सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: पत्रकारों पर बिना जांच फर्जी केस दर्ज करने और अभद्रता करने वाले पुलिस-प्रशासनिक अफसरों पर होगी सीधी कानूनी कार्रवाई

Supreme Court's stern stance

अजेश कुमार

कानून की नजर में कोई भी नेता या अधिकारी ऊपर नहीं है। पुलिस राजस्व ब्लॉक नगर निगम शिक्षा और स्वास्थ्य समेत सभी विभागों के अधिकारियों पर यह नियम लागू होता है। ललिता कुमारी फैसले के तहत बिना 7 से 14 दिनों की प्राथमिक जांच के एफआईआर दर्ज करना गैर-कानूनी है। वहीं अभिषेक उपाध्याय बनाम यूपी राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि प्रशासन पर सवाल उठाना पत्रकार का संवैधानिक अधिकार अनुच्छेद 19 है केवल आलोचनात्मक रिपोर्टिंग पर केस दर्ज नहीं किया जा सकता।सरकारी दफ्तरों के बाहर आम जनता का शोषण रिश्वतखोरी या दुर्व्यवहार होने पर ऑन-ग्राउंड रिपोर्टिंग करना और जनता की आवाज उठाना पत्रकार का अधिकार है। अधिकारी कमरे में मोबाइल-माइक बाहर रखवाकर ऑफ-कैमरा बात करने और बाद में फंसाने का खेल नहीं चला सकते। बातचीत ऑन-कैमरा ही होगी और पूरा वीडियो साक्ष्य कोर्ट में पेश करना पत्रकार का अधिकार है।अक्सर अधिकारी सरकारी काम में बाधा का मनगढ़ंत आरोप लगा देते हैं लेकिन अब सिर्फ कहने से काम नहीं चलेगा। अधिकारी को इसका ठोस वीडियो और लिखित प्रमाण देना होगा। हाल ही में सामाजिक कार्यकर्ताओं और अधिवक्ताओं ने यह सवाल भी उठाया है कि जब जनता सवाल पूछे तो काम में बाधा का केस ठोक दिया जाता है लेकिन जब जनता के टैक्स के पैसे से वेतन पाने वाले कर्मचारी खुद दफ्तर छोड़कर धरने पर बैठते हैं और जनता का काम रोकते हैं तो उन पर जनता के कार्यों में बाधा डालने का केस क्यों न दर्ज हो क्या उन्होंने अपने वेतन या नौकरी का त्याग किया यदि कोई अधिकारी कवरेज के दौरान मोबाइल या कैमरा छीनता है तो धारा 303 झपटमारी और वीडियो डिलीट कराने पर आईटी एक्ट व धारा 238 साक्ष्य नष्ट करना के तहत अपराध बनता है। दुर्भावना से फर्जी केस करने वाले अफसरों पर धारा 217 व 248 के तहत केस दर्ज होगा। हाई कोर्ट से केस निरस्त होने पर दोषी अफसर के व्यक्तिगत वेतन से मुआवजा काटा जाएगा और बरी होने के बाद पत्रकार धारा 356 के तहत मानहानि का केस कर सकता है। अनुच्छेद 14 के तहत कानून सबके लिए समान है।