अजय कुमार
स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दिया गया भाषण देश की राजनीति में एक नया मोड़ ले आया है। प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि सरकार ने हथियार उठाने वाले नक्सलियों को लगभग समाप्त कर दिया है, लेकिन देश के भीतर अब एक नया खतरा पैदा हो गया है, जिसे उन्होंने ‘दिमागी नक्सली’ कहा। उनके अनुसार, ये लोग बंदूकों से नहीं, बल्कि अपनी विचारधारा और विमर्श से देश को नुकसान पहुंचाने और युवाओं को गुमराह करने की ताक में रहते हैं। इस बयान के आते ही भारतीय राजनीति में एक भूचाल-सा आ गया। विपक्षी दलों ने इस शब्दावली को एक बड़े हथियार के रूप में लपक लिया और सरकार के खिलाफ एक अनोखा विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इस विरोध की शुरुआत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम के एक बड़े बयान से हुई, जिन्होंने सार्वजनिक रूप से खुद को ‘दिमागी नक्सली’ घोषित कर दिया। इसके बाद देखते ही देखते आम आदमी पार्टी और कई अन्य क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने भी खुद को इस श्रेणी में खड़ा करना शुरू कर दिया। नेताओं द्वारा खुद को दिमागी नक्सली बताने की यह होड़ सिर्फ एक तात्कालिक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक बिसात और रणनीतियां छिपी हुई हैं, जो आने वाले समय में देश की राजनीति की दिशा और दशा तय करेंगी।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे पहला और गहरा असर राजनीतिक विमर्श के स्तर पर देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने ‘दिमागी नक्सली’ शब्द का इस्तेमाल उन लोगों को घेरने के लिए किया था, जो सरकार की नीतियों का विरोध करते हैं और जिनके बारे में सत्ता पक्ष का मानना है कि वे देश के विकास में बाधा डालते हैं। लेकिन विपक्ष ने इस आक्रामक हमले को एक रक्षात्मक कवच में बदल दिया। पी. चिदंबरम और आम आदमी पार्टी के नेताओं द्वारा खुद को दिमागी नक्सली कहना वास्तव में सरकार की परिभाषा का मज़ाक उड़ाना और उसकी धार को कुंद करना है। विपक्ष का यह कदम यह संदेश देने की कोशिश है कि अगर सरकार पर सवाल उठाना, नीतियों की आलोचना करना और युवाओं को जागरूक करना नक्सलवाद है, तो वे गर्व से इस ठप्पे को स्वीकार करते हैं। इससे देश की राजनीति में एक नया ध्रुवीकरण पैदा हो गया है, जहां एक तरफ सरकार देशभक्ति और राष्ट्रवाद के नाम पर असहमति को दबाने का प्रयास करती दिख रही है, वहीं दूसरी तरफ विपक्ष इस असहमति को लोकतंत्र की आत्मा बताकर खुद को पीड़ित और क्रांतिकारी के रूप में पेश कर रहा है।
इस राजनीतिक उठापटक का दूसरा बड़ा पहलू युवाओं और देश के बौद्धिक वर्ग पर पड़ने वाला प्रभाव है। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में विशेष रूप से युवाओं का जिक्र किया था कि उन्हें ये दिमागी नक्सली भटका रहे हैं। भारत एक युवा-प्रधान देश है और युवाओं की राय चुनाव के नतीजों को पलटने की ताकत रखती है। विपक्ष द्वारा खुद को दिमागी नक्सली बताना युवाओं के एक बड़े वर्ग को आकर्षित कर सकता है, खासकर उन छात्रों और बुद्धिजीवियों को, जो विश्वविद्यालयों में सरकार की शिक्षा नीतियों, बेरोजगारी और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बहस करते हैं। जब बड़े नेता खुद पर यह ठप्पा लगाते हैं, तो वे युवाओं को यह अहसास कराते हैं कि स्थापित व्यवस्था के खिलाफ सोचना या सवाल पूछना कोई अपराध नहीं है। इसके विपरीत, सत्ता पक्ष इस विमर्श को स्थापित करने में जुटेगा कि विपक्ष देश के विकास को पटरी से उतारने वाली ताकतों के साथ खड़ा है। यह खींचतान देश के युवाओं के बीच वैचारिक विभाजन को और गहरा करेगी, जिससे वे रचनात्मक विमर्श के बजाय राजनीतिक खेमेबाजी का हिस्सा बनने लगेंगे।
