सोनम वांगचुक लद्दाख के जिस हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं क्या है उसकी कहानी

What is the story of the part of Ladakh that Sonam Wangchuk represents?

अशोक भाटिया

सोनम वांगचुक लद्दाख के जिस हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं और जिन क्षेत्रों, जैसे चांगथांग और पैंगोंग त्सो के आस-पास का इलाका, की सुरक्षा का मुद्दा उठा रहे हैं, वे सैन्य और भौगोलिक दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील और महत्वपूर्ण हैं। यह क्षेत्र तिब्बत की सीमा से सटा हुआ एक विशाल पठार है, जो अत्यधिक ऊंचाई पर स्थित है। सैन्य विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, ऊंचाई पर स्थित चौकियों पर नियंत्रण रखने वाले देश को कूटनीतिक, रणनीतिक और सैन्य तीनों स्तरों पर अत्यधिक बढ़त हासिल होती है।

देखा जाय तो समकालीन वैश्विक राजनीति और सैन्य रणनीतियों में ‘सलामी स्लाइसिंग’ एक ऐसा स्थापित दृष्टिकोण है, जहाँ कोई विस्तारवादी महत्वाकांक्षा रखने वाला देश बिना किसी बड़े, व्यापक या प्रत्यक्ष युद्ध के, अत्यंत धीमी गति से और छोटे-छोटे टुकड़ों में सीमावर्ती क्षेत्रों पर अपना प्रभाव या नियंत्रण बढ़ाने का प्रयास करता है। वर्तमान में भारत की उत्तरी सीमाओं, विशेषकर लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यह रणनीति एक दीर्घकालिक और अत्यंत गंभीर सुरक्षा चुनौती बनकर उभरी है। विख्यात शिक्षाविद्, नवप्रवर्तक और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक का हालिया आंदोलन और उनके गांव ‘उबले’ सहित पूरे चांगथांग क्षेत्र से आ रही जमीनी रिपोर्टें इस बात की ओर स्पष्ट इशारा करती हैं कि बीजिंग की नीति केवल एक तात्कालिक सीमा विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरे रणनीतिक, आर्थिक, जनसांख्यिकीय और पारिस्थितिक हित छिपे हैं। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञों के लिए यह समझना अत्यंत आवश्यक हो गया है कि लद्दाख के ये सुदूर सीमावर्ती क्षेत्र चीन के लिए सामरिक रूप से क्यों इतने महत्वपूर्ण हैं, इसके पीछे बीजिंग का क्या भू-राजनीतिक गणित काम कर रहा है, और देश के आंतरिक नीतिगत निर्णयों तथा कूटनीतिक वार्ताओं का राष्ट्रीय सुरक्षा की इस वृहत्तर तस्वीर से क्या सीधा और अटूट संबंध है।

इन क्षेत्रों पर आंशिक प्रभाव या प्रभुत्व बनाकर भी चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी भारतीय सेना की अग्रिम गतिविधियों, रसद आपूर्ति मार्गों और लेह-लद्दाख को जोड़ने वाले रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर चौबीसों घंटे प्रभावी निगरानी रख सकती है। यही कारण है कि इन सुदूर अग्रिम गांवों और पारंपरिक रूप से भारत के प्रभाव वाले क्षेत्रों पर धीरे-धीरे अपना नियंत्रण स्थापित करना बीजिंग की दीर्घकालिक सैन्य प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रहा है, क्योंकि यह उन्हें किसी भी संभावित संघर्ष की स्थिति में एक रणनीतिक बढ़त प्रदान करता है।

इस क्षेत्र में चीन की सैन्य और प्रशासनिक गतिविधि स्थापित अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के सीधे और बड़े उल्लंघन के बजाय एक क्रमिक, अदृश्य और बेहद शातिर प्रक्रिया के रूप में दिखाई देती है। सीमा पर रहने वाले स्थानीय लद्दाखी चरवाहे, जो मुख्य रूप से चांगपा समुदाय से आते हैं, सदियों से अपनी पश्मीना बकरियों और याकों को चराने के लिए इन पारंपरिक और ऐतिहासिक चारागाहों का उपयोग करते रहे हैं। चीनी गश्ती दल अक्सर इन निहत्थे और सीधे-सादे चरवाहों की आवाजाही को बाधित करते हैं, उन्हें डराते हैं और सीमा विवाद का बहाना बनाकर पीछे हटने को मजबूर करते हैं। जब स्थानीय आबादी विवादों या असुरक्षा से बचने के लिए इन चारागाहों पर जाना बंद कर देती है, तो वह क्षेत्र ‘नो मैन्स लैंड’ या विवादित क्षेत्र में तब्दील हो जाता है। इसके बाद के चरणों में, चीन इन खाली क्षेत्रों के निकट तेजी से पक्की सड़कें, मोबाइल टॉवर, सैन्य शेड और नागरिक बस्तियों, जिन्हें चीनी शब्दावली में ‘शियाओकांग विलेज’ कहा जाता है, का निर्माण करके अपनी अनधिकृत स्थिति को एक स्थायी और वैध रूप देने का प्रयास करता है। सोनम वांगचुक और लद्दाख के स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने बार-बार उपग्रह चित्रों और प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से यह गहरी चिंता जताई है कि इस प्रक्रिया के कारण भारत के पारंपरिक चारागाहों का एक बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे हमारी सुलभ गश्त और नागरिक नियंत्रण के दायरे से बाहर होता जा रहा है।

