अशोक भाटिया
भारत निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची का विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण लोकतांत्रिक प्रक्रिया को शुद्ध, पारदर्शी और सशक्त बनाने की दिशा में हमेशा एक सराहनीय और युगांतकारी कदम रहा है। किसी भी गतिशील लोकतंत्र में मतदाता सूची केवल नामों का संकलन मात्र नहीं होती, बल्कि यह उस देश के नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों की बुनियाद होती है। समय-समय पर इस सूची का पुनरीक्षण करना यह सुनिश्चित करता है कि देश का कोई भी वैध नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न रहे और कोई भी अवैध या फर्जी प्रविष्टि लोकतंत्र के पवित्र जनादेश को दूषित न कर सके।
निर्वाचन आयोग की इस नियमित और व्यापक कवायद का मुख्य उद्देश्य एक त्रुटिहीन मतदाता सूची तैयार करना है। बदलते समय के साथ जनसंख्या में तीव्र प्रवास , नए युवाओं का अर्हता आयु प्राप्त करना और नागरिकों की मृत्यु जैसे कारक मतदाता सूची में निरंतर बदलाव की मांग करते हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए चुनाव आयोग तकनीकी नवाचारों और धरातलीय सत्यापन के माध्यम से मतदाता सूची को अद्यतन करता है। जहां एक ओर बुद्धिजीवियों, नागरिक समाज और आम जनता द्वारा आयोग के इस कदम को भारतीय लोकतंत्र की सेहत के लिए एक आवश्यक बूस्टर डोज माना जाता है, वहीं दूसरी ओर देश के राजनीतिक परिदृश्य में इस प्रक्रिया को लेकर हमेशा से तीखी बहस, आम सहमति और विरोधी दलों का भारी हंगामा भी देखने को मिलता रहा है।
भारतीय चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिस पर देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने की जिम्मेदारी है। मतदाता सूची का पुनरीक्षण इस जिम्मेदारी का सबसे पहला और महत्वपूर्ण चरण है। जब आयोग इस अभियान की शुरुआत करता है, तो इसके तहत कई स्तरों पर काम किया जाता है। पहला स्तर नए मतदाताओं को जोड़ने का होता है। देश में हर साल लाखों युवा 18 वर्ष की आयु पूरी करते हैं। आयोग विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों, सोशल मीडिया और ‘वोटर हेल्पलाइन ऐप’ जैसे डिजिटल माध्यमों से इन नए मतदाताओं को पंजीकृत करने के लिए विशेष शिविर लगाता है। यह प्रक्रिया युवा ऊर्जा को देश की मुख्यधारा की राजनीति से जोड़ने का काम करती है।
दूसरा महत्वपूर्ण स्तर प्रविष्टियों में सुधार और शुद्धिकरण का है। अक्सर पुरानी मतदाता सूचियों में नाम की स्पेलिंग, पते, माता-पिता के नाम या फोटो में त्रुटियां रह जाती हैं, जिसके कारण मतदान के दिन नागरिकों को पोलिंग बूथ से निराश लौटना पड़ता है। पुनरीक्षण प्रक्रिया नागरिकों को इन गलतियों को सुधारने का एक औपचारिक और सुलभ अवसर प्रदान करती है। इसके अलावा, इस प्रक्रिया का सबसे संवेदनशील हिस्सा होता है—अपात्र मतदाताओं के नामों को हटाना। जो नागरिक किसी क्षेत्र को छोड़कर दूसरे राज्य या शहर में बस गए हैं, या जिन मतदाताओं का निधन हो चुका है, उनके नामों को सूची से काटना अनिवार्य होता है। यदि ऐसा न किया जाए, तो चुनाव के दौरान फर्जी मतदान की आशंका अत्यधिक बढ़ जाती है, जो किसी भी निष्पक्ष चुनाव के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
