सत्य भूषण शर्मा
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ आवाज़ें ऐसी हैं, जिन्हें केवल सुना नहीं जाता, बल्कि महसूस किया जाता है। मोहम्मद रफ़ी उन्हीं विरल स्वरों में से एक थे। उनकी आवाज़ में प्रेम की कोमलता थी, विरह की टीस थी, भक्ति की आस्था थी, देशभक्ति का जोश था और जीवन के संघर्षों के बीच मुस्कुराने की प्रेरणा भी। यही कारण है कि रफ़ी साहब के गीत किसी एक दौर, एक अभिनेता या एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रहे। वे समय की सीमाएँ लांघकर आज भी करोड़ों दिलों में बसे हुए हैं।
आवाज़ में था भावनाओं का विराट संसार
रफ़ी साहब की सबसे बड़ी विशेषता उनकी बहुमुखी प्रतिभा थी। वे केवल अच्छे गायक नहीं थे, बल्कि गीत के भाव को आत्मसात कर उसे अपनी आवाज़ में जीवंत करने वाले कलाकार थे।
एक तरफ वे “ओ दुनिया के रखवाले” जैसे गीत में दर्द की गहराइयों को स्वर देते हैं, तो दूसरी ओर “सर जो तेरा चकराए” में हास्य और चंचलता का अद्भुत रंग भर देते हैं। “चौदहवीं का चाँद हो” में रोमांस की नजाकत है तो “मन तड़पत हरि दर्शन को आज” में भक्ति की गहनता। देशभक्ति के गीतों में उनकी आवाज़ श्रोताओं के भीतर ऊर्जा भर देती थी।
यही रफ़ी की असाधारण क्षमता थी—गीत कोई भी हो, भाव कोई भी हो, पात्र कोई भी हो; रफ़ी की आवाज़ उस भाव का चेहरा बन जाती थी।
हर अभिनेता की अपनी आवाज़
हिंदी सिनेमा में पार्श्वगायन का अर्थ केवल गीत गाना नहीं, बल्कि पर्दे पर दिखाई देने वाले पात्र को आवाज़ देना भी है। रफ़ी साहब इस कला के अप्रतिम उस्ताद थे।
देव आनंद की चंचलता, दिलीप कुमार की गंभीरता, राजेंद्र कुमार का रोमांटिक अंदाज़, शम्मी कपूर की उछलती ऊर्जा और धर्मेंद्र का पुरुषार्थ—हर व्यक्तित्व के लिए रफ़ी की आवाज़ का अलग रंग दिखाई देता है।
उनकी आवाज़ में इतनी विविधता थी कि श्रोता को कभी यह महसूस नहीं होता था कि अलग-अलग अभिनेताओं के पीछे एक ही गायक की आवाज़ है।
संगीतकारों के प्रिय गायक
रफ़ी साहब ने भारतीय फिल्म संगीत के अनेक महान संगीतकारों के साथ काम किया। नौशाद, शंकर-जयकिशन, सचिन देव बर्मन, ओ.पी. नैय्यर, मदन मोहन, रवि, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल और अनेक संगीतकारों की धुनों को उन्होंने अपनी आवाज़ से नई ऊँचाइयाँ दीं।
उनकी गायकी में शास्त्रीय संगीत की पकड़ भी थी और लोकधुनों की सहजता भी। वे कठिन से कठिन सुरों को इस तरह गाते थे कि श्रोता को वह सहज और स्वाभाविक प्रतीत होता था।
यही महान कलाकार की पहचान होती है—कठिन कला को इतना सरल बना देना कि सुनने वाला कठिनाई को भूल जाए।
रफ़ी साहब की विनम्रता भी उतनी ही महान थी
रफ़ी साहब की महानता केवल उनके स्वरों में नहीं, उनके व्यवहार में भी थी। अपार लोकप्रियता और असाधारण सफलता के बावजूद उनमें अहंकार का लेश मात्र नहीं था।
उनका व्यक्तित्व बताता है कि सच्ची ऊँचाई वह नहीं जो व्यक्ति को दूसरों से ऊपर खड़ा कर दे, बल्कि वह है जो उसे और अधिक विनम्र बना दे।
संगीत की दुनिया में जहाँ प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक थी, वहाँ रफ़ी साहब का सौम्य और सहयोगी स्वभाव उन्हें और विशिष्ट बनाता था। वे गीत को अपनी व्यक्तिगत उपलब्धि से अधिक संगीत की सामूहिक साधना मानते थे।
