अशोक भाटिया
अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भू-राजनीति का यह एक सर्वमान्य सिद्धांत है कि शांति, सौहार्द और परस्पर सम्मान की बातें केवल तभी अर्थपूर्ण होती हैं जब दोनों पक्ष समान इरादों और ईमानदारी के साथ बातचीत की मेज पर बैठें। लेकिन जब सामना चीन जैसे विस्तारवादी और अत्यधिक अविश्वसनीय पड़ोसी से हो, तो शांति वार्ताओं के बीच भी सतर्कता को कम करना आत्मघाती साबित हो सकता है। पिछले दिनों लद्दाख सीमा को लेकर भारत और चीन के बीच उपजा ताजा विवाद इसी कड़वी हकीकत का नया और जीवंत दस्तावेज है।भारत सरकार द्वारा लद्दाख के २८ रणनीतिक और भौगोलिक स्थानों के आधिकारिक नामों का मानकीकरण करने और उन्हें भारतीय सर्वेक्षण विभाग के मानचित्र पर जारी करने के बाद बीजिंग की जो तीखी और भड़काऊ प्रतिक्रिया आई है, उसने एक बार फिर साफ कर दिया है कि ड्रैगन की नीयत में खोट बरकरार है। चीन के इस बदले सुर पर भारतीय विदेश मंत्रालय ने जो दो टूक जवाब दिया है, वह नए भारत की उस ‘आक्रामक कूटनीति’ का प्रतीक है जो अपनी संप्रभुता के मामले में ‘नो टॉलरेंस’ यानी शून्य सहिष्णुता की नीति पर चलती है।
इस ताजा विवाद की संवेदनशीलता को समझने के लिए हमें मई २०२० के उस कालखंड को याद करना होगा, जब पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में चीनी सेना ने धोखे से भारतीय सैनिकों पर हिंसक हमला किया था। उस झड़प में भारत के २० वीर जवानों ने सर्वोच्च बलिदान दिया था। उस हिंसक घटना ने पिछले कई दशकों से दोनों देशों के बीच चले आ रहे सीमाई समझौतों और विश्वास बहाली के उपायों को एक ही झटके में पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया था।गलवान के बाद से दोनों देशों के बीच सैन्य गतिरोध को समाप्त करने के लिए सैन्य और राजनयिक स्तर पर दर्जनों दौर की मैराथन बैठकें हो चुकी हैं। इन वार्ताओं के परिणामस्वरूप पैंगोंग त्सो, गोगरा और हॉट स्प्रिंग्स जैसे कुछ बेहद संवेदनशील विवादित बिंदुओं से सैनिकों को पीछे हटाने में आंशिक सफलता जरूर मिली, लेकिन देपसांग के मैदानों और डेमचोक जैसे अत्यंत रणनीतिक इलाकों में गतिरोध अब भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। दोनों सेनाएं आज भी भारी साजो-सामान के साथ आमने-सामने डटी हुई हैं।इसी जटिल पृष्ठभूमि के बीच, भारत सरकार ने लद्दाख क्षेत्र में अपने प्रशासनिक और भौगोलिक नियंत्रण को और अधिक सुदृढ़ व पारदर्शी बनाने का एक महत्वपूर्ण कदम उठाया। लद्दाख के २८ विशिष्ट स्थानों के आधिकारिक नामों को तय करना भारत का पूरी तरह से एक आंतरिक और संप्रभु फैसला था। इसका मुख्य उद्देश्य इन सुदूर क्षेत्रों की सटीक भौगोलिक पहचान सुनिश्चित करना और राष्ट्रीय मानचित्र को अपडेट करना था। लेकिन भारत के इस वैध और न्यायसंगत कदम ने बीजिंग के सत्ता गलियारों में खलबली मचा दी।
भारत के इस प्रशासनिक कदम पर चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने जो आधिकारिक बयान दिया, वह अंतरराष्ट्रीय मर्यादाओं के सर्वथा विपरीत था। चीनी प्रवक्ता ने सीधे तौर पर भारत द्वारा बनाए गए ‘केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख’ के विधिक अस्तित्व को ही सिरे से नकार दिया। उन्होंने दावा किया कि चीन ने भारत द्वारा गठित लद्दाख को कभी भी अपनी मान्यता नहीं दी है और भारत के नक्शे पर जारी किए गए ये २८ मानक नाम ‘अवैध और अमान्य’ हैं। इसके साथ ही उन्होंने वही पुराना चीनी राग अलापा कि सीमा का यह पश्चिमी क्षेत्र हमेशा से चीन का हिस्सा रहा है।चीन का यह भ्रामक बयान उसकी उसी कुख्यात रणनीति का हिस्सा है, जिसे कूटनीति की भाषा में ‘सलामी स्लाइसिंग’ (Salami Slicing) या धीरे-धीरे दूसरों की जमीन पर दावा ठोकने की नीति कहा जाता है। ध्यान रहे कि यह वही चीन है जो पिछले कुछ वर्षों से भारत के पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश के विभिन्न स्थानों के मनगढ़ंत नाम रखकर अपनी आधिकारिक वेबसाइटों पर जारी करता रहा है। लेकिन जब भारत ने लद्दाख में अपने ही क्षेत्रों के नामों का मानकीकरण किया, तो चीन को अपनी रणनीतिक जमीन खिसकती हुई महसूस हुई। चीन की यह बौखलाहट साफ दर्शाती है कि भारत के इस कूटनीतिक प्रहार ने सीधे उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया है।
