प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
भाषा केवल शब्दों की गठरी नहीं होती; वह समय की स्मृति, समाज की संवेदना और पीढ़ियों की साझा सांस होती है। ‘चंदा मामा दूर के, पूए पकाए बूर के’ इसी जीवित परंपरा का गीत है, जिसे न जाने कितनी नानी-दादियों ने बच्चों को थपकी देते हुए गाया और कितनी पीढ़ियों ने चाँद को अपना मामा मानकर आँखें मूंद लीं। अब उसी लोरी के ‘बूर’ शब्द पर आपत्ति उठ रही है। प्रश्न यह नहीं कि किसी शब्द का आज कोई दूसरा अर्थ निकाला जा सकता है या नहीं; प्रश्न यह है कि क्या आज की दृष्टि से कल की मासूमियत को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए? यदि किसी शब्द की वर्तमान व्याख्या बदल गई है, तो क्या उसके साथ सदियों की स्मृति भी बदल दी जाए?
भाषा का सबसे बड़ा सौंदर्य यही है कि एक ही शब्द में कई अर्थों की संभावनाएं सँजोए रहती हैं। संदर्भ बदलते ही अर्थ का रंग बदल जाता है। ‘कली’, ‘फूल’, ‘नदी’, ‘बूर’ जैसे शब्द अलग संदर्भों में अलग अर्थ ग्रहण कर सकते हैं, लेकिन बच्चों की कविता का संसार अलग है। वहाँ चंदा मामा सचमुच मामा हैं, पूए सचमुच पूए हैं और ‘बूर’ भी उसी घरेलू, खाद्य और लोक-प्रचलित संदर्भ में समझा जाता रहा है। किसी शब्द को उसके मूल संदर्भ से निकालकर आधुनिक द्विअर्थी चश्मे से देखना भाषा की गलती नहीं, हमारी दृष्टि का परिवर्तन है। लोरी में अश्लीलता खोजने से पहले यह देखना होगा कि वह वहाँ थी भी या हमने बाद में उसमें डाल दी।
विडंबना यह है कि जिस समय समाज की मुख्यधारा में जानबूझकर उत्तेजक भाषा धड़ल्ले से परोसी जा रही है, हमारी चिंता एक पुरानी लोरी के शब्द पर ठहर गई है। फिल्मों के संवाद, गीतों के बोल, इंटरनेट के मीम्स और स्टैंड-अप कॉमेडी में ऐसे शब्द और संकेत लगातार सामने आते हैं, जिनका उद्देश्य चौंकाना, उत्तेजित करना या हँसी के नाम पर अभद्रता को सामान्य बनाना होता है। वहां उनका आशय भी स्पष्ट होता है। ऐसे में पारंपरिक बालगीत के एक शब्द को उसी तराजू पर तौलना नैतिकता की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है। चिंता वहां होनी चाहिए, जहां अश्लीलता इरादतन रची जा रही है, न कि वहां जहां पीढ़ियों से मासूमियत सांस लेती आई है।
द्विअर्थी शब्द किसी एक भाषा की बीमारी नहीं हैं। लगभग हर भाषा में ऐसे शब्द हैं, जिनके अर्थ संदर्भ, समय, क्षेत्र और प्रयोग के साथ बदलते रहे हैं। समस्या तब होती है, जब हम किसी पुराने शब्द को उसके सांस्कृतिक परिवेश से काटकर केवल आज की संवेदना के आईने में देखने लगते हैं। बच्चे जब ‘चंदा मामा’ सुनते हैं तो उनके मन में चाँद, मामा और पूए की प्यारी तस्वीर बनती है; वहाँ किसी वयस्क संकेत की जगह नहीं होती। यदि कोई वयस्क उस मासूम संसार में दूसरा अर्थ खोजता है तो दोष शब्द का नहीं हो सकता। बच्चों की दुनिया को वयस्क मानसिकता से पढ़कर कविता बदल देना भाषा सुधारना नहीं, अपनी दृष्टि की सीमा रचना पर थोपना है।
