शब्दों पर पहरा नहीं, फिर भी आवाज़ें कम क्यों होती जा रही हैं?

There are no curbs on words, yet why are voices growing fainter?

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

आपने सच लिखा, किसी ने झूठ नहीं कहा—बस आपकी आवाज को रास्ते से हटा दिया। यही डिजिटल दौर की नई विडंबना है। मेटा के फेसबुक और इंस्टाग्राम पर अभिव्यक्ति का मंच खुला है, लेकिन आपकी बात कितनी दूर जाएगी, यह ‘कम्युनिटी स्टैंडर्ड’ तय कर सकता है। सरकार की नीति पर सवाल, किसी फैसले की आलोचना या व्यवस्था की कमी सामने रखते ही पोस्ट हट सकती है, पहुंच घट सकती है और अकाउंट प्रतिबंधित हो सकता है। फिर एक संदेश आता है—‘आपकी सामग्री हमारे नियमों के विरुद्ध है।’ मगर नियम किसने बनाए, किस आधार पर लागू हुए और फैसला किसने सुनाया—इसका जवाब देने वाला कोई दिखाई नहीं देता।

डिजिटल दरबार में अभिव्यक्ति की आज़ादी का फैसला किसके हाथ में है? अगस्त 2026 में पत्रकारों, राजनेताओं, स्वतंत्र टिप्पणीकारों और कुछ राजनीतिक संगठनों के पोस्ट व अकाउंट्स पर कार्रवाई ने गंभीर सवाल खड़े किए। मुद्दा पोस्ट हटने का नहीं, पारदर्शिता का है। नागरिक को पता होना चाहिए कि उसकी अभिव्यक्ति किस नियम की किस धारा से टकराई। मगर यहाँ फैसला पहले आता है, कारण बाद में भी आए तो कृपा समझिए। निर्णय स्वचालित प्रणाली, स्थानीय टीम या कानूनी अनुरोधों के दबाव में हुआ—स्पष्ट नहीं। आईटी नियमों और सरकारी अनुरोधों का जिक्र है, फिर भी पारदर्शिता कम है। मेटा के डेटा के अनुसार भारत में नफरत वाली सामग्री पर प्रोएक्टिव कार्रवाई वैश्विक औसत से कम रही है। सवाल है—एल्गोरिदम अंधा है या उसकी आँखों पर सुविधा का चश्मा है?

पहले सेंसरशिप सामने थी, अब स्क्रीन के पीछे है। किताब जब्त होती थी, अखबार रोका जाता था, छपाई पर पहरा होता था। विरोध करने वाला जानता था कि सामने कौन है। डिजिटल युग में सेंसरशिप अभिवादन करके आती है। पोस्ट रहती है, पर पहुँच गायब हो जाती है। अकाउंट चलता है, पर लोग देख नहीं पाते। लेखक लिखता रहता है और इंटरनेट को व्यस्त समझता है। इसे ‘शैडोबैन’, ‘रिस्ट्रिक्शन’ या तकनीकी नाम दें; नतीजा एक है—आवाज मौजूद होकर भी सार्वजनिक नहीं रहती। यह उस लेखक जैसा है जिसकी किताब छपे, पर सारी प्रतियाँ गोदाम में बंद रहें। आपको बोलने दिया जाता है, बस आपकी बात सुनाई नहीं देती।

वैश्विक नियमों की असली परीक्षा अलग-अलग देशों में होती है। मेटा की नीतियां वैश्विक हैं, पर ‘समान न्याय’ का सवाल बना रहता है। अलग राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों में इनका लागू होना एक जैसा नहीं। अमेरिका में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारत में सरकार, समाज व कानून के दबाव की वास्तविकता अलग है। भारत के आईटी नियम प्लेटफॉर्म पर दबाव डाल सकते हैं, सरकार वैधानिक शक्ति इस्तेमाल कर सकती है और प्लेटफॉर्म कारोबारी हित व नियामकीय जोखिम देखता है। सबसे कमजोर नागरिक है—न मंत्रालय, न अरबों डॉलर की कंपनी, न एल्गोरिदम की चाबी। उसके पास केवल एक पोस्ट है—कभी-कभी वह भी नहीं बचती।

