हिंदी के अच्छे दिन कब आएंगे?

When will the 'good days' for Hindi arrive?

राजाराम त्रिपाठी

“हिंदी आज भी मंच की शेरनी है और दफ्तर की बकरी!”
जी हां जो नेता इसके नाम पर गरजते हैं, और सचिवालय में वही अंग्रेज़ी की दुम हिलाते रहते हैं!*

हर वर्ष 14 सितंबर आता है। सरकारी कार्यालयों में हिंदी दिवस मनाया जाता है। सभागार सजते हैं। मंचों पर हिंदी के सम्मान में भव्य भाषण होते हैं। अधिकारी हिंदी की महिमा गाते हैं। पुरस्कार बांटे जाते हैं। शपथें ली जाती हैं। हिंदी के गौरव का गुणगान होता है और अगले ही दिन वही फाइलें, वही नोटशीट, वही तकनीकी दस्तावेज, वही उच्च स्तरीय बैठकें और वही प्रशासनिक भाषा अंग्रेज़ी में लौट आती है।
यानी हिंदी का साल में एक दिन सम्मान भी है और हिंदी की नित्य पराजय भी।

“हिंदी का दुखड़ा कोई सुनता नहीं, और गाता हर कोई है।”

यह पंक्ति भले हिंदी के दर्द को व्यक्त करने के लिए प्रचलित रूप में उद्धृत की जाती रही हो, लेकिन आज की स्थिति को इससे बेहतर ढंग से समझना कठिन है। हर वर्ष हम कहते हैं, “हिंदी हमारी आत्मा है, हिंदी हमारी पहचान है, हिंदी की जय हो।” लेकिन हमें कार्यालय की मेज तक पहुंचते-पहुंचते अंग्रेज़ी की जरूरत क्यों पड़ जाती है? यह प्रश्न केवल भाषा का नहीं, आत्मविश्वास का प्रश्न है।

आंकड़े इस विडंबना को और अधिक तीखा बनाते हैं। 2011 की जनगणना भारत में हिंदी की वास्तविक जनशक्ति का एक महत्वपूर्ण प्रमाण देती है। 52 करोड़ 83 लाख से अधिक लोगों ने हिंदी को अपनी मातृभाषा बताया था। यह देश की कुल आबादी का लगभग 43.63 प्रतिशत था। यदि प्रथम, द्वितीय और तृतीय भाषा के रूप में हिंदी जानने वालों को शामिल करें तो यह संख्या लगभग 69.16 करोड़ तक पहुंच जाती है। आज दुनिया में हिंदी समझने और बोलने वालों की संख्या 60 करोड़ से अधिक बताई जाती है। इसीलिए हिंदी विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में शामिल है।

लेकिन यहां से असली कहानी शुरू होती है। जिस भाषा के पीछे करोड़ों मनुष्य खड़े हैं, वह इंटरनेट पर इतना छोटा स्थान क्यों घेरती है? वेब-भाषा के आंकड़े इस विडंबना को और तीखा बना देते हैं। W3Techs के जुलाई 2026 के आंकड़ों के अनुसार, जिन वेबसाइटों की सामग्री-भाषा ज्ञात है, उनमें हिंदी का उपयोग 0.1 प्रतिशत से भी कम है। शीर्ष दस लाख वेबसाइटों में भी हिंदी की हिस्सेदारी लगभग 0.1 प्रतिशत है। अर्थात हिंदी बोलने वालों की संख्या करोड़ों में और डिजिटल ज्ञान-संसार में उसकी उपस्थिति प्रतिशत के अंश में! यही वह खाई है जिसे पाटना होगा।
हिंदी को केवल कविता, कहानी, भाषण और भावनाओं की भाषा नहीं बनाना है। उसे कोड, क्लाउड, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, चिकित्सा, कानून, अंतरिक्ष विज्ञान, कृषि विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी और अर्थशास्त्र की भाषा भी बनाना होगा। जिस भाषा में करोड़ों लोग सोचते हैं, उस भाषा में करोड़ों लोगों को ज्ञान प्राप्त करने और नया ज्ञान पैदा करने का अधिकार भी होना चाहिए।

यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य हमारी राजनीतिक बहस में अक्सर उलझा दिया जाता है। भारत के संविधान ने हिंदी को “राष्ट्रभाषा” घोषित नहीं किया है। संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार हिंदी, देवनागरी लिपि में, संघ की राजभाषा है। संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया और संविधान लागू होने के साथ 26 जनवरी 1950 से यह संवैधानिक व्यवस्था अस्तित्व में आई। इसी 14 सितंबर को आज हम हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं।

