दशहराः शौर्य, साधना एवं नवसंकल्प का महापर्व

Dussehra: The great festival of bravery, spiritual practice and new determination.

ललित गर्ग

भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने जीवन के उत्सवों को केवल आनंद और उल्लास तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें आत्मचिंतन, साधना, संस्कार और जीवन-परिवर्तन का माध्यम बनाया है। यहां प्रत्येक पर्व अपने भीतर कोई न कोई शाश्वत संदेश समेटे हुए है। दशहरा अथवा विजयादशमी ऐसा ही प्रेरणाप्रद पर्व है, जो भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों, आध्यात्मिक परंपराओं और जीवन-दर्शन से जुड़कर मनुष्य को सत्य, साहस, सदाचार और आत्मविजय की राह दिखाता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि जीवन की वास्तविक विजय दूसरों को पराजित करने में नहीं, बल्कि अपने भीतर विद्यमान दुर्बलताओं, विकारों और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने में है। असत्य पर सत्य, अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और अधर्म पर धर्म की विजय का यह उत्सव भारतीय जनमानस में सदियों से नई ऊर्जा, नया विश्वास और नया संकल्प भरता आया है।

दशहरे की सांस्कृतिक चेतना का सबसे प्रभावशाली आधार भगवान श्रीराम की रावण पर विजय है। रामायण का यह प्रसंग केवल एक ऐतिहासिक अथवा पौराणिक युद्ध की परिणति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और अहंकार के बीच संघर्ष का शाश्वत आख्यान है। श्रीराम मर्यादा, करुणा, सत्य, कर्तव्य और धर्मनिष्ठा के प्रतीक हैं, जबकि रावण ज्ञान, सामर्थ्य और वैभव से संपन्न होने के बावजूद अहंकार, अनियंत्रित इच्छाओं और अनैतिक आचरण का प्रतीक बन जाता है। रावण का व्यक्तित्व इस सत्य को उजागर करता है कि ज्ञान यदि विवेक से, शक्ति यदि मर्यादा से और समृद्धि यदि नैतिकता से विमुख हो जाए, तो मनुष्य के पतन का कारण बन जाती है। श्रीराम की विजय इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों का परित्याग नहीं किया। दशहरा हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी ही कठिन क्यों न हों, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अंततः समाज की आस्था और इतिहास की प्रेरणा बनता है।

भारतीय संस्कृति में दशहरे का संबंध केवल राम की विजय से नहीं, बल्कि मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी जुड़ा है। नवरात्र के नौ दिनों में शक्ति की आराधना और दसवें दिन विजयादशमी का उत्सव इस बात का प्रतीक है कि साधना के बाद सिद्धि, संघर्ष के बाद सफलता और आत्मबल के जागरण के बाद विजय का मार्ग प्रशस्त होता है। मां दुर्गा की उपासना हमें यह संदेश देती है कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए शक्ति और संवेदना, साहस और विवेक तथा पराक्रम और करुणा का समन्वय आवश्यक है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति का अर्थ केवल बाहुबल अथवा प्रभुत्व नहीं है, बल्कि आत्मबल, इच्छाशक्ति, धैर्य, आत्मसंयम और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की नैतिक क्षमता भी है। इसीलिए दशहरा शक्ति की साधना के साथ-साथ उस शक्ति के सदुपयोग का भी पर्व है।

दशहरा पर्व का आध्यात्मिक पक्ष अत्यंत गहरा है। बाहरी रावण का दहन तभी सार्थक है, जब मनुष्य अपने भीतर बैठे रावण को पहचानने और परास्त करने का साहस जुटाए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी जैसी प्रवृत्तियां मनुष्य के व्यक्तित्व को भीतर से दुर्बल बनाती हैं। रावण के दस सिरों को इन दस विकारों के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है। प्रतिवर्ष रावण के पुतले जलते हैं, आतिशबाजी होती है और उत्सव संपन्न हो जाता है, लेकिन यदि हमारे भीतर ईर्ष्या, छल, स्वार्थ, द्वेष और अहंकार जीवित रहें, तो विजयादशमी का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सच्चा दशहरा वह है, जब हम किसी के प्रति अपने मन में पल रहे द्वेष को समाप्त करें, अपने व्यवहार से छल को निकालें, अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को स्वीकारें और अपनी सफलता में दूसरों के योगदान को भी सम्मान दें। आत्मविजय ही सभी विजयों का आधार है।दशहराः शौर्य, साधना एवं नवसंकल्प का महापर्व

