सफेद सोने का संकट और किसानों की जमीनी हकीकत

White gold crisis and ground reality of farmers

दिलीप कुमार पाठक

भारत के कृषि और औद्योगिक ढांचे में कपास केवल एक व्यापारिक फसल नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। देश के करीब 60 लाख किसान सीधे तौर पर इसकी खेती से जुड़े हैं, जबकि कपड़ा उद्योग के माध्यम से यह सेक्टर 4 से 5 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। राष्ट्रपिता गांधी जी ने कहा था कि भारत का उद्धार उसके कताई चक्र और खादी में निहित है, जो देश के करोड़ों भूखे लोगों को आजीविका दे सकता है। गांधी जी का यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है। 7 अक्टूबर को विश्व कपास दिवस के वैश्विक आयोजन के बीच, भारतीय कपास क्षेत्र के सरकारी आंकड़ों और खेतों के कड़वे सच के बीच के फासले का तटस्थ विश्लेषण बेहद जरूरी हो जाता है।

वैश्विक परिदृश्य में भारत कपास के बुवाई क्षेत्र के मामले में दुनिया में पहले स्थान पर है। देश के लगभग 114.82 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में कपास की खेती की जाती है। उत्पादन की दृष्टि से भारत, चीन के बाद विश्व में दूसरे पायदान पर आता है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, चालू सीजन में देश का कुल कपास उत्पादन लगभग 290.91 लाख गांठ दर्ज किया गया, जबकि हमारी घरेलू खपत का आंकड़ा 328 लाख गांठ के आसपास रहा। यह अंतर स्पष्ट करता है कि भारतीय कपड़ा मिलों और निर्यात की मांग को पूरा करने के लिए घरेलू मोर्चे पर अभी लंबी दूरी तय करनी बाकी है। प्रति गांठ का वजन 170 किलोग्राम होता है।

आंकड़ों के पीछे जो सबसे बड़ा ढांचागत संकट है, वह है भारत की बेहद कम उत्पादकता। वैश्विक स्तर पर औसत प्रति हेक्टेयर उत्पादन जहां बहुत अधिक है, वहीं भारत में यह महज 431 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पर अटका हुआ है। इसका मुख्य कारण यह है कि देश का लगभग 67 प्रतिशत कपास क्षेत्र आज भी पूरी तरह से अनिश्चित मानसून और वर्षा पर निर्भर है। केवल 33 प्रतिशत क्षेत्र को ही सुनिश्चित सिंचाई की सुविधा प्राप्त है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बेमौसम बारिश और लंबे सूखे के कारण हर साल लाखों हेक्टेयर फसल खेत में ही नष्ट हो जाती है।

दूसरा बड़ा संकट लागत और कीटों के प्रबंधन का है। बीटी कॉटन तकनीक की रोग प्रतिरोधक क्षमता अब धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। पिछले कुछ सीजन में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और महाराष्ट्र के बेल्ट में गुलाबी सुंडी के भीषण प्रकोप ने किसानों को तबाह किया है। कीटों से फसल बचाने के चक्कर में महंगे कीटनाशकों और रासायनिक खादों का अंधाधुंध इस्तेमाल बढ़ा है, जिसने खेती की इनपुट कॉस्ट को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा दिया है। लागत बढ़ने और उपज घटने के इस दोहरे चक्रव्यूह ने कपास उत्पादक किसानों को कर्ज के जाल में धकेल दिया है। हालाँकि, संकट की गंभीरता को देखते हुए नीतिगत स्तर पर कुछ बड़े कदम उठाए गए हैं। विपणन सीजन के लिए सरकार ने कपास के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय वृद्धि की है। मध्यम स्टेपल कपास का दाम बढ़ाकर 8,267 रुपये और लंबे स्टेपल का दाम 8,667 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित किया गया है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 557 रुपये प्रति क्विंटल अधिक है। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार ने 5,659 करोड़ रुपये के बजटीय आवंटन के साथ कपास उत्पादकता मिशन को जमीन पर उतारा है। इस मिशन का दीर्घकालिक लक्ष्य वर्ष 2031 तक देश के उत्पादन को 498 लाख गांठ तक पहुंचाना है, जिसमें 14 राज्यों के 32 लाख किसानों को आधुनिक तकनीक और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों से जोड़ने का खाका खींचा गया है।

विश्व कपास दिवस के इस मोड़ पर भारत को अपनी प्राथमिकताओं को पुनर्गठित करना होगा। केवल एमएसपी बढ़ाना या बुवाई का रकबा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। हमें तत्काल रूप से उच्च घनत्व रोपण प्रणाली, जल संरक्षण के लिए ड्रिप इरिगेशन और जलवायु-अनुकूल बीजों के स्वदेशी अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करना होगा। जब तक प्रति हेक्टेयर उत्पादकता में सुधार नहीं होगा और कीटों के संकट का स्थायी वैज्ञानिक समाधान नहीं खोजा जाएगा, तब तक सफेद सोने की यह चमक देश के अन्नदाता के जीवन में उजाला नहीं ला पाएगी।