पुरस्कारों से बड़ी थी जनता की मोहब्बत
रफ़ी साहब को अनेक प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया। उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया और राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला। लेकिन शायद उनका सबसे बड़ा पुरस्कार वह प्रेम था, जो जनता ने उन्हें दिया।
आज भी जब रेडियो पर रफ़ी साहब की आवाज़ गूंजती है, तो श्रोता अपनी पुरानी यादों में लौट जाते हैं और नई पीढ़ी उस आवाज़ में कुछ ऐसा खोज लेती है, जो आज के समय में भी उतना ही प्रासंगिक है।
यह किसी कलाकार की वास्तविक अमरता है।
31 जुलाई 1980 : एक आवाज़ खामोश हुई, संगीत नहीं
31 जुलाई 1980 को मोहम्मद रफ़ी इस दुनिया से विदा हो गए। उस दिन भारतीय संगीत जगत ने अपने महानतम स्वरों में से एक को खो दिया। लेकिन उनकी आवाज़ कभी खामोश नहीं हुई।
किसी पुराने रेडियो से आती उनकी आवाज़, किसी संगीत समारोह में गाया गया उनका गीत, किसी फिल्म का पुनर्प्रसारण या किसी युवा गायक की प्रस्तुति—हर बार रफ़ी साहब फिर हमारे बीच लौट आते हैं।
समय शरीर को हमसे छीन सकता है, लेकिन सच्ची कला को नहीं।
नई पीढ़ी के लिए रफ़ी एक पाठशाला
आज संगीत की दुनिया तकनीक के अत्याधुनिक दौर में प्रवेश कर चुकी है। डिजिटल रिकॉर्डिंग और आधुनिक तकनीक ने गायन के स्वरूप को बदल दिया है। फिर भी रफ़ी साहब की प्रासंगिकता कम नहीं हुई।
क्योंकि तकनीक आवाज़ को सुंदर बना सकती है, लेकिन भावना पैदा नहीं कर सकती। सुरों को व्यवस्थित किया जा सकता है, मगर आत्मा नहीं जोड़ी जा सकती। रफ़ी साहब की आवाज़ की सबसे बड़ी शक्ति उसकी आत्मीयता थी।
उनके गीत सिखाते हैं कि महान गायकी केवल ऊँचे सुर लगाने का नाम नहीं, बल्कि शब्दों के पीछे छिपी भावना को समझकर उसे श्रोता के हृदय तक पहुँचाने की कला है।
रफ़ी : एक नाम, अनेक भाव
रफ़ी साहब को किसी एक श्रेणी में बाँधना उनके विराट व्यक्तित्व के साथ अन्याय होगा। वे रोमांस के गायक थे, तो भक्ति के भी; वे दर्द के स्वर थे, तो हास्य के भी; वे देशभक्ति की आवाज़ थे, तो दोस्ती और जिंदगी की मस्ती के भी।
उनकी आवाज़ ने प्रेमी को प्रेम की भाषा दी, विरही को अपने दर्द का साथी दिया, भक्त को आस्था का स्वर दिया और देशभक्त को उत्साह का गीत।
शायद इसीलिए रफ़ी साहब केवल गायक नहीं थे। वे भारतीय जनमानस की भावनाओं के स्वर-चित्रकार थे।
अमरता की अपनी एक धुन होती है
महान कलाकार चले जाते हैं, लेकिन उनकी कला उनके बाद भी जीवित रहती है। मोहम्मद रफ़ी की अमरता का रहस्य यही है कि उन्होंने केवल गीत नहीं गाए, उन्होंने उन्हें जिया।
उनकी आवाज़ में भारत की मिट्टी की खुशबू है, भारतीय संस्कृति की आत्मीयता है और मानवीय भावनाओं की वह सार्वभौमिक भाषा है, जिसे समझने के लिए किसी शब्दकोश की आवश्यकता नहीं।
आज रफ़ी साहब हमारे बीच भौतिक रूप से नहीं हैं, लेकिन जब उनकी आवाज़ किसी पुराने गीत के साथ गूंजती है, तो लगता है जैसे समय कुछ क्षणों के लिए ठहर गया हो और सुरों का वह फ़कीर फिर हमारे सामने बैठा अपनी आत्मा से गा रहा हो।
मोहम्मद रफ़ी इसलिए अमर हैं क्योंकि उनकी आवाज़ कानों से होकर सीधे दिल तक जाती है—और दिल में बसे स्वर कभी मरते नहीं।





