‘सर्वसम्मति’ का आवरण और संस्थागत रार

The cloak of 'consensus' and institutional conflict

अशोक भाटिया

भारतीय लोकतंत्र की नींव जिस निष्पक्षता और पारदर्शिता पर टिकी है, उसकी प्रहरी संस्था ‘भारत निर्वाचन आयोग’ इस समय एक अभूतपूर्व आंतरिक और बाहरी संकट से गुजर रही है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर हाल के दिनों में जो राजनीतिक और प्रशासनिक रार मचा है, उसने निर्वाचन सदन की चारदीवारी के भीतर चलने वाली निर्णय प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि, आयोग ने आनन-फानन में एक पूर्ण-पीठ की बैठक बुलाकर यह स्पष्टीकरण जारी किया है कि एसआईआर से जुड़े सभी फैसले मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी—की सर्वसम्मति और पूर्ण सहमति से ही लिए गए थे. लेकिन संस्थागत शुचिता के नजरिए से यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि अंतिम नीतिगत दस्तावेजों पर सभी आयुक्तों के हस्ताक्षर थे और सब कुछ तकनीकी रूप से ‘एकमत’ था, तो फिर पर्दे के पीछे से लेकर सड़क तक इतनी बड़ी ‘रार’ किस बात की है? क्या केवल अंत में हस्ताक्षर हो जाना ही किसी लोकतांत्रिक संस्था के भीतर ‘स्वस्थ विमर्श’ का प्रतीक मान लिया जाए, या फिर उस सर्वसम्मति के पीछे छिपी असहमतियों के लंबे सिलसिले को नजरअंदाज करना लोकतंत्र के लिए आत्मघाती होगा?

इस पूरे विवाद की जड़ें जितनी प्रशासनिक हैं, उतनी ही राजनीतिक भी हैं। मीडिया रिपोर्टों और आयोग के भीतर से छनकर आई खबरों के अनुसार, पिछले 10 महीनों के दौरान जब देशभर में मतदाता सूचियों को दुरुस्त करने के लिए एसआईआर की प्रक्रिया चलाई जा रही थी, तब दोनों चुनाव आयुक्तों ने अलग-अलग चरणों में कम से कम 14 बार अपनी लिखित आपत्तियां और चिंताएं दर्ज कराई थीं। ये आपत्तियां कोई मामूली प्रशासनिक औपचारिकताएं नहीं थीं, बल्कि इनका सीधा संबंध आम नागरिकों के मताधिकार, डेटाबेस सुरक्षा और फॉर्म-6 में किए गए दूरगामी बदलावों से था। लोकतंत्र में चुनाव आयोग जैसी बहु-सदस्यीय संस्था की परिकल्पना ही इसलिए की गई थी ताकि सामूहिक बुद्धिमत्ता और स्वतंत्र दृष्टिकोण के माध्यम से किसी भी एकतरफा फैसले को रोका जा सके। टी.एन. शेषन के दौर के बाद से आयोग की त्रिसदस्यीय संरचना ने हमेशा यह सुनिश्चित किया है कि बहुमत या सर्वसम्मति की आड़ में बुनियादी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से समझौता न हो। ऐसे में, यदि दो आयुक्तों को बार-बार अपनी बात को लिखित नोट के रूप में दर्ज कराना पड़ा, तो यह साफ करता है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और उनके सहयोगियों के बीच नीतिगत निर्णयों को लेकर एक गहरी वैचारिक खाई मौजूद थी।