आयोग ने इस पूरी प्रक्रिया को डिजिटल बनाकर और अधिक पारदर्शी बनाने का प्रयास किया है। राष्ट्रीय मतदाता सेवा पोर्टल और बीएलओ के माध्यम से घर-घर जाकर किया जाने वाला भौतिक सत्यापन इस अभियान की रीढ़ है। जब एक साफ-सुथरी और सटीक मतदाता सूची तैयार होती है, तो चुनाव के परिणामों पर किसी को उंगली उठाने का मौका नहीं मिलता। यही कारण है कि देश का जागरूक वर्ग हमेशा निर्वाचन आयोग के इस कदम की सराहना करता है और इसे लोकतांत्रिक शुचिता बनाए रखने के लिए एक अनिवार्य कदम मानता है।
मतदाता सूची का पुनरीक्षण जहां प्रशासनिक रूप से एक सराहनीय और तकनीकी कार्य है, वहीं राजनीतिक रूप से यह एक अत्यधिक संवेदनशील मुद्दा बन जाता है। भारत के चुनावी इतिहास में शायद ही कभी ऐसा हुआ हो जब मतदाता सूची के पुनरीक्षण या उसमें बदलाव की प्रक्रिया बिना किसी राजनीतिक विवाद के संपन्न हुई हो। जब भी चुनाव आयोग इस दिशा में कदम आगे बढ़ाता है, देश के विभिन्न हिस्सों में विपक्षी और विरोधी राजनीतिक दलों द्वारा भारी हंगामा, विरोध प्रदर्शन और आयोग की नीयत पर सवाल उठाने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
विरोधी दलों के इस हंगामे और विरोध के पीछे कई प्रकार की राजनीतिक आशंकाएं, रणनीतियां और जमीनी चिंताएं होती हैं । उनमें प्रमुख है -विपक्षी दलों का सबसे आम और गंभीर आरोप यह होता है कि सत्तारूढ़ दल के दबाव में प्रशासनिक तंत्र या बीएलओ द्वारा उनके पारंपरिक वोट बैंक या विशिष्ट समुदायों के नामों को मतदाता सूची से सामूहिक रूप से हटा दिया गया है। जब भी किसी विशेष मोहल्ले या बस्ती से बड़ी संख्या में नाम कटते हैं, तो विरोधी दल इसे एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश करार देते हैं और सड़कों से लेकर आयोग के दफ्तरों तक भारी हंगामा करते हैं।
विरोधी दलों का अक्सर यह तर्क होता है कि स्थानीय प्रशासन, जो कि राज्य सरकार के अधीन कार्य करता है, पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान निष्पक्ष नहीं रहता। विपक्ष का आरोप होता है कि सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं के इशारे पर उनके समर्थकों के नाम तो आसानी से जोड़ दिए जाते हैं, लेकिन विपक्ष के समर्थकों को फॉर्म भरने के बावजूद सूची में जगह नहीं मिलती या उनके आवेदनों को तकनीकी कमियां बताकर खारिज कर दिया जाता है।कई बार सीमावर्ती राज्यों या अत्यधिक प्रवासन वाले क्षेत्रों में विरोधी दल यह हंगामा करते हैं कि बाहरी या अवैध प्रवासियों के नाम मतदाता सूची में थोक के भाव शामिल किए जा रहे हैं। विपक्ष का दावा होता है कि सत्ता पक्ष अपना चुनावी गणित साधने के लिए अवैध बस्तियों के लोगों को रातों-रात वोटर आईडी कार्ड जारी करवा रहा है, जिससे मूल निवासियों के राजनीतिक अधिकार प्रभावित होते हैं।जब चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को ऑनलाइन करने और आधार कार्ड से जोड़ने जैसी प्रक्रियाओं को बढ़ावा दिया, तब भी विपक्षी दलों ने इस पर भारी आपत्ति जताई। विपक्ष का कहना था कि ग्रामीण इलाकों में आज भी इंटरनेट की पहुंच और डिजिटल साक्षरता की कमी है। ऐसे में डिजिटल माध्यमों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण गरीब, पिछड़े और वंचित वर्ग के लाखों वास्तविक मतदाता सूची से बाहर छूट सकते हैं।
