ललित सिहाग
हम सबने समुद्र मंथन की कहानी सुनी या पढ़ी है कि कैसे देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र को मथा था। मंदराचल पर्वत को मथनी बनाया गया और वासुकी नाग को रस्सी और समुद्र से एक के बाद एक कई चीजें निकलीं। विष भी निकला, रत्न भी निकले और अंत में अमृत भी मिला। कहानी पुरानी है, लेकिन आज जब दुनिया के नक्शे को देखें तो लगता है कि समुद्र एक बार फिर मथा जा रहा है और इस बार मंदराचल की जगह बड़े-बड़े बंदरगाह हैं, वासुकी की जगह समुद्री व्यापार और जहाजों की आवाजाही है और अमृत की तलाश दुनिया की आर्थिक और रणनीतिक शक्ति की है। हिंद महासागर आज दुनिया की बड़ी शक्तियों के लिए उसी तरह महत्वपूर्ण होता जा रहा है, जैसे कभी जमीन की सीमाएं हुआ करती थीं और सबसे महत्वपूर्ण बात कि यहां ना कोई देवता है न कोई असुर बल्कि सब अपने आप में एक तरफ़ा फायदा लेने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं।
हिंद महासागर के रास्ते दुनिया का एक बड़ा हिस्सा ऊर्जा और व्यापार का आवागमन करता है। पश्चिम एशिया से तेल और गैस, एशिया से तैयार माल और अफ्रीका से आने वाले संसाधन इसी व्यापक समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरते हैं इसलिए हिंद महासागर की सुरक्षा केवल नौसेना या रक्षा मंत्रालय का विषय नहीं है। इसका सीधा संबंध भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति से है और इस बदलती कहानी में चीन की मौजूदगी सबसे ज्यादा चर्चा में है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने हिंद महासागर के आसपास कई देशों में बंदरगाहों और infrastructure projects में निवेश किया है। पाकिस्तान में ग्वादर, श्रीलंका में हंबनटोटा, म्यांमार में क्यौकफ्यू और अफ्रीका के जिबूती तक चीन की आर्थिक मौजूदगी दिखाई देती है। इनमें से हर जगह को चीनी सैन्य अड्डा कहना शायद अतिशयोक्ति होगी, लेकिन इन्हें केवल व्यापारिक परियोजनाएं मानकर छोड़ देना भी समझदारी नहीं होगी।
किसी देश की समुद्री ताकत अब केवल उसके युद्धपोतों से तय नहीं होती। बंदरगाह, जहाजों के लिए ईंधन और मरम्मत की सुविधाएं, समुद्री निगरानी, उपग्रह, संचार व्यवस्था और supply chains भी strategic power का हिस्सा हैं। चीन ने इस पूरी तस्वीर को काफी पहले समझ लिया और कूर्म की तरह समुद्र में खुद को ऐसे स्थापित किया कि उसके बिना कोई संसाधन प्राप्त ही ना होने पाए।
श्रीलंका का हंबनटोटा इसका अच्छा उदाहरण है। 2017 में श्रीलंका ने हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 वर्ष की लीज पर दिया। यह घटना दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी, यहां यह कहना सही नहीं होगा कि हर चीनी निवेश किसी देश को कर्ज के जाल में फंसाने की योजना है लेकिन यह भी सच है कि किसी रणनीतिक स्थान पर लंबे समय तक इंफ्रास्ट्रक्चर और आर्थिक मौजूदगी भविष्य में राजनीतिक प्रभाव का आधार बन सकती है।
भारत के लिए श्रीलंका इसलिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह हमारे समुद्री पड़ोस में है। भारत को वहां चीन के प्रभाव की चिंता स्वाभाविक रूप से होगी, लेकिन केवल चीन को रोकना हमारी नीति नहीं हो सकती। श्रीलंका को आर्थिक संकट के समय भारत ने जिस तरह सहायता दी, वह बताती है कि पड़ोसी देशों के बीच भरोसा केवल रणनीतिक बयानबाजी से नहीं बनता बल्कि संकट में कौन साथ खड़ा होता है, इससे बनता है।
मालदीव का मामला भी कुछ ऐसा ही है। आकार में छोटा होने के बावजूद हिंद महासागर में उसकी भौगोलिक स्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। वहां राजनीतिक बदलावों को केवल घरेलू राजनीति के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे समुद्री सुरक्षा, निगरानी और बड़ी शक्तियों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी है।