तीसरा बड़ा असर देश की सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की राजनीति पर पड़ेगा। अब तक नक्सलवाद को एक भौगोलिक और हथियारबंद समस्या के रूप में देखा जाता था, जिसे पुलिस और सेना के जरिए हल किया जा रहा था। लेकिन अब जब यह लड़ाई ‘दिमाग’ और ‘विचारधारा’ के स्तर पर आ गई है, तो सरकार की जांच एजेंसियों की भूमिका पर भी सवाल उठेंगे। विपक्ष का डर यह है कि ‘दिमागी नक्सली’ की आड़ में सरकार अपने आलोचकों, पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को निशाना बना सकती है। जब विपक्ष के नेता खुद आगे बढ़कर यह टैग अपना रहे हैं, तो वे एक तरह से सरकार को यह चुनौती दे रहे हैं कि यदि वे नक्सली हैं, तो सरकार उन पर कार्रवाई करके दिखाए। यह स्थिति देश की न्यायपालिका और सुरक्षा एजेंसियों के लिए भी एक परीक्षा की घड़ी होगी, क्योंकि उन्हें विचार की स्वतंत्रता और देश के खिलाफ साजिश के बीच एक बहुत ही महीन रेखा खींचनी होगी। राजनीति के इस खेल में अगर कानूनी कार्रवाइयां बढ़ती हैं, तो इससे राजनीतिक प्रतिशोध की भावना और बढ़ेगी, जिससे लोकतंत्र की बुनियाद कमजोर हो सकती है।
चौथा महत्वपूर्ण प्रभाव आम चुनाव और क्षेत्रीय राजनीति के समीकरणों पर दिखाई देगा। इस नए विवाद ने विपक्ष को एक ऐसा साझा मंच दे दिया है, जहां विचारधाराओं के मतभेद भूलकर कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अन्य दल एक सुर में बोल रहे हैं। ‘दिमागी नक्सली’ शब्द अब एक राजनीतिक पहचान बन रहा है, जिसका इस्तेमाल विपक्ष सरकार-विरोधी वोटों को एकजुट करने के लिए करेगा। आम आदमी पार्टी जैसी पार्टियां, जो हमेशा से खुद को आम आदमी की आवाज़ और व्यवस्था-विरोधी बताती रही हैं, इस विमर्श का उपयोग अपने कैडर को और अधिक आक्रामक बनाने के लिए करेंगी। वहीं दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी इस पूरे मामले को राष्ट्रवाद बनाम देश-विरोधी ताकतों के पुराने और परखे हुए नैरेटिव में ढालने की कोशिश करेगी। भाजपा अपने मतदाताओं को यह समझाने का प्रयास करेगी कि विपक्ष के नेता खुद स्वीकार कर रहे हैं कि उनकी मानसिकता नक्सली है, जो देश की अखंडता के लिए खतरा है। यह चुनावी जंग को और अधिक तीखा और व्यक्तिगत बना देगा, जहां नीतियों पर बहस कम और एक-दूसरे के चरित्र और राष्ट्रभक्ति पर सवाल ज्यादा उठाए जाएंगे।
अंततः, इस पूरे विवाद का देश की लोकतांत्रिक संस्कृति पर बहुत गहरा और दूरगामी असर पड़ने वाला है। जब देश की राजनीति में शब्दों की मर्यादा टूटने लगती है और सर्वोच्च पदों से दिए गए बयानों को मज़ाक या ढाल बना लिया जाता है, तो जनता का राजनीतिक व्यवस्था से भरोसा डगमगाने लगता है। प्रधानमंत्री और विपक्ष के बीच चल रही यह ‘शब्दों की जंग’ यह दिखाती है कि भारतीय राजनीति अब मुद्दों से हटकर पूरी तरह से नैरेटिव और धारणाओं के खेल पर टिकी हुई है। खुद को दिमागी नक्सली बताना विपक्ष के लिए एक चतुर राजनीतिक दांव हो सकता है, लेकिन यह देश के सामने यह यक्ष प्रश्न भी खड़ा करता है कि क्या हमारी राजनीति इतनी सतही हो चुकी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील शब्दों का इस्तेमाल केवल चुनावी लाभ के लिए किया जाए। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि जनता इस वैचारिक द्वंद्व को किस रूप में स्वीकार करती है। क्या वह सरकार के इस तर्क को मानेगी कि विपक्ष देश को कमजोर कर रहा है, या वह विपक्ष के इस दावे पर भरोसा करेगी कि सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए नए-नए जुमले गढ़ रही है। इस राजनीतिक लड़ाई का जो भी नतीजा हो, लेकिन एक बात साफ है कि 15 अगस्त के इस भाषण ने भारतीय राजनीति में एक ऐसा विमर्श छेड़ दिया है, जो आने वाले कई सालों तक गूंजता रहेगा।