यह हंगामा केवल बयानों तक सीमित नहीं रहता। कई बार राजनीतिक दलों के प्रतिनिधिमंडल चुनाव आयोग के मुख्यालय पहुंचकर ज्ञापन सौंपते हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस कर आयोग की स्वायत्तता पर सवाल खड़े करते हैं और मामला देश की शीर्ष अदालतों (सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट) तक भी पहुंच जाता है। चुनावी वर्ष में यह विवाद और अधिक उग्र हो जाता है क्योंकि हर दल को यह डर सताता है कि मतदाता सूची में कुछ प्रतिशत वोटों का इधर-उधर होना उनकी हार-जीत का कारण बन सकता है।राजनीतिक दलों द्वारा किया जाने वाला यह हंगामा और तीखी प्रतिक्रियाएं भारतीय राजनीति की उस गहरी अविश्वास भावना को दर्शाती हैं, जो प्रतिस्पर्धात्मक चुनाव प्रणाली से पैदा होती है। हालांकि, इस हंगामे के दोनों पहलू हैं। एक तरफ जहां यह आयोग के प्रशासनिक कार्य में बाधा उत्पन्न करता है और संस्था की साख को ठेस पहुंचाता है, वहीं दूसरी तरफ यह लोकतंत्र में एक ‘चेक एंड बैलेंस’ का काम भी करता है। जब विपक्ष सतर्क रहता है और सूची की गड़बड़ियों पर हंगामा करता है, तो चुनाव आयोग और स्थानीय प्रशासन भी अधिक सतर्क होकर काम करने के लिए मजबूर होते हैं।
चुनाव आयोग इस प्रकार के विवादों से निपटने के लिए एक स्थापित कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन करता है। आयोग मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान सभी पंजीकृत राजनीतिक दलों के साथ सर्वदलीय बैठकें आयोजित करता है। आयोग का यह स्पष्ट नियम है कि किसी भी नागरिक का नाम मतदाता सूची से हटाने से पहले उसे उचित नोटिस दिया जाना चाहिए और उसकी सुनवाई होनी चाहिए। इसके अलावा, पुनरीक्षण के बाद तैयार की गई प्रारंभिक मतदाता सूची को सार्वजनिक किया जाता है ताकि राजनीतिक दल और आम जनता उस पर अपनी आपत्तियां और दावे दर्ज करा सकें। इस पारदर्शी प्रक्रिया के बावजूद होने वाला हंगामा अक्सर प्रशासनिक कमियों से ज्यादा राजनीतिक लाभ उठाने की इच्छा से प्रेरित होता है।
अंततः, चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची का पुनरीक्षण एक ऐसा अनिवार्य और सराहनीय कदम है जिसके बिना एक स्वस्थ लोकतंत्र की कल्पना भी नहीं की जा सकती। राजनीतिक दलों का हंगामा और उनकी चिंताएं लोकतंत्र का एक स्वाभाविक हिस्सा हो सकती हैं, लेकिन यह विरोध किसी भी स्थिति में इस आवश्यक सुधार प्रक्रिया को रोकने का कारण नहीं बनना चाहिए। लोकतंत्र में चुनावी मुकाबले निष्पक्ष तभी होंगे जब खेल के मैदान के नियम और खिलाड़ियों की सूची पूरी तरह से पारदर्शी और विवादों से परे हो।
विरोधी दलों को भी केवल राजनीतिक लाभ के लिए हंगामा करने के बजाय इस प्रक्रिया में रचनात्मक रूप से भाग लेना चाहिए। उन्हें अपने बूथ स्तर के एजेंटों को सक्रिय करना चाहिए ताकि वे आयोग के बीएलओ के साथ मिलकर वास्तविक त्रुटियों को दूर करने में मदद कर सकें। चुनाव आयोग को भी विपक्ष की तार्किक चिंताओं का सम्मान करते हुए अपनी तकनीकी प्रणालियों को और अधिक पारदर्शी, मानवीय और त्रुटिहीन बनाना होगा। जब देश का हर पात्र नागरिक गर्व से बिना किसी बाधा के मतदान कर सकेगा, तभी भारतीय लोकतंत्र की यह महान यात्रा अपनी वास्तविक सफलता को प्राप्त करेगी। आयोग का यह कदम इसी उज्ज्वल भविष्य का मार्ग प्रशस्त करता है।





