तिरंगा राष्ट्र की आन, बान और शान

The Tricolour is the pride, honour, and glory of the nation

‘हर घर तिरंगा’ केवल अभियान नहीं,स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान से नई पीढ़ी को जोड़ने वाला राष्ट्रप्रेम का जनआंदोलन

विनोद सिंह ‘तकियावाला’

तिरंगा केवल तीन रंगों से बना राष्ट्रीय ध्वज नहीं है। तिरंगा भारत की आत्मा है,भारत के स्वाभिमान का प्रतीक है और करोड़ों भारतीयों की भावनाओं का जीवंत प्रतिबिंब है।इसके प्रत्येक रंग में भारत की एक कहानी है,प्रत्येक लहर में स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति है और प्रत्येक धड़कन में उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों का बलिदान समाया हुआ है, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।तिरंगा जब आकाश में लहराता है तो उसके साथ केवल तीन रंग नहीं लहराते,बल्कि भारत का गौरव लहराता है।शहीदों की स्मृतियां लहराती हैं। स्वतंत्रता सेनानियों का त्याग लहराता है।देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता का संकल्प लहराता है।

स्वतंत्रता दिवस के पावन अवसर पर केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत ने ‘हर घर तिरंगा’ अभियान की इसी व्यापक भावना को सामने रखते हुए कहा कि “तिरंगा राष्ट्र की आन, बान और शान है। प्रत्येक भारतीय की पहचान है।” यह केवल एक वाक्य नहीं,बल्कि उस राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति है,जिसने भारत को गुलामी की लंबी रात से निकालकर स्वतंत्रता के उजाले तक पहुंचाया।मंत्री ने स्पष्ट किया कि ‘हर घर तिरंगा’ को केवल सरकारी कार्यक्रम के रूप में देखने की आवश्यकता नहीं है।यह राष्ट्रप्रेम को जनभागीदारी में बदलने वाला अभियान है।उन्होंने देशवासियों से अपने घर, संस्थान और कार्यस्थल पर सम्मानपूर्वक तिरंगा फहराने तथा अभियान में सहभागी बनने का आह्वान किया। उनके संबोधन में राष्ट्रध्वज केवल एक प्रतीक नहीं,बल्कि भारत की एकता,अखंडता और लोकतांत्रिक मूल्यों को जोड़ने वाली वह शक्ति बनकर सामने आया,जिसके नीचे हर भारतीय अपनी पहचान पाता है।यही इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता है कि तिरंगा सरकार की इमारतों से निकलकर आम नागरिक के घर तक पहुंच रहा है। गांव की पगडंडी से लेकर महानगरों की ऊंची इमारतों तक, विद्यालय से लेकर विश्वविद्यालय तक और बाजार से लेकर रेलवे स्टेशन तक तिरंगा भारत की साझा पहचान का संदेश दे रहा है।‘हर घर तिरंगा’ की इस भावना को समझने के लिए हमें उस इतिहास की ओर लौटना होगा, जिसकी कीमत हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने रक्त से चुकाई थी।भारत की आजादी कोई उपहार नहीं थी। यह संघर्ष से प्राप्त हुई थी। भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव ने हंसते हुए फांसी का फंदा चूमा। चंद्रशेखर आजाद ने अंतिम सांस तक अंग्रेजी सत्ता के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खां ने देश के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के माध्यम से स्वतंत्रता की लौ को नया स्वर दिया।महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को स्वतंत्रता संघर्ष का हथियार बनाया। सरदार पटेल ने देशी रियासतों के एकीकरण के माध्यम से अखंड भारत की मजबूत नींव रखी।इनके अतिरिक्त हजारों ऐसे स्वतंत्रता सेनानी रहे जिनके नाम इतिहास के बड़े पन्नों में शायद पर्याप्त स्थान नहीं पा सके, लेकिन उनके त्याग के बिना स्वतंत्रता की गाथा अधूरी रहती।

आज जब हम तिरंगा फहराते हैं तो उन सभी को स्मरण करना हमारा राष्ट्रीय दायित्व है। गजेंद्र सिंह शेखावत ने राष्ट्रप्रेम की इसी भावना को जनभागीदारी से जोड़ते हुए वंदे मातरम् के सामूहिक गायन का भी उल्लेख किया। ‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं है।स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में इस गीत ने भारतीयों के भीतर राष्ट्रीय चेतना का संचार किया था। इसके स्वर में मातृभूमि के प्रति समर्पण था, स्वाधीनता की आकांक्षा थी और विदेशी शासन के विरुद्ध आत्मविश्वास था।जब आज स्वतंत्र भारत में ‘वंदे मातरम्’ के स्वर तिरंगे के साथ गूंजते हैं तो वर्तमान और अतीत के बीच एक भावनात्मक सेतु बनता है। एक ओर हमारे सामने स्वतंत्र भारत की उपलब्धियां होती हैं, दूसरी ओर उन वीरों की स्मृति होती है जिनके कारण यह स्वतंत्रता संभव हुई।इसीलिए तिरंगे के साथ वंदे मातरम् का सामूहिक गायन केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं,बल्कि राष्ट्र की सामूहिक स्मृति को जीवित रखने का माध्यम है।

