नई दिल्ली (योगेश कुमार गोयल)। युद्ध, संवाद, सहअस्तित्व और वैश्विक शांति जैसे ज्वलंत मुद्दों पर केंद्रित श्रीमती कांति देवी जैन स्मृति सातवीं व्याख्यानमाला में तीन दिनों तक देश-विदेश के विद्वानों, शिक्षाविदों, पूर्व प्रशासकों और सामाजिक चिंतकों ने भारतीय दर्शन की दृष्टि से विश्व शांति की संभावनाओं पर व्यापक मंथन किया। ‘युद्ध से संवाद तक: सहअस्तित्व का भारतीय दर्शन एवं विश्व स्तर पर संघ की उपस्थिति’ विषय पर आयोजित व्याख्यानमाला में वक्ताओं ने संवाद को संघर्ष के समाधान का प्रमुख माध्यम बताते हुए राष्ट्रीय शक्ति, अनुशासन, सांस्कृतिक कूटनीति और सामाजिक एकता की आवश्यकता भी रेखांकित की।
प्रथम दिन पूर्व राज्यपाल एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी ने कहा कि भारत सदियों से दुनिया को शांति का संदेश देता आया है। उनके अनुसार, भारतीय दर्शन और संघ की विचारधारा में शांति तथा मानव कल्याण की भावना निहित है। उन्होंने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में युद्ध के बजाय संवाद को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हिंदू विश्वविद्यालय यूके के डॉ. राम वैद्य ने विश्व बंधुत्व की भारतीय परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि संगठन अलग-अलग हो सकते हैं लेकिन समाज को एकजुट रहना चाहिए। पूर्व रक्षा सचिव डॉ. योगेंद्र नारायण का कहना था कि शांति की शुरुआत व्यक्ति के मन से होती है और इतिहास बताता है कि युद्धों का अंत अंततः संवाद से ही हुआ है।
दूसरे दिन प्रख्यात अर्थशास्त्री एवं वैश्विक रणनीतिकार डॉ. विभूति झा ने भारत की बदलती वैश्विक भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि आज भारत को अपनी शक्ति, तकनीकी क्षमता और सामर्थ्य का प्रभावी ढंग से परिचय दुनिया के सामने कराना होगा। उन्होंने अनुशासन और सतत तैयारी को आवश्यक बताते हुए कहा कि शांति के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और सामर्थ्य भी जरूरी हैं। हंसराज कॉलेज की प्राचार्या प्रो. रमा ने संवाद को दूसरे को सुनने और उसके अस्तित्व को स्वीकार करने की प्रक्रिया बताया। ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती भाषा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा ने कहा कि वर्चस्व और आर्थिक हितों के कारण बढ़ते संघर्षों के बीच भारत सहअस्तित्व और वैश्विक परिवार की अवधारणा को आगे बढ़ा रहा है।
समापन दिवस पर सीसीआरटी अध्यक्ष विनोद नारायण इंदुरकर ने विश्व शांति के लिए कला एवं संस्कृति को प्रभावी माध्यम बताते हुए कहा कि सांस्कृतिक संवाद लोगों और समाजों को जोड़ सकता है। तंजानिया से देवेंद्र नाथ पाठक ने कहा कि भारत ने हमेशा शांति के साथ जीने और दूसरों को जीने देने का संदेश दिया है। डॉ. संदीप शास्त्री ने युद्ध को हिंसा और संवाद को अहिंसा का प्रतीक बताते हुए कहा कि भारत शांति का पक्षधर है लेकिन अपनी सुरक्षा के लिए आवश्यक प्रतिरोध भी करता है। इस तीन दिवसीय आयोजन में देश-विदेश से अनेक वक्ताओं ने विचार रखे। प्रस्तावना एवं आयोजन की रूपरेखा संपादक डॉ. अमित जैन ने प्रस्तुत की। कार्यक्रम का संचालन अभिषेक त्रिपाठी सहित विभिन्न सत्रों में अन्य वक्ताओं ने किया। व्याख्यानमाला का समापन इस व्यापक संदेश के साथ हुआ कि स्थायी वैश्विक शांति के लिए संवाद, सहअस्तित्व, सांस्कृतिक जुड़ाव और राष्ट्रीय सामर्थ्य, इन सभी के बीच संतुलन आवश्यक है।