इस विवाद का सबसे संवेदनशील और चिंताजनक पहलू मतदाता सूची से करोड़ों नामों का कटना है। रिपोर्टों के अनुसार, देश के लगभग 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में चलाई गई इस विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत मतदाता सूचियों से एक बड़ी संख्या में नाम हटाए गए हैं। विपक्ष का आरोप है कि यह संख्या 13 करोड़ के पार चली गई है, जिसे उसने राजनीतिक रूप से “वोटों की चोरी” करार दिया है। हालांकि, तकनीकी और कानूनी धरातल पर आयोग का यह तर्क पूरी तरह गलत नहीं है कि मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या फर्जी मतदाताओं के नाम हटाना एक नियमित और आवश्यक प्रक्रिया है ताकि चुनाव की शुचिता बनी रहे। स्वयं उच्चतम न्यायालय ने भी मई 2026 में बिहार एसआईआर की कानूनी वैधता को बरकरार रखा था। लेकिन सवाल प्रक्रिया की नीयत से ज्यादा उसके क्रियान्वयन के तरीके पर है। जब इतनी बड़ी संख्या में नाम काटे जा रहे हों, तो उसकी जांच और सत्यापन की प्रक्रिया इतनी पारदर्शी होनी चाहिए कि आम नागरिक के मन में कोई संशय न रहे। दिल्ली जैसे राज्यों में लाखों मतदाताओं को भेजे गए नोटिसों के तरीके पर जब स्वयं सर्वोच्च अदालत ने संज्ञान लिया, तब जाकर आयोग को अपनी प्रक्रियाओं में ढील देनी पड़ी।

विवाद को हवा देने में फॉर्म-6 के साथ जोड़े गए नए ‘डिक्लेरेशन’ ने भी बड़ी भूमिका निभाई। इस नए नियम के तहत नए मतदाताओं के पंजीकरण की प्रक्रिया को जटिल बनाने का आरोप लगा, जिससे आम नागरिकों और विशेषकर हाशिए के समाज के लिए मतदाता सूची में नाम जुड़वाना एक कठिन चुनौती बन गया। जमीनी स्तर पर यह देखा गया कि इस डिक्लेरेशन और बार-बार भौतिक सत्यापन की बाध्यता के कारण कई पात्र नागरिक भी प्रक्रिया से बाहर होने लगे। हालांकि, चौतरफा दबाव और आंतरिक मतभेदों के सार्वजनिक होने के बाद 26 सितंबर 2026 को निर्वाचन सदन में हुई आपात बैठक में आयोग ने कुछ महत्वपूर्ण और सुधारात्मक कदम उठाए हैं। आयोग ने अब स्पष्ट किया है कि फॉर्म-6 के साथ दिया जाने वाला यह डिक्लेरेशन केवल मौजूदा एसआईआर प्रक्रिया के दौरान ही अनिवार्य रहेगा और इसके बाद सामान्य दिनों में होने वाले पंजीकरण के लिए पुराना प्रारूप ही लागू होगा। इसके साथ ही, तार्किक विसंगतियों वाले मतदाताओं के लिए ‘फिजिकल हीयरिंग’ की अनिवार्यता को समाप्त करना और दिल्ली व महाराष्ट्र जैसे चुनावी राज्यों में दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की समय-सीमा को क्रमशः 30 अक्टूबर और 12 अक्टूबर 2026 तक बढ़ाना यह साबित करता है कि आयोग को अंततः अपनी गलतियों और जमीनी अव्यावहारिकता का अहसास हुआ। परंतु, यह डैमेज कंट्रोल तब हुआ जब संस्था की साख पर बट्टा लग चुका था।

प्रशासनिक स्तर पर आंतरिक रार की भयावहता तब खुलकर सामने आई जब यह पता चला कि चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखकर एक प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारी के कामकाज और आंतरिक शक्तियों के बंटवारे को लेकर हस्तक्षेप की मांग की थी। हालांकि, आयोग ने अपने हालिया प्रेस नोट में इस पर यह सफाई दी है कि यह पत्र किसी नीतिगत या वैचारिक मतभेद का हिस्सा नहीं था, बल्कि विशुद्ध रूप से एक अधिकारी के प्रशासनिक आचरण से जुड़ा था। लेकिन इस दलील को पूरी तरह से स्वीकार करना प्रशासनिक समझ को धोखा देने जैसा है। चुनाव आयोग एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, जिसकी संप्रभुता कार्यपालिका (सरकार) के नियंत्रण से मुक्त है। यदि आयोग के शीर्ष पदाधिकारियों को अपने आंतरिक प्रशासनिक विवादों को सुलझाने के लिए देश के सबसे बड़े नौकरशाह यानी कैबिनेट सचिव का दरवाजा खटखटाना पड़ रहा है, तो यह दर्शाता है कि आयोग का आंतरिक लोकतंत्र और उसकी स्वायत्त कार्यप्रणाली गंभीर रूप से पंगु हो चुकी थी। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य आयुक्तों के बीच संवाद का स्तर इतना गिर जाना कि फाइलें और फैसले एक-दूसरे को दरकिनार करके बढ़ने लगें, किसी भी लोकतांत्रिक संस्थान के पतन का शुरुआती लक्षण है।