‘हर घर तिरंगा’ अभियान ने पिछले वर्षों में जिस प्रकार जनभागीदारी हासिल की है,वह भी उल्लेखनीय है।आधिकारिक जानकारी के अनुसार अभियान के दौरान पांच लाख से अधिक युवाओं ने स्वयंसेवक के रूप में पंजीकरण कराया था।बाद में अभियान की व्यापकता और बढ़ी तथा नौ लाख से अधिक स्वयंसेवकों की भागीदारी दर्ज की गई। तिरंगे के साथ करोड़ों सेल्फी अपलोड की गईं और देशभर में विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से नागरिकों को अभियान से जोड़ा गया।तिरंगा सेल्फी का विचार देखने में भले ही आधुनिक डिजिटल अभिव्यक्ति लगे, लेकिन इसके पीछे भावना वही पुरानी है-मैं भारतीय हूं और मुझे अपने राष्ट्र पर गर्व है। आज का युवा जिस भाषा में संवाद करता है,उसी भाषा में यदि राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति करता है तो उसे भी राष्ट्रीय चेतना की नई अभिव्यक्ति के रूप में देखना चाहिए। मंत्री ने तिरंगे के साथ सेल्फी को लेकर भी नागरिकों को प्रोत्साहित करने की बात कही। यह सेल्फी केवल कैमरे में कैद एक तस्वीर नहीं होनी चाहिए। इसके पीछे उस भावना का होना जरूरी है कि तिरंगा मेरे लिए क्या मायने रखता है।यदि एक युवा तिरंगे के साथ तस्वीर खिंचवाते हुए भगत सिंह,नेताजी,गाँधी,आजाद और उन असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों को याद करता है, तो वह तस्वीर राष्ट्र के इतिहास से उसके जुड़ाव का दस्तावेज बन जाती है।प्रेस वार्त्ता में मंत्री द्वारा सियालदह रेलवे स्टेशन पर विभाजन-विभीषिका की स्मृति को स्थायी रूप से संजोने के लिए स्मारक की बात भी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।भारत का विभाजन केवल राजनीतिक सीमाओं के खिंच जाने की घटना नहीं था। वह करोड़ों लोगों के विस्थापन, पीड़ा, बिछड़ने और असहनीय मानवीय त्रासदी का अध्याय था।लाखों परिवारों ने अपने घर छोड़े,अपने प्रियजनों को खोया और अनिश्चित भविष्य की ओर पलायन किया।
सियालदह रेलवे स्टेशन जैसे स्थान उस त्रासदी की जीवंत स्मृतियों से जुड़े रहे हैं। विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल से आने वाले बड़ी संख्या में विस्थापित लोगों के लिए रेलवे स्टेशन जीवन और संघर्ष के बीच एक महत्वपूर्ण पड़ाव बने।ऐसे स्थान पर विभाजन-विभीषिका की स्मृति को स्मारक के रूप में संरक्षित करने का विचार आने वाली पीढ़ियों को यह समझाने का माध्यम बन सकता है कि इतिहास केवल तारीखों और घटनाओं का संग्रह नहीं होता, बल्कि उसमें मनुष्य की पीड़ा, संघर्ष और पुनर्निर्माण की कहानी भी होती है।स्मारक इतिहास को जिंदा रखते हैं।वे आने वाली पीढ़ियों से कहते हैं कि अतीत को भूलना नहीं चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर भविष्य को बेहतर बनाना चाहिए। विभाजन की पीड़ा को स्मरण करना किसी के प्रति वैमनस्य पैदा करना नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के प्रति श्रद्धांजलि है जिन्होंने उस त्रासदी को झेला।
तिरंगा और विभाजन-विभीषिका की स्मृति,पहली दृष्टि में दो अलग-अलग विषय लग सकते हैं, लेकिन वास्तव में दोनों भारत की राष्ट्रीय चेतना के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं।एक ओर तिरंगा हमें स्वतंत्रता, एकता और राष्ट्रीय गौरव की याद दिलाता है,दूसरी ओर विभाजन की स्मृति हमें यह चेतावनी देती है कि सामाजिक सद्भाव, राष्ट्रीय एकता और आपसी विश्वास को कभी कमजोर नहीं होने देना चाहिए।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में एकता है।भाषा अलग हो सकती है,वेशभूषा अलग हो सकती है,खान-पान अलग हो सकता है,पूजा-पद्धतियाँ अलग हो सकती हैं, लेकिन तिरंगा सबको एक सूत्र में बांधता है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक और कच्छ से अरुणाचल तक जब तिरंगा एक साथ लहराता है तो भारत की विराट एकता दिखाई देती है।राष्ट्रप्रेम केवल नारों में नहीं होता। राष्ट्रप्रेम हमारे आचरण में दिखाई देना चाहिए। ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वहन करना राष्ट्रप्रेम है। सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना राष्ट्रप्रेम है।