है कि पुस्तक बार-बार यह स्थापित करती है कि स्वयंसेवक ही संघ का वास्तविक परिचय है। निस्संदेह किसी भी वैचारिक पुस्तक की तरह इस पुस्तक को भी विभिन्न दृष्टिकोणों से पढ़ा जा सकता है। आलोचक इसके कुछ निष्कर्षों पर असहमति व्यक्त कर सकते हैं, जबकि समर्थकों को इसमें अपने विचारों का प्रामाणिक आधार मिलेगा। किंतु इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पाठक को पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर संघ को उसके अपने संदर्भों में समझने का अवसर देती है। यही किसी भी गंभीर वैचारिक पुस्तक की सफलता होती है। संघ के विषय में पहले भी अनेक महत्त्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, जिनमें ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-सेवा, समर्पण और राष्ट्र निर्माण के 100 वर्ष’, ‘कृति रूप संघ दर्शन’, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पहली अग्निपरीक्षा’, तथा सुनील आंबेकर की चर्चित कृति ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ: स्वर्णिम भारत के दिशा-सूत्र’ उल्लेखनीय हैं। इन कृतियों की परंपरा में ‘आरएसएस एट 100’ अपनी समकालीन प्रस्तुति, व्यापक शोध और संतुलित संरचना के कारण विशिष्ट स्थान प्राप्त करती है।