मंच वही सार्थक है, जहाँ हर आवाज को जगह मिले। मेटा स्वयं को अभिव्यक्ति का मंच कहता है। मंच पर सहमति और असहमति—दोनों सुनाई देनी चाहिए। लेकिन जब मंच का मालिक तय करने लगे कि कौन-सी आलोचना स्वीकार्य है और कौन-सी नहीं, तो वह संपादक, निर्णायक और प्रहरी—तीनों बन जाता है। ‘हेट स्पीच’ और ‘गलत सूचना’ रोकना जरूरी है; हिंसा और घृणा को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता। लेकिन सत्ता की आलोचना को उसी श्रेणी में रखना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। कसौटी यही है कि नियम सत्ता समर्थक और सत्ता विरोधी—दोनों पर समान लागू हों। यदि तराजू हर बार दबाव की ओर झुके, तो न्याय की परिभाषा बदल देना सबसे आसान रास्ता है।

सेंसरशिप की सबसे बड़ी जीत पोस्ट हटाना नहीं, लिखने से पहले हाथ रोक देना है। जब पत्रकार को सवाल पूछने पर अकाउंट बंद होने का डर हो, टिप्पणीकार को तीखी बात लिखना डिजिटल आत्महत्या लगे और नागरिक को पहुँच घटने का भय हो, तब सेंसरशिप सफल है। फिर सेंसर को कुछ करने की जरूरत नहीं; नागरिक अपने भीतर ही सेंसर बिठा लेता है। यही आत्म-सेंसरशिप लोकतंत्र को भीतर से खोखला करती है। लोग वही लिखते हैं जो सुरक्षित है, वही कहते हैं जो स्वीकार्य है और धीरे-धीरे सार्वजनिक बहस में असहमति की जगह प्रशंसा का शोर भर जाता है। चुप समाज बाहर से शांत, भीतर से लोकतांत्रिक रूप से बीमार होता है।

निजी स्वामित्व अधिकार देता है, जवाबदेही से छूट नहीं। मेटा निजी कंपनी है, इसलिए सामग्री हटाने का अधिकार रखती है—लेकिन यह आधा सच है। जब करोड़ों नागरिकों की बातचीत निजी प्लेटफॉर्मों पर निर्भर हो, तो उनकी सामाजिक जिम्मेदारी भी बढ़ती है। संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नागरिक को दी है, एल्गोरिदम को नहीं। इसलिए पारदर्शिता, निष्पक्ष अपील और स्वतंत्र निगरानी जरूरी है। हर कार्रवाई का कारण बताया जाए, प्रभावी अपील मिले और जांच हो कि नियम सभी पर समान लागू हैं या नहीं। अदालतों और नियामकों को डिजिटल सत्ता समझनी होगी, क्योंकि न्याय पीछे रहा तो कई आवाजें फैसला आने से पहले ही इतिहास बन जाएंगी।

बात मेटा और किसी पत्रकार की नहीं, उस अधिकार की है जिससे लोकतंत्र जीवित रहता है—बोलने का अधिकार। सवाल है, नागरिक की आवाज संविधान तय करेगा या किसी कंपनी का ‘कम्युनिटी स्टैंडर्ड’? सरकार को आलोचना से असहज होने के बजाय उसकी स्वतंत्रता बचानी चाहिए और प्लेटफॉर्म को मुनाफे व नियामकीय दबाव के बीच नागरिक अधिकारों को दबने नहीं देना चाहिए। यदि दोनों शक्तिशाली पक्षों की सुविधा नागरिक की चुप्पी में मिलती है, तो यह लोकतंत्र का सबसे खतरनाक गठजोड़ है। आज पोस्ट हटती है, कल पहुँच घटती है, परसों शब्दों की सीमा तय होगी। जिस दिन डिजिटल दरबार तय करेगा कि हमें क्या कहना है, खतरा आवाज बंद होने का नहीं, अपनी आवाज की जरूरत भूल जाने का होगा। वही सेंसरशिप की असली जीत होगी—और हमें पता भी नहीं चलेगा।