लेकिन यदि आज एक शब्द असुविधाजनक लग रहा है तो कल कितने शब्दों की बारी आएगी? क्या लोकगीतों के मुहावरे, कहावतों और पुराने कवियों के शब्द भी आज की कसौटी पर छांटे जाएंगे? कबीर, तुलसी और मीरा की रचनाओं में भी ऐसे शब्द, बिंब और संदर्भ हैं जिन्हें आज का पाठक अलग तरह से देख सकता है। क्या हर पीढ़ी अपनी सुविधा के अनुसार पुरानी रचनाओं को संपादित करती चले? संस्कृति नदी की तरह बहती है; उसमें समय का पानी मिलना स्वाभाविक है, लेकिन उसे बचाने के नाम पर उसका उद्गम मिटा देना समझदारी नहीं। विरासत का अर्थ हर पुरानी चीज को पूजनीय मानना नहीं, बल्कि उसे उसके समय और संदर्भ के साथ समझना है।
इस विवाद का दूसरा पहलू अधिक महत्वपूर्ण है—हम बच्चों को भाषा समझाना चाहते हैं या उससे बचाना? शिक्षा का काम ऐसे शब्द चुनना नहीं, जिनमें गलत अर्थ की कोई संभावना न हो; बल्कि यह सिखाना है कि शब्द का अर्थ संदर्भ से बनता है। संस्कार शब्द काटकर नहीं, अर्थ समझाकर बनते हैं। किसी पुराने शब्द का अर्थ आज बदल गया हो तो बच्चों को उसका संदर्भ समझाया जा सकता है और जरूरत हो तो पाठ्य-सामग्री में टिप्पणी दी जा सकती है। हर असुविधाजनक शब्द हटाना आसान रास्ता है, लेकिन यह सांस्कृतिक रूप से हमेशा सुरक्षित नहीं। शब्द हटाने से समस्या खत्म नहीं होती; कई बार वह अगली समस्या का रास्ता खोल देती है।
असल सवाल इसलिए ‘बूर’ का नहीं, हमारी दृष्टि का है। क्या हम हर पुराने शब्द को वर्तमान पूर्वाग्रहों की अदालत में पेश करेंगे या उसके समय, संदर्भ और लोक-स्मृति को भी सुनेंगे? किसी रचना पर असहमति होना स्वाभाविक है और भाषा समय के साथ बदलती भी है, लेकिन परिवर्तन और विलोपन एक ही बात नहीं। चंदा मामा की लोरी को बचाए रखने का अर्थ यह नहीं कि हम भाषा को स्थिर कर दें; इसका अर्थ केवल इतना है कि परिवर्तन की प्रक्रिया में स्मृति को अपराधी न बनाया जाए। जो समाज अपनी लोरियों से शर्माने लगे, वह धीरे-धीरे अपनी स्मृतियों से भी असहज होने लगता है।
किसी लोरी की पंक्ति पर ठहर जाना आसान है, उसके पीछे चली आ रही पीढ़ियों की स्मृति को समझना कठिन। यदि चिंता बच्चों के मानसिक संसार की है तो उस सामग्री पर ध्यान देना होगा, जिसमें अश्लीलता, उत्तेजना और अभद्रता जानबूझकर परोसी जा रही है। वहां सामाजिक जिम्मेदारी और अभिभावकीय सजगता जरूरी है। लेकिन जिस लोरी ने पीढ़ियों को चाँद से रिश्ता सिखाया, उसे आज की नजर के संदेह से क्यों देखा जाए? समय बदले, भाषा बदले, शब्दों के अर्थ बदलें—यह स्वाभाविक है। मगर विरासत की हर पंक्ति को बदलती दृष्टि के हवाले कर देंगे तो एक दिन हमारे पास लोरियां तो होंगी, उनकी वह मासूम दुनिया नहीं, जिसमें पीढ़ियां पलती रही हैं।