भारत को यहां एक बात समझनी होगी कि अगर हम अपने पड़ोसी देशों को केवल इस नजर से देखेंगे कि वे चीन के साथ हैं या भारत के साथ, तो हम शायद उनकी अपनी जरूरतों और चिंताओं को समझने में असफल होंगे। छोटे देशों को सम्मान और विकल्प देना, उनके आर्थिक ढांचे और अर्थव्यवस्था में सहयोग करना और जरूरत के समय सबसे भरोसेमंद साझेदार बनना ही भारत की वास्तविक ताकत हो सकती है।
हिंद महासागर की कहानी में अमेरिका की मौजूदगी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। डिएगो गार्सिया में अमेरिकी सैन्य सुविधा इस क्षेत्र में उसकी लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक उपस्थिति का प्रतीक है। इसका मतलब साफ है कि हिंद महासागर अब केवल भारत और चीन के बीच का विषय नहीं रहा। अमेरिका, चीन, भारत और कई क्षेत्रीय देश अपने-अपने हितों के साथ यहां मौजूद हैं।
भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यहीं से शुरू होता है। चीन की बढ़ती ताकत के बीच अमेरिका के साथ हमारी रणनीतिक साझेदारी बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन भारत की विदेश नीति की अपनी एक परंपरा रही है कि किसी एक शक्ति के खेमे में पूरी तरह शामिल हुए बिना अपने हितों के अनुसार फैसले लेना। आज इसे रणनीतिक स्वायत्तता कहा जाता है और आने वाले समय में इसकी परीक्षा हिंद महासागर में भी होगी और इस पूरी कहानी में भारत के पास एक ऐसी भौगोलिक ताकत है जिसे अब पहले से कहीं ज्यादा गंभीरता से देखने की जरूरत है और वह है अंडमान और निकोबार।
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के काफी करीब एक महत्वपूर्ण रणनीतिक स्थिति देता है। मलक्का वह समुद्री मार्ग है जिसके जरिए एशिया का बड़ा व्यापार आगे बढ़ता है और चीन की ऊर्जा आपूर्ति का भी महत्वपूर्ण हिस्सा गुजरता है। इसलिए अंडमान और निकोबार भारत के लिए सिर्फ खूबसूरत द्वीप या पर्यटन स्थल ही नहीं हैं बल्कि हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक प्रवेश द्वार हैं।
लेकिन यहां भी केवल सैन्य दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। भारत को बंदरगाह, जहाजरानी निर्माण, व्यापारी नौवहन, समुद्री निगरानी, ड्रोन्स, उपग्रहों और तटीय सुरक्षा पर साथ-साथ काम करना होगा। अगर समुद्र आने वाले समय में आर्थिक शक्ति का प्रमुख रास्ता बनने वाला है तो भारत को अपनी समुद्री अर्थव्यवस्था को भी उतनी ही गंभीरता से लेना होगा।
दरअसल आने वाली समुद्री प्रतिस्पर्धा सिर्फ युद्धपोतों की प्रतिस्पर्धा नहीं होगी। समुद्र के नीचे बिछी इंटरनेट की तारें, ऊर्जा ढांचा, महत्वपूर्ण खनिज, संचार के उपग्रहों का ढांचा और वैश्विक शिपिंग का ढांचा भी उतने ही महत्वपूर्ण होंगे। जिस देश के पास इन नेटवर्क्स को समझने, सुरक्षित रखने और संकट के समय बनाए रखने की क्षमता होगी, उसके पास वास्तविक समुद्री ताकत होगी।
भारत को इसलिए हिंद महासागर में चीन से मुकाबले की रणनीति से आगे बढ़कर अपनी खुद की रणनीति बनानी होगी। भारत की ताकत यह होनी चाहिए कि श्रीलंका को संकट में भारत याद आए, मालदीव को आधारभूत सरंचना के लिए भारत पर भरोसा हो, अफ्रीकी देशों को समुद्री सुरक्षा में भारत एक स्वाभाविक साझेदार लगे और दक्षिण-पूर्व एशिया भारत को एक जिम्मेदार क्षेत्रीय ताकत के रूप में देखे।
समुद्र मंथन की कहानी में विष भी निकला था और अमृत भी। आज हिंद महासागर में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है। एक तरफ व्यापार, आपसी संबंध और विकास के अवसर हैं तो दूसरी तरफ सैन्य प्रतिस्पर्धा, संसाधनों की होड़ और बड़ी शक्तियों के बीच तनाव है। भारत के लिए चुनौती यह नहीं है कि वह इस मंथन को रोक दे क्योंकि समुद्र को रोकना संभव भी नहीं है। चुनौती यह है कि भारत इस बदलती समुद्री व्यवस्था में अपनी भूमिका खुद तय करे क्योंकि हिंद महासागर हमारे लिए केवल एक समुद्र नहीं है बल्कि यह भारत की ऊर्जा का रास्ता है, व्यापार की जीवनरेखा है और भविष्य की वैश्विक शक्ति का एक बड़ा आधार है।
समुद्र फिर मथा जा रहा है और इस बार सवाल अमृत किसे मिलेगा, इसका नहीं है बल्कि सवाल यह है कि इस मंथन में भारत अपनी जगह कितनी मजबूती से बना पाएगा।