इस प्रशासनिक संकट ने देश के राजनीतिक वातावरण को भी पूरी तरह से गर्मा दिया है। कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और बीजू जनता दल (बीजद) जैसे प्रमुख विपक्षी दलों ने इसे हाथों-हाथ लिया है और इसे सीधे तौर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली पर एक सुनियोजित हमला करार दिया है। विपक्ष का यह आरोप कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विपक्षी झुकाव वाले या संवेदनशील क्षेत्रों में मतदाताओं के नाम जानबूझकर काटने की प्रक्रिया का नेतृत्व कर रहे थे, बेहद गंभीर है। यद्यपि ऐसे आरोपों के पीछे राजनीतिक नफा-नुकसान की गणित भी होती है, लेकिन चुनाव आयोग जैसी संस्था की ताकत इस बात में नहीं है कि वह आरोपों का जवाब कानूनी और तकनीकी स्पष्टीकरणों से दे, बल्कि इस बात में है कि उसका आचरण स्वयं ‘संदेह से परे’ (Beyond Doubt) नजर आए। जब विपक्षी प्रतिनिधिमंडलों के साथ आयोग की बैठकों के बाद सोशल मीडिया पर राजनीतिक मुहावरों जैसी भाषा (“बिना किसी चप्पा, बूथ जैमिंग और सोर्स जैमिंग के चुनाव”) का इस्तेमाल किया जाने लगे, तो जनता के मन में यह संदेश जाता है कि निष्पक्ष अंपायर की भूमिका निभाने वाली संस्था खुद एक पक्ष बनती जा रही है।

आयोग ने अपनी साख को बचाने के लिए जो कदम उठाए हैं, वे स्वागत योग्य तो हैं, लेकिन वे इस बुनियादी बीमारी का इलाज नहीं हैं जो संस्था के भीतर घर कर गई है। यह विवाद इस बात की ओर भी ध्यान खींचता है कि भविष्य में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया कैसी होनी चाहिए। जब तक नियुक्ति प्रक्रिया में पूर्ण पारदर्शिता और कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्ति सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक ऐसे आंतरिक टकराव और उन पर उठने वाले राजनीतिक सवाल थमने वाले नहीं हैं। अंततः, इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा सबक यह है कि लोकतंत्र में ‘सर्वसम्मति’ कोई थोपी गई व्यवस्था नहीं हो सकती। यदि संस्था के सदस्य किसी नीति पर 14 बार आपत्ति जताते हैं, तो उनकी चिंताओं को दबाकर या उन्हें ‘रूटीन चर्चा’ बताकर खारिज नहीं किया जा सकता।

निर्वाचन आयोग को यह समझना होगा कि मतदाता सूची केवल तकनीकी डेटा का पुलिंदा नहीं है, बल्कि वह इस देश के नागरिकों के लोकतांत्रिक वजूद का दस्तावेज है। उसमें से किसी एक भी वैध नागरिक का नाम प्रक्रियात्मक जटिलताओं के कारण कटना लोकतंत्र की हार है। अब जब आयोग ने अपनी गलतियों को सुधारने के लिए नियमों में ढील दी है और समय-सीमा बढ़ाई है, तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश के प्रत्येक कोने में, चाहे वह बिहार हो, पश्चिम बंगाल हो या दिल्ली, हर उस नागरिक का नाम सूची में वापस जोड़ा जाए जिसका नाम गलत तरीके से काटा गया था। ‘रारा’ भले ही शांत हो जाए, लेकिन इस रार ने निर्वाचन सदन की दीवारों पर जो दरारें दिखाई हैं, उन्हें भरने के लिए आयोग को अपने आचरण में और अधिक पारदर्शिता, संवेदनशीलता और आंतरिक लोकतंत्र को जगह देनी होगी। संस्थाओं की साख बनाने में दशक लग जाते हैं, लेकिन उन्हें गंवाने के लिए एक गलत फैसला ही काफी होता है।