चीन के इस भड़काऊ बयान पर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने जो प्रतिक्रिया दी, वह बेहद नपी-तुली, कठोर और निर्णायक थी। भारत ने बीजिंग को स्पष्ट शब्दों में आईना दिखाते हुए कहा कि “केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख भारत का एक अभिन्न, अटूट और अविभाज्य हिस्सा था, है और हमेशा रहेगा।” भारत ने साफ कर दिया कि चीनी पक्ष की ओर से कितना भी इनकार या भ्रामक बयानबाजी की जाए, इससे स्थापित जमीनी और ऐतिहासिक हकीकत को तनिक भी बदला नहीं जा सकता।
भारत का यह सख्त रुख इस बात का प्रमाण है कि नई दिल्ली अब बीजिंग के साथ किसी भी प्रकार के कूटनीतिक दबाव या रक्षात्मक मुद्रा में रहने को बिल्कुल तैयार नहीं है। अतीत के दशकों में भारत अक्सर चीन की ऐसी हरकतों पर केवल औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराकर शांत हो जाता था, जिससे चीन का दुस्साहस बढ़ता था। लेकिन आज का भारत चीनी आक्रामकता का जवाब उसी की भाषा में देने की पूर्ण सैन्य और राजनीतिक क्षमता रखता है। लद्दाख हमारी अपनी संप्रभु भूमि है, और वहां किसी भी स्थान का नाम तय करना और बुनियादी ढांचे का चौतरफा विकास करना भारत का पूर्ण विधिक अधिकार है, जिस पर किसी बाहरी शक्ति की आपत्ति को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे घटनाक्रम से चीन का दोहरा चरित्र एक बार फिर दुनिया के सामने बेनकाब हो गया है। एक तरफ चीन वैश्विक मंचों पर संबंधों को सामान्य बनाने का स्वांग रचता है, तो दूसरी तरफ भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है। चीन की असल चिंता यह है कि लद्दाख के सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में आने के बाद से वहां ऑल-वेदर रोड्स, पुल और रणनीतिक हवाई पट्टियों का निर्माण इतनी तेजी से हुआ है कि अब चीनी सेना के लिए १९६२ या २०२० जैसी हिमाकत करना असंभव हो गया है। भारत की इसी रणनीतिक मजबूती से चीन घबराया हुआ है।अब भारत की विदेश नीति में एक बड़ा ‘पैराडाइम शिफ्ट’ आ चुका है। भारत अब समझ चुका है कि चीन केवल शक्ति और दृढ़ता की भाषा समझता है। लद्दाख के २८ स्थानों के नामों का यह मानकीकरण भारत की इसी ‘सक्रिय कूटनीति’ का हिस्सा है। भारत ने चीन को यह संदेश दे दिया है कि यदि आप अरुणाचल प्रदेश में नाम बदलने का खेल खेल सकते हैं, तो भारत भी अपनी प्रशासनिक संप्रभुता को वैश्विक पटल पर पूरी मजबूती से रेखांकित कर सकता है।
लद्दाख को लेकर उपजा यह ताजा विवाद कोई तात्कालिक घटना नहीं है, बल्कि यह भारत और चीन के बीच आने वाले लंबे रणनीतिक संघर्ष की एक बानगी है। वसई की इस प्रबुद्ध धरा से देश के नीति निर्माताओं को यही संदेश जाना चाहिए कि चीन पर आंख मूंदकर भरोसा करना एक ऐतिहासिक भूल होगी। भारत को अपनी सीमाई सुरक्षा, सैन्य आधुनिकीकरण और रणनीतिक बुनियादी ढांचे के विकास की गति को और तेज करना होगा।चीन के इन बिगड़े सुरों को उसकी ताकत नहीं, बल्कि उसकी कूटनीतिक हताशा के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत ने जो दो टूक जवाब दिया है, वह एक संप्रभु राष्ट्र के स्वाभिमान का शंखनाद है। दुनिया को यह संदेश जा चुका है कि भारत अपनी एक इंच जमीन का सौदा तो दूर, अपनी सीमाओं की तरफ उठने वाली किसी भी उंगली को बर्दाश्त नहीं करेगा। लद्दाख भारत का मस्तक है, और इसे ऊंचा रखने के लिए भारत हर मोर्चे पर पूरी तरह सक्षम और तैयार है।