चीन के इन आक्रामक कदमों के पीछे केवल सैन्य विस्तारवाद ही नहीं, बल्कि भविष्य की ‘संसाधन सुरक्षा’ भी एक बहुत बड़ा आर्थिक कारक है। लद्दाख और तिब्बत का यह संपूर्ण भूभाग दुनिया के “तीसरे ध्रुव” के रूप में जाना जाता है, जो मीठे पानी के विशाल ग्लेशियरों और अत्यंत महत्वपूर्ण दुर्लभ खनिजों का प्रमुख स्रोत है। सिंधु और उसकी प्रमुख सहायक नदियों के उद्गम और प्रवाह क्षेत्र इसी भूभाग से गहरे जुड़े हैं। इस क्षेत्र के जल स्रोतों और ग्लेशियरों पर कड़ा नियंत्रण स्थापित करके चीन पूरे दक्षिण एशिया की जल-भूराजनीति में एक निर्णायक और एकाधिकारवादी भूमिका हासिल करना चाहता है, जिससे वह भविष्य में भारत और पाकिस्तान जैसे निचले प्रवाह वाले देशों पर एक जल-अस्त्र के रूप में दबाव बना सके। इसके साथ ही, चांगथांग का यह विशिष्ट क्षेत्र दुनिया के सबसे महंगे और सर्वश्रेष्ठ ‘पश्मीना ऊन’ का एकमात्र मुख्य उत्पादक है। चीनी दबाव के कारण जब भारतीय चरवाहों को अंतिम सीमाओं पर स्थित समृद्ध चारागाहों से पीछे हटना पड़ता है, तो चारा न मिलने के कारण पश्मीना बकरियों की आबादी पर संकट आ जाता है, जिसका सीधा नकारात्मक और विनाशकारी असर लद्दाख की स्थानीय अर्थव्यवस्था, कश्मीर के हस्तशिल्प और भारत के अंतरराष्ट्रीय टेक्सटाइल उद्योग पर पड़ता है।

वर्ष 2020 के गलवान घाटी के हिंसक संघर्ष के बाद से दोनों महाशक्तियों के बीच संबंधों में एक लंबा सैन्य और कूटनीतिक गतिरोध बना रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में निरंतर जारी द्विपक्षीय वार्ताओं और कूटनीतिक प्रयासों के कारण कुछ सकारात्मक प्रगति देखी गई है। डेपसांग और डेमचोक जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादित घर्षण बिंदुओं से सैन्य विस्थापन और गश्त व्यवस्था को पुरानी स्थिति में बहाल करने पर दोनों पक्षों के बीच कूटनीतिक समझौतों का एक नया सिलसिला शुरू हुआ है। भारत और चीन के बीच उच्च स्तरीय वार्ताओं, दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठकों और सीमा मामलों पर परामर्श और समन्वय के लिए स्थापित कार्य तंत्र (WMCC) के माध्यम से कूटनीतिक चैनलों को फिर से पूरी तरह सक्रिय किया गया है। इन सभी वार्ताओं में भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सदैव अत्यंत स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाया है कि जब तक वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अप्रैल 2020 से पहले की पूर्ण शांति और स्थिरता बहाल नहीं होती, और स्थानीय समुदायों के पारंपरिक चराई तथा सेना के गश्त के अधिकारों को पूरी तरह सुरक्षित नहीं किया जाता, तब तक दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में पूर्ण सामान्य स्थिति की बहाली होना असंभव है। हालांकि, इन कूटनीतिक प्रगतियों और कागजी समझौतों के बावजूद, जमीन पर चीनी सेना द्वारा इन वादों के अक्षरशः पालन और नव-निर्मित ‘बफर जोन’ की वास्तविक जमीनी स्थिति को लेकर भारत के शीर्ष रक्षा विशेषज्ञों, सैन्य कमांडरों और स्थानीय लद्दाखी संगठनों के बीच एक निरंतर और गहरी सतर्कता बनी हुई है, क्योंकि इतिहास गवाह है कि चीन कूटनीतिक वार्ताओं का उपयोग अक्सर अपनी सैन्य तैयारियों के लिए समय जुटाने में करता रहा है।