स्वच्छता को अपनाना राष्ट्रप्रेम है।पर्यावरण की रक्षा करना राष्ट्रप्रेम है।समाज में भाईचारा बनाए रखना राष्ट्रप्रेम है। संविधान और कानून का सम्मान करना राष्ट्रप्रेम है।तिरंगे के तीन रंग भी हमें यही संदेश देते हैं। केसरिया त्याग और साहस की प्रेरणा देता है।श्वेत सत्य,शांति और सद्भाव का प्रतीक है।हरा रंग जीवन,समृद्धि और विकास की आशा जगाता है।मध्य में स्थित अशोक चक्र निरंतर गतिशील रहने और आगे बढ़ते रहने का संदेश देता है।इस दृष्टि से ‘हर घर तिरंगा’ केवल स्वतंत्रता दिवस का आयोजन नहीं है।यह राष्ट्र के प्रति हमारे दायित्वों का स्मरण कराने वाला अभियान है।आजादी के बाद जन्मी पीढ़ी ने गुलामी नहीं देखी। उसके लिए स्वतंत्रता स्वाभाविक अधिकार है। इसलिए उसे यह बताना और भी आवश्यक है कि स्वतंत्रता कितने संघर्ष और बलिदान के बाद मिली।जब कोई बच्चा अपने घर की छत पर तिरंगा फहराता है, जब वह ‘वंदे मातरम्’ गाता है, जब वह तिरंगे के साथ सेल्फी लेता है या जब वह किसी स्वतंत्रता सेनानी की कहानी पढ़ता है,तब वह अनजाने में अपने इतिहास से जुड़ रहा होता है।यही ‘हर घर तिरंगा’ की सबसे बड़ी उपलब्धि है।यह अभियान इतिहास को संग्रहालयों से निकालकर घरों तक पहुंचाता है।यह राष्ट्रप्रेम को भाषणों से निकालकर जनभागीदारी में बदलता है।यह नई पीढ़ी को बताता है कि स्वतंत्रता केवल अधिकार नहीं, जिम्मेदारी भी है।आज भारत विकास की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है।विज्ञान,तकनीक,अंतरिक्ष,रक्षा, अर्थव्यवस्था और बुनियादी ढांचे में देश की उपलब्धियां दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रही हैं।ऐसे समय में तिरंगा हमें हमारे अतीत और भविष्य दोनों की याद दिलाता है।जिस भारत के लिए स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना जीवन दिया, उस भारत को मजबूत बनाना आज हमारी जिम्मेदारी है।हर नागरिक अपने स्तर पर देश के निर्माण में योगदान दे सकता है।स्वतंत्रता दिवस इसलिए केवल उत्सव का दिन नहीं,आत्ममंथन का भी दिन है।हमें यह देखना होगा कि क्या हमारे भीतर वह राष्ट्रभाव है, जिसके लिए हमारे पूर्वजों ने बलिदान दिया था।क्या हम अपनी विविधताओं के बावजूद एक-दूसरे के सम्मान और विश्वास को मजबूत कर रहे हैं? क्या हम अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी उतनी ही गंभीरता से स्वीकार कर रहे हैं?जब इन प्रश्नों का उत्तर हमारे आचरण में मिलेगा,तभी तिरंगा वास्तव में हमारे जीवन का हिस्सा बनेगा।‘हर घर तिरंगा’ का अंतिम लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि देश के हर घर की छत पर तिरंगा दिखाई दे।वास्तविक लक्ष्य यह होना चाहिए कि हर घर में राष्ट्रप्रेम की भावना हो, हर मन में भारत के प्रति गर्व हो और हर नागरिक के कर्म में राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी दिखाई दे।तिरंगा जब हवा में लहराता है तो उसके साथ भारत का गौरव लहराता है।उसके साथ स्वतंत्रता सेनानियों की स्मृतियां लहराती हैं।उसके साथ उन माताओं की आंखों के आंसू भी दिखाई देते हैं जिन्होंने राष्ट्र के लिए अपने लाल खोए। उसके साथ उन करोड़ों भारतीयों का सपना लहराता है जिन्होंने स्वतंत्र भारत के निर्माण की कल्पना की थी।वंदे मातरम् के स्वर जब तिरंगे के साथ गूंजते हैं तो मातृभूमि के प्रति समर्पण की वही भावना फिर जाग उठती है।तिरंगे के साथ ली गई एक सेल्फी जब इतिहास की स्मृति से जुड़ती है तो वह केवल तस्वीर नहीं रहती,बल्कि राष्ट्रप्रेम की अभिव्यक्ति बन जाती है। सियालदह जैसे स्थानों पर विभाजन-विभीषिका की स्मृति जब स्मारक के रूप में संरक्षित होती है तो वह आने वाली पीढ़ियों को इतिहास से सीखने का अवसर देती है।यही भारत है -बलिदान की स्मृति,स्वतंत्रता का गौरव,विविधता में एकता और भविष्य के निर्माण का संकल्प।
इसलिए तिरंगा केवल राष्ट्र की आन नहीं,तिरंगा राष्ट्र की बान है, तिरंगा राष्ट्र की शान है और सबसे बढ़कर -तिरंगा प्रत्येक भारतीय की पहचान है।