संजय सक्सेना
झारखंड में छात्रों के चौतरफा और ऐतिहासिक आंदोलन के आगे आखिरकार मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार झुक गई है और उसने राज्य की सबसे विवादित झारखंड कर्मचारी चयन आयोग-संयुक्त स्नातक स्तरीय परीक्षा को रद्द करने के साथ ही साल 2014 से अब तक निजी एजेंसी टीडीपीएल द्वारा ली गई सभी भर्ती परीक्षाओं और नियुक्तियों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कैबिनेट की एक मैराथन बैठक बुलाई और इस बड़े फैसले पर मुहर लगा दी। छात्रों की इस अभूतपूर्व जीत के बाद राज्य भर के परीक्षा केंद्रों और प्रदर्शन स्थलों पर जश्न का माहौल है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में एक बड़ा पेंच अभी भी फंसा हुआ है। छात्र संगठन इस पूरे घोटाले की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई जांच की मांग पर अड़े हुए हैं, जिसे राज्य सरकार ने फिलहाल सिरे से खारिज कर दिया है। मुख्यमंत्री सोरेन ने इस पूरे मामले की कमान राज्य की अपराध अनुसंधान विभाग और विशेष जांच दल को सौंपते हुए वर्ष 2014 से हुई गड़बड़ियों की व्यापक जांच का आदेश दिया है, लेकिन वह केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से सीबीआई जांच की सिफारिश करने से साफ बच रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों और जानकारों का मानना है कि राज्य सरकार को डर है कि अगर यह जांच सीबीआई के हाथों में चली गई, तो जांच की आंच सीधे सरकार के शीर्ष अधिकारियों और सत्ता के गलियारों तक पहुंच जाएगी, जिससे उनकी राजनीतिक गर्दन पूरी तरह से दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार के हाथों में आ जाएगी।
इस पूरे विवाद की जड़ में वह परीक्षाएं हैं, जिन्हें लेकर पिछले कई महीनों से राज्य का युवा सड़कों पर उतरा हुआ था। छात्रों के भारी दबाव के बाद झारखंड सरकार ने जिन प्रमुख परीक्षाओं को रद्द किया है, उनमें सबसे बड़ी जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा शामिल है। इसके अलावा, एक विवादित और दागी आउटसोर्सिंग एजेंसी ‘टीआरएस डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड’ (टीडीपीएल) के जरिए वर्ष 2014 से लेकर अब तक जितनी भी परीक्षाएं आयोजित की गई थीं, उनके परिणाम जारी हुए थे या जिन अभ्यर्थियों का चयन हुआ था, उन सभी प्रक्रियाओं को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया गया है। इतना ही नहीं, सरकार ने इससे पहले ही छात्रों के भारी विरोध को देखते हुए 14वीं झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) की प्रारंभिक परीक्षा और वर्ष 2023 और 2025 में आयोजित जेपीएससी की बैकलॉग परीक्षाओं को भी रद्द करने का फैसला लिया था। इन परीक्षाओं में बड़े पैमाने पर प्रश्नपत्र लीक होने, डिजिटल धांधली करने और पैसों के लेन-देन के गंभीर आरोप लगे थे, जिसके बाद तीन जेपीएससी सदस्यों को अपने पदों से इस्तीफा तक देना पड़ा था। सरकार ने अब परीक्षाओं के आयोजन में सुधार लाने और पूरी व्यवस्था को पारदर्शी बनाने के लिए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी अमिताभ कौशल के नेतृत्व में एक उच्च स्तरीय परीक्षा सुधार समिति का गठन भी कर दिया है।
