सियाहीं फेंककर विचारों को रोकने की आपराधिक मानसिकता

The criminal mindset of stifling ideas by throwing ink

नरेंद्र तिवारी

झारखण्ड मे आइसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा वोरा पर स्याही फेंके जाने की सर्वत्र निंदा हो रही हैं। स्याही फेंकने का यह कृत्य बिना किसी तर्क वितर्क के निंदनीय हैं, इस कृत्य का समर्थन नहीं किया जा सकता यह एक प्रकार की हिंसा हैं जो कुंठित और तानाशाही प्रवृत्ती के विचारों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस तानाशाही, हिंसक, अप्रजातांत्रिक तथा आपराधिक विचार का समाज मे कोई स्थान नहीं हैं। स्याही लिखने और विचारों के प्रदर्शन की सामग्री हैं, किन्तु इसका इस्तेमाल विचारों को दबाने के लिए किया जाना उचित नहीं है। देश मे स्याही फेंकने की यह एकमात्र घटना नई नहीं हैं। इससे पूर्व भी स्वतंत्र विचारों को रोकने के लिए इस हथकंडे का इस्तेमाल किया जा चूका हैं। अभी काकरोच जनता पार्टी के संस्थापक दीपक डिमके पर जयपुर भी ऐसी ही घटना को अंजाम दिया गया।

लोकतंत्र मे विचार व्यक्त करने की स्वतन्त्रता हैं, इसे बाधित नहीं किया जा सकता स्याही फेंकने वाले आपराधिक तत्व और इसके समर्थक विरोधी विचार को दबाने के लिए इस अलोकतांत्रिक अपराध का इस्तेमाल करते हैं।

लोकतंत्र में विचारों का मुकाबला सिर्फ विचार से ही किया जाता हैं, राजनैतिक दल उसके नेता और समर्थक अपने विचारों को व्यक्त करते हैं। क्या अपने विरोधी विचार पर स्याही फेंककर उसे विचार व्यक्त करने से रोका जा सकता हैं, कतई नहीं, इस प्रकार की घटना एक प्रकार की शारारिक हिंसा हैं।

भारत का संविधान अपने नागरिकों को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का मौलिक अधिकार देता हैं जिसका अर्थ हैं बोलकर, लिखकर, छपाई या चित्रों के माध्यम से स्वतंत्र रूप से विचार प्रकट करना। किन्तु संविधान की किसी धारा में स्याही फेंककर विचारों को रोकने या बाधित करने का कोई जिक्र नहीं हैं। इसका सीधा अर्थ हैं। लोकतंत्र में इसका कोई स्थान नहीं हैं ऐसा करना लोकतंत्र के खिलाफ हैं।
विचार व्यक्त करने की इस स्वतन्त्रता पर दुनियां के राजनैतिक विद्वानो ने अपने विचार व्यक्त किये हैं जान स्टूअर्ट मिल अपनी किताब आन लिबर्टी में लिखते हैं ‘विचारो पर कभी रोक नहीं लगानी चाहिए। यदि कोई गलत विचार भी है, तो उसे बोलने की छूट होनी चाहिए, क्योंकि खुलकर चर्चा करने से ही सत्य सामने आता है और उसकी सच्चाई पुष्ट होती है।’

सीधा अर्थ है विचार व्यक्त होने के उपरांत ही समझे जा सकते है, किन्तु उसे रोका नहीं जाना चाहिए फिर उस विचार से असहमति क्यों न हो। विचार व्यक्त करने की स्वतन्त्रता के पक्ष में विद्वान् बेंजामीन फ्रेंकलिन लिखते है ‘विचारो की स्वतन्त्रता के बिना किसी भी तरह का ज्ञान सम्भव नहीं है और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के बिना समाज में वास्तविक सार्वजनिक स्वतन्त्रता नहीं हो सकती है।’ इसी बात को जान मिलटन कुछ इस अंदाज में व्यक्त करते है उनके अनुसार सत्य और असत्य को खुले मैदान लड़ने देना चाहिए। सत्य कभी भी खुली बहस या मुकाबल में हारता नहीं है।

विचार व्यक्त करने की स्वतन्त्रता के बारे में जो इन विचारकों ने लिखा है। स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माताओं ने इसे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) में शामिल करते हुए अपने नागरिको को यह स्वतन्त्रता उपलब्ध कराई है।

विचारों पर असहमति हो सकती है, किन्तु असहमति का निराकरण श्रेष्ठ विचार से होना चाहिए न किसी हिंसक विचार से किया जाना चाहिए।
भारत में सांस्कृतिक एवं राजनैतिक विविधता व्याप्त है, इन विविधताओं और भिन्नताओं के उपरांत भी देश के संविधान में उल्लेखित विचारों का समान रूप से सम्मान करने की भावना आमजन में मौजूद है। देश के नागरिक संविधान के विरुद्ध आचरण को बर्दास्त नहीं करता है। अभी ज़ब अपने विचारों के विपरीत विचार रखने वालो को आसानी से देशद्रोही या राष्ट्रद्रोही कह देने का फैशन व्याप्त है,यह स्वतंत्र लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। संविधान के प्रावधानो के तहत अपने विचारों का प्रगटीकरण करना लोकतंत्र के विचार को मजबूत करने का प्रयत्न है। इन विचारों को स्याही फेंककर रोकने का प्रयास नहीं किया जा सकता है।

नेहा वोरा प्रखर विचारक है, किसी की उनके विचार से असहमति हो सकती है, किन्तु इस प्रखर विद्वान् छात्रा पर स्याही फेंकने वाले छात्र ने जो अप्रजातांत्रिक, आपराधिक कार्य किया है, भारत का संविधान इस कृत्य का समर्थन नहीं करता है। यह बेहद निंदनीय और कायराना हरकत है। नेहा वोरा पर स्याही फेकने की घटना के बाद सोशल मिडिया पर उनके पक्ष में और कायराना हरकत के खिलाफ युवा शायर की पंक्तिया बेहद सही प्रतीत हुई उन्होंने लिखा-

‘नया तो कुछ नहीं जो कर रहे है, वो अक्सर खेल ऐसे खेलते, है अंधेरों की वकालत करने वाले उजालो पर सियाही फेंकते है।,नेहा वोरा अपने ऊपर सियाहीं फेकने की घटना से भयभीत नहीं हुई उन्होंने बड़ी मुखरता से इस घटना का जवाब दिया। एक मुखर छात्रा पर फ़ेंकी गयी सियाही नेहा को निखार गयी, किन्तु विचारों की स्वतन्त्रता को बाधित करने वाले विचार का मुंह भी काला कर गयी।