इसके बाद राजभाषा अधिनियम 1963 आया, 1967 में उसमें महत्वपूर्ण संशोधन हुए और 1976 में राजभाषा नियम बनाए गए। यानी हिंदी को प्रशासनिक व्यवस्था में स्थान देने के लिए संवैधानिक और कानूनी ढांचा बनाया गया। फिर भी सवाल वही है। कानून बन गया, नियम बन गए, विभाग बन गया, समितियां बन गईं, हिंदी दिवस बन गया, हिंदी सप्ताह बन गया, हिंदी पखवाड़ा बन गया, लेकिन हिंदी अभी तक ज्ञान-व्यवस्था की केंद्रीय भाषा क्यों नहीं बन सकी? यही वह दोहरी मानसिकता है जिसे व्यंग्य में कहा जा सकता है, “राजभाषा हिंदी है, पर राज अंग्रेज़ी करती है।”

हिंदी की कहानी आज से शुरू नहीं होती। हिंदी कोई अचानक पैदा हुई भाषा नहीं है। उसकी जड़ें भारतीय भाषाई विकास की उस लंबी परंपरा में हैं, जिसमें संस्कृत, प्राकृत, पालि, अपभ्रंश और मध्यकालीन लोकभाषाओं से होते हुए विभिन्न हिंदी रूप विकसित हुए। अवधी, ब्रज, बुंदेली, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, हरियाणवी, छत्तीसगढ़ी, मगही और अनेक बोलियों ने हिंदी के व्यापक भाषाई संसार को समृद्ध किया है। हिंदी को किसी एक भूगोल या किसी एक समुदाय की संपत्ति मानना उसके विराट स्वरूप को छोटा करना है।

भक्तिकाल में कबीर, तुलसीदास, सूरदास और जायसी जैसे रचनाकारों ने लोकभाषाओं में ऐसा साहित्य रचा जिसने भाषा को राजमहलों से निकालकर जनमानस तक पहुंचाया। बाद में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने आधुनिक हिंदी चेतना को दिशा दी। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भाषा और पत्रकारिता को अनुशासन दिया। प्रेमचंद ने हिंदी को भारतीय समाज की धड़कन बना दिया। मैथिलीशरण गुप्त, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर और अज्ञेय तक आते-आते हिंदी ने आधुनिक भारतीय विचार, साहित्य और सामाजिक चेतना का एक विशाल संसार निर्मित कर लिया।

इसलिए हिंदी को केवल “हिंदी दिवस” की भाषा समझना उसके इतिहास के साथ अन्याय है। यह हजारों वर्षों की भारतीय भाषाई चेतना से विकसित हुई उस आधुनिक अभिव्यक्ति का नाम है, जिसने सामान्य भारतीय मनुष्य के सुख-दुख, संघर्ष, स्वप्न, विद्रोह और संवेदना को शब्द दिए हैं।

हिंदी के इतिहास में एक दिलचस्प और अक्सर भुला दिया जाने वाला अध्याय विदेशी विद्वानों के योगदान का भी है। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में अनेक यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय भाषाओं का अध्ययन किया। स्कॉटिश विद्वान जॉन बोरथविक गिलक्राइस्ट ने हिंदुस्तानी के व्याकरण और शब्दकोश तैयार किए तथा फोर्ट विलियम कॉलेज में हिंदुस्तानी भाषा के अध्ययन को संस्थागत रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने भारतीय विद्वानों के सहयोग से अनेक ग्रंथों के अनुवाद और प्रकाशन का काम कराया। बाद में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन का Linguistic Survey of India भारतीय भाषाओं के अध्ययन की एक विशाल परियोजना बना। इस सर्वेक्षण में भारतीय उपमहाद्वीप की सैकड़ों भाषाओं और बोलियों का दस्तावेजीकरण किया गया। ग्रियर्सन के अध्ययन की अपनी औपनिवेशिक सीमाएं और वैचारिक पूर्वाग्रह भी थे, लेकिन यह तथ्य अपनी जगह महत्वपूर्ण है कि एक विदेशी विद्वान ने भारत की भाषाई विविधता को समझने में दशकों लगाए और इतना विशाल भाषाई सर्वेक्षण तैयार किया।

विडंबना देखिए। विदेशी विद्वान हमारी भाषाओं को जानने के लिए भारत की धूल छान रहे थे और हम आज अपनी ही भाषा में विज्ञान पढ़ाने को लेकर संकोच कर रहे हैं।

हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विस्तार की चर्चा भी कम रोचक नहीं है। 10 जनवरी 1975 को नागपुर में प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हुआ। यह हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप को लेकर एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। बाद में 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई। उद्देश्य था कि हिंदी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा दिया जाए और विदेशों में हिंदी के प्रति रुचि और उसके उपयोग को मजबूत किया जाए।

लेकिन यहां भी प्रश्न वही है। क्या हमने विश्व हिंदी सम्मेलन कर लिए, विश्व हिंदी दिवस मना लिया और हिंदी सप्ताह आयोजित कर लिया, या वास्तव में हिंदी को विश्वस्तरीय ज्ञान-भाषा बनाने की दिशा में पर्याप्त काम किया? क्या हमारे पास चिकित्सा, इंजीनियरिंग, कानून, अर्थशास्त्र, भौतिकी, रसायन, कृषि, पर्यावरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में पर्याप्त उच्च स्तरीय मौलिक हिंदी साहित्य है? क्या दुनिया का कोई विद्यार्थी हिंदी सीखकर भारत के वैज्ञानिक ज्ञान-संसार में प्रवेश कर सकता है? यदि उत्तर अभी पूरी तरह “हां” नहीं है तो हमें उत्सव से आगे बढ़कर निर्माण करना होगा।

यहां मुझे अपनी हाल की रूस यात्रा का अनुभव विशेष रूप से याद आता है। रूस ने अपनी भाषा पर विश्वास छोड़ा नहीं है। विज्ञान हो या परमाणु तकनीक, साहित्य हो या अर्थशास्त्र, शिक्षा हो या प्रशासन, रूसी भाषा ने आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की एक विशाल परंपरा को अपने भीतर विकसित किया है। जर्मनी ने जर्मन भाषा में विज्ञान, दर्शन और तकनीकी शिक्षा की महान परंपरा खड़ी की। फ्रांस ने फ्रेंच को प्रशासन, शिक्षा, साहित्य और बौद्धिक विमर्श की केंद्रीय भाषा बनाए रखा। जापान ने अपनी भाषा के साथ आधुनिक विज्ञान और तकनीक का सफल समन्वय किया। चीन ने चीनी भाषा में विशाल तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान-संसार निर्मित किया।

अपनी यात्राओं के दौरान मैंने थाईलैंड और कंबोडिया जैसे अपेक्षाकृत छोटे देशों में भी यह अनुभव किया कि अपनी भाषा को प्रशासन और सार्वजनिक जीवन से अलग करने का कोई उत्साह वहां दिखाई नहीं देता। इथियोपिया जैसे संसाधन-संकटग्रस्त देश में भी स्थानीय भाषाओं का सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। तो फिर भारत क्यों नहीं? क्या हमारे बच्चों की बुद्धि हिंदी में पढ़ते ही कम हो जाती है? या हमारी समस्या भाषा में नहीं, भाषा के प्रति हमारे आत्मविश्वास में है?

भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं होती। भाषा एक संपूर्ण ज्ञान-व्यवस्था होती है। किसी भाषा को जीवित रखने के लिए उसके साहित्य को बचाना पर्याप्त नहीं है। भाषा तब शक्तिशाली होती है जब उसमें किसान मौसम समझ सके, विद्यार्थी क्वांटम भौतिकी पढ़ सके, डॉक्टर चिकित्सा विज्ञान समझा सके, न्यायाधीश कानून की व्याख्या कर सके, इंजीनियर डिजाइन समझा सके और वैज्ञानिक अपने शोध का वैश्विक संवाद कर सके।
आज हमें हिंदी में केवल अनुवाद से आगे बढ़कर मौलिक ज्ञान-सृजन की आवश्यकता है। हमें ऐसी हिंदी चाहिए जो संस्कृत से शब्द ले सके, उर्दू और फारसी से शब्द ग्रहण कर सके, अंग्रेज़ी और अन्य विश्व भाषाओं से आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली आत्मसात कर सके और फिर भी सहज, स्वाभाविक तथा भारतीय बनी रहे। भाषा कोई बंद कमरा नहीं है। वह नदी है। उसमें जितनी धाराएं मिलती हैं, वह उतनी ही समृद्ध होती है।
संस्कृत का एक अत्यंत सुंदर वचन है, “सा विद्या या विमुक्तये।” अर्थात वही विद्या है जो मनुष्य को मुक्त करे। प्रश्न यह है कि वह शिक्षा कैसी होगी जो विद्यार्थी को विषय तो सिखाए, लेकिन उसे अपनी ही भाषा में सोचने और समझने का अधिकार न दे?