पिछले 24 दिनों का घटनाक्रम झारखंड के इतिहास में युवाओं के सबसे बड़े और संगठित विद्रोह की कहानी बयां करता है। आंदोलन की शुरुआत जुलाई के आखिरी हफ्तों में हुई थी, जब जेएसएससी-सीजीएल परीक्षा के आयोजन और उसके नतीजों में भारी विसंगतियां और धांधली के सबूत सोशल मीडिया पर तैरने लगे थे। इसके बाद छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा और उन्होंने रांची की सड़कों पर उतरकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन शुरू कर दिया। देखते ही देखते इस आंदोलन ने एक उग्र रूप ले लिया और छात्र नेताओं ने जयपाल सिंह स्टेडियम और अन्य प्रमुख स्थलों पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। पिछले दो हफ्तों से छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो और राहुल क्रांति समेत कई अन्य अभ्यर्थी आमरण अनशन पर बैठ गए थे। भूख हड़ताल की वजह से कई छात्रों की तबीयत इस कदर बिगड़ गई कि उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। इसके बावजूद छात्रों का हौसला नहीं डगमगाया और उन्होंने सरकार से साफ कह दिया कि जब तक परीक्षाएं रद्द नहीं होंगी और पारदर्शी जांच की गारंटी नहीं मिलेगी, वे पीछे नहीं हटेंगे। छात्रों ने 20 अगस्त को मुख्यमंत्री आवास का घेराव करने और राज्य विधानसभा तक एक विशाल पैदल मार्च निकालने का भी एलान कर दिया था, जिसने सोरेन सरकार के भीतर एक राजनीतिक घबराहट पैदा कर दी थी।
आंदोलन के बढ़ते दबाव और छात्रों की बिगड़ती सेहत को देखते हुए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को अपने मंत्रियों के साथ एक आपातकालीन बैठक करनी पड़ी। इस बैठक में राज्य के खुफिया इनपुट और पुलिस विभाग की रिपोर्ट को सामने रखा गया, जिसमें यह साफ हो गया था कि छात्रों का यह गुस्सा राज्य सरकार के लिए आगामी चुनावों में भारी नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसके बाद मुख्यमंत्री ने खुद सामने आकर घोषणा की कि सीआईडी और एसआईटी की जांच में कुछ बेहद चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं, जिन्हें इस मोड़ पर उजागर नहीं किया जा सकता। उन्होंने माना कि परीक्षाओं का संचालन करने वाली बाहरी एजेंसियां एक बड़े रैकेट का हिस्सा हैं, जो झारखंड के युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही थीं। सरकार ने तुरंत टीडीपीएल को ब्लैकलिस्ट करते हुए उसके द्वारा कराए गए पिछले दस साल के सभी कामों को शून्य घोषित कर दिया। मंत्रियों की मौजूदगी में अस्पताल में भर्ती अनशनकारी छात्रों को जूस पिलाकर उनका अनशन खत्म कराया गया, जिसे छात्र संगठनों ने अपनी आधी और ऐतिहासिक जीत माना।
हालांकि, परीक्षाओं के रद्द होने से आंदोलन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, बल्कि इसने एक नया राजनीतिक और कानूनी मोड़ ले लिया है। छात्र संगठन और विपक्षी दल अब भी इस बात पर अड़े हैं कि राज्य की सीआईडी या एसआईटी इस विशाल सिंडिकेट और उसके असली सरगनाओं को कभी नहीं पकड़ पाएगी। छात्रों का तर्क है कि जब तक इस पूरे मामले की जांच देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई नहीं करेगी, तब तक पर्दे के पीछे बैठे असली ‘मास्टरमाइंड’ और सफेदपोश राजनेता कभी बेनकाब नहीं होंगे। दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का सीबीआई जांच से इनकार करना उनकी राजनीतिक मजबूरी और केंद्रीय एजेंसियों के डर को दर्शाता है। सोरेन सरकार का मानना है कि केंद्र की भाजपा सरकार सीबीआई का इस्तेमाल विपक्षी दलों को कुचलने और राज्य सरकारों को अस्थिर करने के लिए एक राजनीतिक हथियार के रूप में करती रही है। मुख्यमंत्री खुद भूमि घोटाले से जुड़े एक मामले में प्रवर्तन निदेशालय द्वारा गिरफ्तार किए जाने के बाद महीनों जेल में बिताकर हाल ही में जमानत पर बाहर आए हैं। ऐसे में वे भली-भांति जानते हैं कि अगर उन्होंने इस परीक्षा घोटाले की चाबी सीबीआई को सौंप दी, तो केंद्र सरकार इस जांच का दायरा बढ़ाकर उनके करीबियों और सरकार के मंत्रियों तक पहुंचा देगी, जिससे पूरी सरकार संकट में आ सकती है।





