ललित गर्ग
भारत की संत-परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास का स्थान केवल एक महान कवि अथवा रामभक्त के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय जीवन-दर्शन के लोकनायक और सांस्कृतिक राष्ट्रनायक के रूप में है। श्रावण शुक्ल सप्तमी को मनाई जाने वाली तुलसीदास जयंती हमें उस महापुरुष के स्मरण का अवसर देती है, जिसने रामकथा को राजमहलों और संस्कृत के विद्वत्-वर्ग से निकालकर जन-जन की भाषा, संवेदना और जीवन का हिस्सा बना दिया। तुलसीदास ने भक्ति को केवल पूजा-पद्धति नहीं रहने दिया, उसे चरित्र, मर्यादा, करुणा, सेवा, समन्वय और लोकमंगल का जीवन-मंत्र बना दिया। तुलसीदास का जीवन स्वयं एक अद्भुत आध्यात्मिक यात्रा है। उनका जन्म अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में हुआ। बाल्यकाल में ही माता-पिता का साया छूट गया। जीवन में अभाव और संघर्ष रहे, लेकिन यही संघर्ष आगे चलकर उनकी चेतना के निर्माण की भूमि बने। उनका प्रारंभिक नाम ‘रामबोला’ बताया जाता है। रामनाम उनके जीवन में केवल एक धार्मिक संबोधन नहीं, बल्कि अस्तित्व का आधार बन गया। आगे चलकर रत्नावली के जीवन-परिवर्तनकारी वचन ने उनके भीतर वैराग्य की ऐसी ज्योति प्रज्वलित की, जिसने सांसारिक आसक्ति को रामभक्ति की विराट धारा में परिवर्तित कर दिया।
तुलसीदास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने भक्ति और जीवन को अलग-अलग खानों में नहीं बांटा। उनके लिए राम मंदिर में प्रतिष्ठित मूर्ति मात्र नहीं हैं। राम सत्य हैं, मर्यादा हैं, नीति हैं, करुणा हैं, शील हैं, शक्ति हैं और लोककल्याण की प्रेरणा हैं। इसलिए तुलसी के राम भारतीय मानस के ऐसे आदर्श बनते हैं, जिनमें ईश्वर और मनुष्य के श्रेष्ठतम गुणों का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। तुलसीदास की अमर कृति ‘रामचरितमानस’ भारतीय साहित्य और संस्कृति की ऐसी महान उपलब्धि है, जिसकी प्रासंगिकता सदियों के बाद भी कम नहीं हुई। यह केवल रामकथा नहीं है, यह मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली जीवन-संहिता है। इसमें परिवार है, समाज है, राजनीति है, राज्यनीति है, कर्तव्य है, त्याग है, मित्रता है, भ्रातृत्व है, करुणा है और सबसे ऊपर धर्म का वह व्यापक स्वरूप है, जो व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठकर लोकमंगल से जोड़ता है। तुलसी ने संस्कृत के गूढ़ आध्यात्मिक ज्ञान को अवधी की सहज और मधुर भाषा में प्रस्तुत करके ज्ञान की सीमाओं को तोड़ा। यही कारण है कि रामचरितमानस केवल पंडितों का ग्रंथ नहीं बना, बल्कि गांव की चौपाल से लेकर नगरों के साहित्यिक मंच तक, मंदिरों से लेकर घरों के आंगन तक जनजीवन का अभिन्न अंग बन गया। तुलसी ने जिस भाषा में लिखा, वह जनता की भाषा थी, जिस कथा को चुना, वह जनमानस की आस्था से जुड़ी थी और जिन मूल्यों को सामने रखा, वे सार्वकालिक थे। इसीलिए तुलसी का साहित्य कालजयी बना।
काशी में उनके ग्रंथ को लेकर मधुसूदन सरस्वती जैसे महान विद्वान ने तुलसी की काव्यप्रतिभा की प्रशंसा करते हुए लिखा है कि काशी रूपी आनंदवन में तुलसीदास चलते-फिरते तुलसी-वृक्ष हैं और उनकी काव्य-मंजरी पर रामरूपी भ्रमर मंडरा रहा है। यह टिप्पणी केवल प्रशंसा नहीं, बल्कि तुलसी की आध्यात्मिक और साहित्यिक ऊंचाई की स्वीकृति के रूप में देखी जाती है। तुलसीदास की भक्ति निष्क्रिय पलायन की भक्ति नहीं है। वह मनुष्य को कर्म से विमुख नहीं करती, बल्कि कर्तव्य के प्रति जागरूक करती है। उनके राम वन जाते हैं तो कर्तव्य के कारण। भरत राजसत्ता ठुकराते हैं तो भ्रातृप्रेम और त्याग के कारण। हनुमान सेवा करते हैं तो पूर्ण समर्पण के साथ। सीता संकट में भी धैर्य और आत्मबल का परिचय देती हैं। तुलसी के लिए भक्ति का अर्थ है-अहंकार का विसर्जन और अपने भीतर के श्रेष्ठतम मनुष्य का जागरण। उनका रामभक्त स्वयं को ईश्वर के सामने समर्पित करता है, लेकिन संसार से भागता नहीं। वह समाज, परिवार और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों को अधिक गंभीरता से निभाता है। इसीलिए तुलसी की भक्ति में ज्ञान, कर्म और प्रेम का त्रिवेणी-संगम दिखाई देता है।
