विद्यालयों में बढ़ता मानसिक उत्पीड़न, असुरक्षा और मानवीय संवेदनाओं का क्षरण—एक राष्ट्रीय आत्ममंथन
सत्य भूषण शर्मा
“किसी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी उसकी अर्थव्यवस्था नहीं, उसके शिक्षक होते हैं।”
जब किसी विद्यालय के प्रांगण में प्रवेश करते हैं तो सबसे पहले बच्चों की मुस्कान दिखाई देती है, दीवारों पर उपलब्धियों की चमक दिखाई देती है, आधुनिक प्रयोगशालाएँ, स्मार्ट कक्षाएँ और आकर्षक परिसर दिखाई देते हैं। परंतु इन सबके बीच यदि किसी चेहरे को सबसे कम पढ़ा जाता है, तो वह शिक्षक का चेहरा है। वही शिक्षक, जिसकी आँखों में कभी ज्ञान का उजास हुआ करता था, आज कई स्थानों पर थकान, चिंता, असुरक्षा और मौन का बोझ दिखाई देने लगा है।
यह लेख किसी संस्था, किसी प्रबंधन या किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं है। यह उस मौन वेदना के पक्ष में है, जो अनेक शिक्षकों के भीतर वर्षों से जमा होती रही है। शिक्षा की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं कि विद्यालयों में संसाधनों की कमी है; बल्कि यह है कि कई बार संसाधनों की प्रचुरता के बीच भी संवेदनाओं का अभाव दिखाई देता है।
जब शिक्षक का समय उसका अपना नहीं रहता
आज अनेक निजी विद्यालयों में शिक्षक केवल अध्यापन तक सीमित नहीं है। उससे उत्कृष्ट परिणामों की अपेक्षा की जाती है, साथ ही प्रवेश अभियान, विपणन गतिविधियाँ, डिजिटल रिपोर्टिंग, निरीक्षण की तैयारियाँ, कार्यक्रमों का संचालन, अभिभावकों से निरंतर संवाद और अनेक प्रशासनिक कार्य भी करवाए जाते हैं। कार्यदिवस की समाप्ति के बाद भी मोबाइल पर संदेश, निर्देश और अपेक्षाएँ उसका पीछा नहीं छोड़तीं।
धीरे-धीरे उसका घर विश्राम का स्थान नहीं, बल्कि कार्यालय का विस्तार बन जाता है।
क्या हमने कभी सोचा है कि जो शिक्षक अपने ही बच्चों के साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पा रहा, वह दूसरों के बच्चों के भविष्य को कितनी कठिन परिस्थितियों में सँवार रहा होगा?
भय से ज्ञान नहीं, केवल औपचारिकता जन्म लेती है
शिक्षा विश्वास का संबंध है। शिक्षक और प्रबंधन के बीच संवाद होना चाहिए, सहयोग होना चाहिए, साझा उत्तरदायित्व होना चाहिए। परंतु जहाँ भय, अविश्वास और निरंतर दबाव का वातावरण बन जाता है, वहाँ शिक्षक अपनी सृजनात्मकता खोने लगता है।
सम्मान से खिला हुआ शिक्षक विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बोता है।
अपमानित शिक्षक केवल पाठ पढ़ा सकता है, प्रेरणा नहीं।
मानसिक उत्पीड़न—एक अनकहा संकट
शारीरिक चोट दिखाई देती है, मानसिक पीड़ा नहीं।
लगातार असुरक्षा, सार्वजनिक फटकार, अनिश्चित सेवा-शर्तें, हर समय मूल्यांकन का दबाव, छोटी-सी भूल पर कठोर प्रतिक्रिया, और भविष्य को लेकर अनिश्चितता—ये सब मिलकर धीरे-धीरे शिक्षक के भीतर आत्मविश्वास का क्षरण करते हैं।
मानसिक उत्पीड़न की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि उसका कोई एक्स-रे नहीं होता।
उसकी कोई पट्टी नहीं बँधती।
पर उसके घाव सबसे गहरे होते हैं।
क्या शिक्षा केवल परिणामों का उद्योग बनती जा रही है?