पाश्चात्य दार्शनिक लुडविग विट्गेंश्टाइन का प्रसिद्ध कथन है, “The limits of my language mean the limits of my world.” अर्थात, “मेरी भाषा की सीमाएं ही मेरे संसार की सीमाएं हैं।” यह कथन भारत के भाषा-विमर्श के संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि हमारी शिक्षा की भाषा सीमित है, तो ज्ञान का संसार भी सीमित हो जाता है। यदि करोड़ों भारतीय विज्ञान को अपनी भाषा में समझ ही नहीं सकते, तो विज्ञान का लोकतंत्रीकरण कैसे होगा?

यही कारण है कि हिंदी के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती केवल किताबों की नहीं, तकनीक की है। जिस भाषा में इंटरनेट पर सामग्री कम होगी, उस भाषा के पास भविष्य की कृत्रिम बुद्धिमत्ता, मशीन लर्निंग और डिजिटल ज्ञान प्रणालियों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व कैसे आएगा? आज हिंदी में सोशल मीडिया सामग्री, वीडियो और मनोरंजन की भरमार दिखाई देती है, लेकिन उच्चस्तरीय वैज्ञानिक, तकनीकी और शोध सामग्री का अनुपात अभी भी बहुत कम है। W3Techs के वर्तमान आंकड़े इस चिंता को रेखांकित करते हैं। हिंदी का वेब पर हिस्सा 0.1 प्रतिशत से भी कम है। यह आंकड़ा केवल वेबसाइटों का नहीं है। यह हमारी डिजिटल प्राथमिकताओं का आईना है। हम हिंदी में फेसबुक पोस्ट लिखते हैं, वीडियो बनाते हैं, गीत सुनते हैं और मनोरंजन करते हैं। लेकिन क्या हम हिंदी में विश्वस्तरीय वैज्ञानिक डेटाबेस बना रहे हैं? हम हिंदी में भावनाएं व्यक्त करते हैं, लेकिन क्या हम हिंदी में ज्ञान की नई मशीनें बना रहे हैं? हिंदी को साहित्य से सॉफ्टवेयर तक जाना होगा।

यहां दोष केवल अंग्रेज़ी का नहीं है। अंग्रेज़ी दुनिया से संवाद की एक महत्वपूर्ण भाषा है और उसे सीखना भारत के लिए आवश्यक है। समस्या अंग्रेज़ी सीखने में नहीं, अपनी भाषा को हीन समझने में है। दोष उस मानसिकता का है जिसने अंग्रेज़ी को योग्यता और हिंदी को केवल भावुकता का प्रमाणपत्र बना दिया। दोष उन नेताओं का भी है जो चुनावी मंच पर हिंदी में जनता से वोट मांगते हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में हिंदी को अक्सर पीछे छोड़ देते हैं। दोष उन शिक्षा-नीति निर्माताओं का भी है जिन्होंने मातृभाषा में शिक्षा की आवश्यकता स्वीकार करने के बावजूद उच्च शिक्षा के लिए पर्याप्त हिंदी पाठ्य-संसाधन और मौलिक ज्ञान-साहित्य तैयार नहीं किया। दोष हमारे समाज का भी है। हम अपने बच्चों को अंग्रेज़ी सिखाना चाहते हैं, यह अच्छी बात है। दुनिया की अन्य भाषाएं सीखना भी अच्छी बात है। लेकिन कई बार हम उन्हें हिंदी में सोचने पर हीन समझने लगते हैं। यह समस्या अंग्रेज़ी की नहीं, हमारी मानसिक गुलामी की है।

भारत की संवैधानिक वास्तविकता को समझना भी जरूरी है। हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा घोषित नहीं है। वह संघ की राजभाषा है। भारत की भाषाई विविधता हमारी शक्ति है, कमजोरी नहीं। इसलिए हिंदी का विस्तार अन्य भारतीय भाषाओं को दबाकर नहीं, उनके साथ संवाद करके होना चाहिए। तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी, बंगाली, ओड़िया, असमिया, पंजाबी, गुजराती, कश्मीरी, मैथिली, संस्कृत, उर्दू और देश की सभी भाषाएं भारत की सांस्कृतिक संपदा हैं। हिंदी का भविष्य तभी उज्ज्वल होगा जब वह सत्ता की भाषा बनने से पहले सहयोग की भाषा बनेगी।