एक परिपक्व और संप्रभु राष्ट्र के रूप में भारत को इस सत्य को स्वीकार करना होगा कि किसी भी बाहरी खतरे या सीमावर्ती आक्रामकता से निपटने के लिए देश की आंतरिक स्थिरता और उसके स्थानीय नागरिकों का अटूट विश्वास सबसे महत्वपूर्ण और मजबूत स्तंभ होते हैं। वर्ष 2019 में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के तहत लद्दाख को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश घोषित किए जाने के बाद, वहाँ के स्थानीय आदिवासी समुदायों में अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान, भूमि स्वामित्व के अधिकारों और सरकारी रोजगार के अवसरों को लेकर कुछ गंभीर आशंकाएँ और चिंताएँ उत्पन्न हुईं। वर्तमान में सोनम वांगचुक और लद्दाख के अन्य प्रमुख नागरिक संगठन भारत के संविधान की ‘छठी अनुसूची’ के तहत सुरक्षा उपायों और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा के शुद्ध दृष्टिकोण से देखा जाए, तो इन दुर्गम सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले नागरिक ही देश की संप्रभुता और रक्षा की सबसे पहली और अग्रिम पंक्ति होते हैं। यदि सीमा पर रहने वाली स्थानीय आबादी स्वयं को प्रशासनिक, राजनीतिक या नीतिगत रूप से उपेक्षित या असुरक्षित महसूस करेगी, तो इसका सीधा नकारात्मक असर उनके मनोबल पर पड़ सकता है। भू-राजनीतिक विश्लेषकों का यह मानना है कि चीन हमेशा उन क्षेत्रों में अपनी आक्रामक और विस्तारवादी नीति को अधिक तेज करता है, जहाँ आंतरिक असंतोष या प्रशासनिक शून्यता की थोड़ी सी भी संभावना होती है। इसलिए, लद्दाख के नागरिकों की इन जायज चिंताओं का समय रहते लोकतांत्रिक संवाद और नीतिगत सुरक्षा के जरिए समाधान ढूंढना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के व्यापक और दीर्घकालिक हित में है।

इस बहुआयामी कूटनीतिक, आर्थिक और सैन्य चुनौती का सफलतापूर्वक सामना करने के लिए भारत सरकार को एक अत्यंत संतुलित, व्यावहारिक, आक्रामक और दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति अपनानी होगी। चीन के साथ होने वाली भविष्य की हर सैन्य और राजनयिक स्तर की वार्ता में भारत को वर्ष 2020 से पहले की ‘यथास्थिति’ की पूर्ण बहाली और अपने पारंपरिक गश्ती अधिकारों पर बिना किसी समझौते के स्पष्ट और कड़ा रुख बनाए रखना चाहिए। इसके साथ ही, लद्दाख के निवासियों को संवैधानिक सुरक्षा, भूमि संरक्षण और वास्तविक प्रशासनिक भागीदारी का अहसास कराना अत्यंत महत्वपूर्ण है, ताकि उन्हें अपनी पहचान खोने का कोई डर न रहे। जब स्थानीय सीमावर्ती समुदायों को यह पूर्ण विश्वास होगा कि उनकी भूमि, आजीविका और संस्कृति कानूनन सुरक्षित है, तो वे चीनी घुसपैठ और दुष्प्रचार के खिलाफ भारतीय सैन्य बलों के सबसे विश्वसनीय, समर्पित और अचूक सहयोगी बनकर खड़े रहेंगे। भारत ने हाल के वर्षों में सीमावर्ती बुनियादी ढांचे, जैसे कि हर मौसम में खुली रहने वाली सड़कों, सामरिक टनल और अग्रिम हवाई पट्टियों का निर्माण बहुत तेज किया है, जिसे और अधिक गति देने की आवश्यकता है, ताकि किसी भी विपरीत परिस्थिति में सामरिक और सैन्य रूप से हम हमेशा दुश्मन पर भारी और मजबूत स्थिति में रहें।

सोनम वांगचुक का यह अनुशासित आंदोलन केवल पर्यावरण संरक्षण या स्थानीय अधिकारों तक सीमित एक क्षेत्रीय मांग नहीं है, बल्कि यह परोक्ष रूप से भारत की सीमाओं की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय सुरक्षा की ओर पूरे देश और नीति-नियंताओं का ध्यान आकर्षित करने का एक अत्यंत गंभीर नागरिक प्रयास है। लद्दाख में चीन की रणनीतिक और कूटनीतिक चालों का उत्तर केवल तात्कालिक सैन्य बल या सामयिक कूटनीतिक समझौतों से नहीं दिया जा सकता; इसके लिए एक मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, निरंतर कूटनीतिक सतर्कता, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की विस्तारवादी नीतियों को बेनकाब करने की रणनीति और सीमावर्ती समाजों के समावेशी व सतत विकास की आवश्यकता है। समय की सबसे बड़ी मांग यही है कि नई दिल्ली लद्दाख की इन संवेदनशील और रणनीतिक चिंताओं को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल करे और एक ऐसी सुदृढ़ राष्ट्रीय नीति का निर्माण करे जो हमारी भौगोलिक सीमाओं को अक्षुण्ण रखने के साथ-साथ सीमावर्ती समाजों के भीतर राष्ट्र के प्रति विश्वास और स्वाभिमान को भी नए क्षितिज प्रदान करे।