विद्यालयों की सफलता का मापदंड आज अक्सर परीक्षा परिणाम, ब्रांड छवि और प्रवेश संख्या बन गया है। निस्संदेह उत्कृष्ट परिणाम आवश्यक हैं, परंतु यदि उनकी कीमत शिक्षक का आत्मसम्मान बन जाए, तो यह शिक्षा का नहीं, व्यवस्था का संकट है।
विद्यालय यदि केवल संस्थान रह जाएँ और परिवार जैसी आत्मीयता खो दें, तो शिक्षा धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्य से दूर होने लगती है।
प्रबंधन भी आत्ममंथन करे
यह भी उतना ही सत्य है कि देश में हजारों निजी विद्यालय ऐसे हैं जहाँ प्रबंधन शिक्षकों को परिवार का सदस्य मानता है। वहाँ संवाद है, सम्मान है, विश्वास है और साझा नेतृत्व की संस्कृति है। ऐसे विद्यालय यह सिद्ध करते हैं कि अनुशासन और संवेदनशीलता साथ-साथ चल सकते हैं।
यही आदर्श पूरे देश में फैलना चाहिए।
श्रेष्ठ प्रबंधन वह नहीं जो केवल परिणाम माँगे।
श्रेष्ठ प्रबंधन वह है जो परिणाम देने वाले शिक्षक को भी सम्मान दे।
नीतिगत सुधार अब विलंबित नहीं होने चाहिए
अब समय आ गया है कि निजी विद्यालयों में भी कार्यस्थल की गरिमा पर उतना ही ध्यान दिया जाए जितना शैक्षणिक उपलब्धियों पर दिया जाता है।
राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षकों के लिए स्वतंत्र शिकायत निवारण व्यवस्था, कार्य-जीवन संतुलन के मानक, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, पारदर्शी सेवा-नीति, निष्पक्ष मूल्यांकन प्रणाली तथा सम्मानजनक कार्य संस्कृति को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिए।
शिक्षा की गुणवत्ता का मूल्यांकन केवल बोर्ड परिणामों से नहीं, बल्कि शिक्षकों की संतुष्टि, स्थिरता और कार्यस्थल के वातावरण से भी होना चाहिए।
समाज से एक प्रश्न
जब किसी विद्यार्थी की सफलता का श्रेय शिक्षक को दिया जाता है, तब शिक्षक की असफल मुस्कान का उत्तरदायी कौन है?
जब राष्ट्र निर्माण का भार उसी के कंधों पर रखा जाता है, तो उसके सम्मान की रक्षा का भार किसके कंधों पर है?
यदि हम सचमुच विकसित भारत का स्वप्न देखते हैं, तो हमें सबसे पहले शिक्षक को भय से मुक्त करना होगा।
क्योंकि…
डरा हुआ शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करता है।
सम्मानित शिक्षक इतिहास रचता है।
अंतिम शब्द
किसी भी सभ्यता का पतन उस दिन प्रारंभ हो जाता है, जिस दिन उसके शिक्षक बोलना छोड़ देते हैं।
और किसी राष्ट्र का स्वर्णिम भविष्य उस दिन आरंभ होता है, जिस दिन उसके शिक्षक मुस्कुराते हुए विद्यालय की दहलीज़ पार करते हैं।
आइए, हम ऐसे विद्यालय बनाएँ जहाँ शिक्षकों से केवल उत्कृष्ट परिणामों की अपेक्षा न हो, बल्कि उन्हें उत्कृष्ट वातावरण भी मिले; जहाँ अनुशासन हो, पर अपमान न हो; जहाँ उत्तरदायित्व हो, पर अन्याय न हो; जहाँ नेतृत्व हो, पर अहंकार न हो; और जहाँ शिक्षक स्वयं को कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माता महसूस करे।
क्योंकि यह केवल शिक्षकों की लड़ाई नहीं है—यह भारत की शिक्षा की आत्मा को बचाने का प्रश्न है।
यदि शिक्षक नहीं बचेंगे, तो शिक्षा भी नहीं बचेगी।