हिंदी को राष्ट्रभाषा कहने की राजनीतिक बहस से कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसे ज्ञानभाषा बनाया जाए। क्योंकि किसी भाषा की वास्तविक शक्ति उसके संवैधानिक पदनाम से नहीं, बल्कि उसमें पैदा होने वाले ज्ञान से तय होती है। यदि हिंदी में विश्वस्तरीय विज्ञान लिखा जाएगा, नई तकनीक विकसित होगी, उत्कृष्ट शोध प्रकाशित होंगे, आधुनिक चिकित्सा का साहित्य तैयार होगा, कानून की जटिल अवधारणाएं सहजता से समझाई जाएंगी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नए उपकरण हिंदी में विकसित होंगे, तो हिंदी को सम्मान देने के लिए किसी घोषणा की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। उसका महत्व स्वयं सिद्ध हो जाएगा।

हिंदी के पास जनसंख्या है। उसके पास विशाल साहित्य है। उसके पास सिनेमा है। उसके पास संगीत है। उसके पास प्रवासी भारतीय समुदाय है। उसके पास डिजिटल मंच हैं। उसके पास करोड़ों लोगों का जीवंत भाषाई अनुभव है। लेकिन केवल संख्या किसी भाषा को वैश्विक भाषा नहीं बनाती। ज्ञान उसे वैश्विक बनाता है। इसलिए हमें हिंदी में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय चाहिए। हिंदी में मौलिक वैज्ञानिक शोध चाहिए। हिंदी में उच्चस्तरीय चिकित्सा साहित्य चाहिए। हिंदी में कानून चाहिए। हिंदी में इंजीनियरिंग और कृषि विज्ञान चाहिए। हिंदी में आधुनिक वैज्ञानिक शब्दावली चाहिए। हिंदी में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बड़े भाषा मॉडल चाहिए। हिंदी में विश्वकोश चाहिए। हिंदी में विश्वस्तरीय डिजिटल पुस्तकालय चाहिए। और सबसे बढ़कर चाहिए हिंदी पर विश्वास। आज हिंदी को किसी दूसरी भाषा से युद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। उसे केवल अपने भीतर की पराजय से लड़ना है। उसे अंग्रेज़ी को हटाना नहीं है, बल्कि अंग्रेज़ी के साथ बराबरी से खड़ा होना है। उसे अन्य भारतीय भाषाओं को पराजित नहीं करना है, बल्कि उनके साथ मिलकर भारतीय भाषाई शक्ति का एक नया क्षितिज बनाना है।

14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाने से हिंदी मजबूत नहीं होगी। 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाने से हिंदी वैश्विक नहीं होगी। हिंदी तब वैश्विक होगी जब दुनिया के किसी विश्वविद्यालय का विद्यार्थी यह कह सके कि मुझे भारत का विज्ञान समझने के लिए केवल अंग्रेज़ी पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं, मैं हिंदी में भी वह ज्ञान प्राप्त कर सकता हूं।

हिंदी तब राजभाषा से आगे बढ़कर ज्ञानभाषा बनेगी। और हिंदी तब सचमुच विश्वभाषा बनने की ओर बढ़ेगी जब उसके पास केवल बोलने वाले करोड़ों लोग नहीं, बल्कि सोचने, लिखने, शोध करने और नया ज्ञान पैदा करने वाले करोड़ों लोग भी होंगे।

आज स्थिति यह है कि हिंदी मंच की शेरनी है और कार्यालय की बकरी। अब समय आ गया है कि यह बकरी मिमियाना बंद करे और शेरनी की तरह अपने ही कार्यालयों, विश्वविद्यालयों, प्रयोगशालाओं, न्यायालयों और डिजिटल संसार में दहाड़ना सीखे।

क्योंकि प्रश्न यह नहीं है कि हिंदी कितने लोग बोलते हैं।

असली प्रश्न यह है कि हिंदी में हम कितना नया ज्ञान पैदा करते हैं? हिंदी आज भी चिकित्सा शास्त्र,भौतिक शास्त्र, रसायन शास्त्र, वनस्पति शास्त्र, कृषि विज्ञान भूगर्भ शास्त्र विज्ञान के समस्त संकायों की तथा गणित, इंजीनियरिंग ,कानून,अर्थशास्त्र प्रबंधन जैसे समस्त महत्वपूर्ण विषयों के ज्ञान की स्वीकार्य भाषा नहीं बन पाई है। यह विडंबना ही किसी जाएगी की देश की आजादी के लगभग 80 साल बाद भी हम यह तय नहीं कर पाए हैं हिंदी केवल सामान्य संपर्क रहेगी या कभी आने वाली पीढ़ियों की ज्ञान और रोजगार की भाषा भी बनेगी।