तुलसीदास को केवल धार्मिक कवि मानना उनके विराट व्यक्तित्व को सीमित करना होगा। उनके साहित्य में तत्कालीन समाज की विसंगतियों, विघटन और नैतिक संकटों की गहरी अनुभूति है। उन्होंने समाज को कोई राजनीतिक घोषणा-पत्र नहीं दिया, बल्कि चरित्र-निर्माण के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का रास्ता दिखाया। उनके रामराज्य की कल्पना में शासन का उद्देश्य सत्ता नहीं, लोककल्याण है। रामराज्य में व्यक्ति भयमुक्त, सम्मानपूर्ण और संतुलित जीवन जीता है। तुलसी के साहित्य का यह पक्ष आज भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि आधुनिक समाज में विकास के साथ-साथ नैतिकता, संवेदना और सामाजिक विश्वास का संकट भी दिखाई देता है। आज परिवार टूट रहे हैं, संबंधों में स्वार्थ बढ़ रहा है, सार्वजनिक जीवन में मर्यादा का क्षरण हो रहा है और व्यक्ति भौतिक उपलब्धियों के बावजूद भीतर से अशांत है। ऐसे समय में तुलसी का साहित्य हमें याद दिलाता है कि सभ्यता की वास्तविक शक्ति उसके चरित्र में होती है, केवल उसकी संपन्नता में नहीं। रामराज्य को केवल किसी प्राचीन शासन-व्यवस्था के रूप में देखना उचित नहीं होगा। यह एक नैतिक और मानवीय व्यवस्था का आदर्श है, जहां शासन लोकहितकारी हो, न्याय निष्पक्ष हो, समाज में परस्पर विश्वास हो और व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को भी समझे।
तुलसीदास का कृतित्व अत्यंत व्यापक है। ‘रामचरितमानस’, ‘विनय-पत्रिका’, ‘कवितावली’, ‘गीतावली’, ‘दोहावली’, ‘कृष्णगीतावली’, ‘जानकीमंगल’, ‘पार्वतीमंगल’, ‘रामलला नहछू’, ‘वैराग्यसंदीपनी’ और ‘हनुमान बाहुक’ आदि उनकी साहित्यिक प्रतिभा के विविध आयामों को सामने रखते हैं। ‘विनय-पत्रिका’ में भक्त का आत्मसमर्पण है तो ‘कवितावली’ में जीवन और समाज के अनुभवों की तीखी संवेदना भी है। ‘हनुमान बाहुक’ में व्यक्तिगत पीड़ा और आध्यात्मिक आश्रय का अद्भुत संगम दिखाई देता है। इस दृष्टि से तुलसी केवल रामकथा के कवि नहीं, बल्कि मनुष्य की बाहरी और भीतरी दोनों यात्राओं के कवि हैं। तुलसीदास का सबसे महत्वपूर्ण संदेश समन्वय है। उन्होंने ज्ञान और भक्ति, लोक और शास्त्र, आदर्श और यथार्थ, व्यक्ति और समाज तथा अध्यात्म और व्यवहार के बीच पुल बनाया। उनका साहित्य विभाजन नहीं, समरसता की ओर ले जाता है। उनकी दृष्टि में धर्म संकीर्ण पहचान नहीं, बल्कि जीवन को सत्य, करुणा, संयम और मर्यादा से जोड़ने वाली शक्ति है। यही कारण है कि रामचरितमानस का प्रभाव केवल धार्मिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, उसने भारतीय कला, संगीत, नाटक, लोकपरंपरा, सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक स्मृति को गहराई से प्रभावित किया।
आज तकनीक ने संसार को छोटा कर दिया है, लेकिन मनुष्य का मन कई बार अकेला और अस्थिर होता जा रहा है। सूचना बहुत है, लेकिन विवेक का अभाव दिखाई देता है। संपत्ति बढ़ रही है, लेकिन संतोष घट रहा है। संपर्क बढ़ रहे हैं, लेकिन संबंध कमजोर हो रहे हैं। ऐसे समय में तुलसीदास का संदेश पहले से अधिक प्रासंगिक है। रामचरितमानस हमें सिखाता है कि विकास के साथ मूल्य, शक्ति के साथ विनम्रता, ज्ञान के साथ विवेक और अधिकार के साथ कर्तव्य आवश्यक है। तुलसी का राम हमें भीतर के रावण से लड़ने की प्रेरणा देता है। बाहरी विजय से पहले अंतर्मन की विजय आवश्यक है। तुलसी की यही सबसे बड़ी देन है कि उन्होंने राम को केवल अयोध्या का राजा नहीं रहने दिया, बल्कि भारतीय चेतना के भीतर का आदर्श मनुष्य बना दिया। तुलसीदास का जीवन हमें बताता है कि परिस्थितियां मनुष्य को नहीं बनातीं, बल्कि मनुष्य अपनी चेतना से परिस्थितियों को अर्थ देता है। एक संघर्षशील जीवन से उठकर तुलसी ने ऐसा साहित्य रचा, जिसने भारत की कई पीढ़ियों को संस्कार दिए।
तुलसीदास भारतीय संस्कृति की स्मृति मात्र नहीं, उसकी जीवंत चेतना हैं। उनकी भक्ति हमें भीतर की यात्रा कराती है, उनका साहित्य जीवन का विवेक देता है और उनका राम हमें यह विश्वास दिलाता है कि मनुष्य अपने आचरण से स्वयं को ऊंचा उठा सकता है। तुलसी को सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम रामचरितमानस को केवल पढ़ें नहीं, अपने जीवन में चरितार्थ करें। यही तुलसी का जीवन-दर्शन है, यही उनके कृतित्व की सार्थकता है और यही आज के अशांत, विभाजित और मूल्य-संकट से जूझते समाज के लिए उनकी सबसे बड़ी प्रासंगिकता भी है।