भारतीय संस्कृति उत्सव को साधना और साधना को जीवन की श्रेष्ठता से जोड़ती है। विजयादशमी इसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है। इस दिन शस्त्रपूजा की जाती है, नए कार्यों का शुभारंभ होता है और विजय की कामना के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लिया जाता है। शस्त्रपूजा का वास्तविक अर्थ केवल अस्त्रों की आराधना नहीं, बल्कि शक्ति के प्रति श्रद्धा और उसके उत्तरदायी उपयोग का संकल्प है। आज के संदर्भ में हमारे शस्त्र ज्ञान, विवेक, शिक्षा, विज्ञान, श्रम, नैतिकता और सत्यनिष्ठा भी हैं। यदि इन शक्तियों का उपयोग मानवता के कल्याण के लिए किया जाए, तो वे राष्ट्रनिर्माण के प्रभावशाली साधन बन सकती हैं। दशहरा हमें अकर्मण्यता से कर्मशीलता, निराशा से आशा और निष्क्रियता से सृजनशीलता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह दिन अपने अधूरे संकल्पों को पूरा करने, नई संभावनाओं के द्वार खोलने और जीवन को श्रेष्ठ दिशा देने का अवसर है।

दशहरे का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रकृति, कृषि और लोकजीवन से उसका संबंध भी है। भारतीय समाज में यह पर्व फसल, समृद्धि, ऋतु-परिवर्तन और सामुदायिक उल्लास की परंपराओं से जुड़ा रहा है। शमी वृक्ष की पूजा, उसके पत्तों का आदान-प्रदान और नए कार्यों का शुभारंभ प्रकृति के प्रति श्रद्धा तथा मंगलकामना की भावना को व्यक्त करते हैं। कृषि प्रधान भारत में फसल की समृद्धि केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि धरती, किसान और प्रकृति के परस्पर सहयोग का उत्सव भी है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि मनुष्य की प्रगति प्रकृति से अलग होकर संभव नहीं है। जिस संस्कृति ने वृक्षों, नदियों, पर्वतों और धरती में पवित्रता का अनुभव किया, उसकी उत्सवधर्मिता में पर्यावरण संरक्षण और सह-अस्तित्व की प्रेरणा भी अंतर्निहित है। आज जब पर्यावरणीय संकट मानवता के सामने गंभीर चुनौती बन रहा है, तब दशहरा हमें प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पुनः समझने का अवसर देता है।

विजयादशमी भारतीय संस्कृति की समन्वयकारी चेतना का भी उत्सव है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में इसे विविध रूपों में मनाया जाता है। कहीं रामलीला और रावण-दहन होता है, कहीं दुर्गापूजा के बाद मां की विदाई, कहीं शस्त्रपूजा तो कहीं लोकपरंपराओं के माध्यम से विजय का उल्लास व्यक्त किया जाता है। इन विविधताओं के पीछे एक साझा सांस्कृतिक सूत्र है-सत्य के प्रति आस्था, धर्म के प्रति निष्ठा, शक्ति के प्रति सम्मान और जीवन में मंगल की कामना। आज दशहरे के संदेश को अपने सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में उतारना पहले से अधिक आवश्यक है। भ्रष्टाचार, हिंसा, सामाजिक विद्वेष, अनैतिक प्रतिस्पर्धा, छलपूर्ण व्यवहार और स्वार्थपरक राजनीति जैसी प्रवृत्तियां समाज की नैतिक शक्ति को कमजोर करती हैं। इन बुराइयों का अंत केवल भाषणों, नारों अथवा प्रतीकात्मक आयोजनों से नहीं हो सकता। इसके लिए व्यक्तिगत चरित्र, सामाजिक उत्तरदायित्व और संस्थागत ईमानदारी को मजबूत करना होगा। यदि हम अपने कार्यक्षेत्र में प्रामाणिकता अपनाएं, सार्वजनिक जीवन में कर्तव्यनिष्ठ रहें, शिक्षा और चिकित्सा को मानवीय संवेदना से जोड़ें तथा समाज में प्रेम और सद्भाव को बढ़ावा दें, तो यही दशहरे की वास्तविक साधना होगी। राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, सैन्य क्षमता अथवा तकनीकी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, नैतिकता, अनुशासन और परस्पर विश्वास में भी निहित होती है।

दशहरा अंततः बाहरी विजय से अधिक आंतरिक जागरण का पर्व है। यह हमें अपने भीतर प्रकाश का दीप जलाने, निराशाओं के बीच आशा खोजने, कठिनाइयों में साहस बनाए रखने और जीवन को नवसृजन की दिशा देने का संदेश देता है। आइए, इस विजयादशमी पर हम केवल रावण का पुतला जलाने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, स्वार्थ, असत्य और दुर्बलताओं को समाप्त करने का संकल्प लें। सत्य को अपना आधार, विवेक को अपना मार्गदर्शक, करुणा को अपना स्वभाव और कर्म को अपनी साधना बनाएं। यही भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक विरासत का सम्मान है, यही उत्सव की सार्थकता है और यही वह विजय है, जो व्यक्ति के जीवन को प्रकाशित करते हुए परिवार, समाज और राष्ट्र में नई चेतना का संचार कर सकती है। क्योंकि सच्चा दशहरा तभी है, जब रावण का दहन मैदान में ही नहीं, मन में भी हो; विजय का उत्सव केवल आतिशबाजी में नहीं, आचरण में दिखाई दे; और प्रकाश केवल दीपों में नहीं, हमारे विचारों, संस्कारों तथा कर्मों में भी प्रकट हो।