महिला, ब्राह्मण, ओबीसी, दलित व मुसलमान वोटरों को रिझाने के लिए चला संगठनात्मक नियुक्ति कार्ड!
दीपक कुमार त्यागी
“कांग्रेस की संगठनात्मक नियुक्तियों को देखकर के लगता है कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा के चुनाव में कांग्रेस महिला कार्ड के साथ-साथ अब ब्राह्मण, ओबीसी, दलित व मुसलमान को संगठन में तरजीह देकर के अपने पक्ष में इन सभी वर्गों के अधिक से अधिक से मतदाताओं की गोलबंदी कर लेना चाहती है। हालांकि यूपी में कांग्रेस की धरातल की स्थिति और पुराने इतिहास को देखें तो कांग्रेस के हाईकमान को यह भी अवश्य ध्यान रखना चाहिए कि यूपी में संगठन की नियुक्तियों में जातिगत व धार्मिक समीकरणों को साधनें से ही कांग्रेस का परचम एकदम से नहीं लहराने लगेगा, उसके लिए दिन-रात एक करके लड़ेंगे-जीतेंगे के सिद्धांत पर अमल करते हुए निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के द्वारा की जा रही दिन-रात की मेहनत को आगे बढ़ाना होगा, तब ही भविष्य में कांग्रेस के प्रदर्शन में कुछ सुधार होने की संभावना है।”
उत्तर प्रदेश में आगामी वर्ष 2027 में विधानसभा के चुनाव होने हैं, जिसके लिए प्रदेश की राजनीति में दखल रखने वाले सभी राजनीतिक दल अपनी-अपनी तैयारियों में जुट गये हैं, सभी दल अपने संगठन को चुस्त-दुरुस्त करते हुए धरातल पर अपनी-अपनी पार्टियों के पक्ष में माहौल बनाने में जुटे हुए हैं। उस कड़ी में कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने भी अभी हाल ही में बेहद ही जोख़िम भरा निर्णय लेते हुए उत्तर प्रदेश में अपने बेहद ही तेजतर्रार, मेहनती व देश व दुनिया में चर्चित प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को हटाकर विधानमंडल दल की नेता विधायक आराधना मिश्रा (मोना) को प्रदेश अध्यक्ष व सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया है। वहीं देवेंद्र निषाद व आलोक प्रसाद को पार्टी ने वरिष्ठ उपाध्यक्ष नियुक्त किया है। पार्टी ने कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता के तौर पर विधायक चौधरी वीरेंद्र सिंह की नियुक्त का दांव खेला है। चुनावी तैयारियों के दौरान इन नियुक्तियों ने देश-प्रदेश के अधिकतर राजनीतिक विश्लेषकों, यहां तक की कांग्रेस पार्टी बहुत सारे कार्यकर्ताओं को भी चौंकाने का कार्य किया है, क्योंकि जिस दमदार ढंग से अजय राय मजबूत विपक्षी नेता की भूमिका का निर्वहन करते भाजपा से लड़ते हुए कांग्रेस पार्टी को दिन-रात खड़ा करने में जुटे हुए थे, धरातल पर बन रही उस स्थिति को देखकर के कोई व्यक्ति भी यह सोच भी नहीं सकता था कि चुनावी वर्ष में कांग्रेस पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अजय राय जैसी लोकप्रिय शख्सियत को हटाने का जोखिम लेने का कार्य कर सकता है।
हालांकि जाति व धर्म के समीकरण के आधार पर बहुत सारे लोगों का यह मत भी है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का यह निर्णय उत्तर प्रदेश में मृतप्राय हो चुकी कांग्रेस पार्टी को संजीवनी देकर के पुनर्जीवित करने वाला एक मास्टरस्ट्रोक भी साबित हो सकता है। सूत्रों के अनुसार टीम राहुल गांधी को तो यह लग रहा है कि यूपी में उनके द्वारा की गयी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के दम पर कांग्रेस फिर से उत्तर प्रदेश के सत्ता के गलियारों में अपनी धमक वापस ला सकती है। वहीं दूसरी तरफ कहीं ना कहीं कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को यह भी लगता है कि उत्तर प्रदेश में पार्टी को खड़ा करने के लिए एक मजबूत गठबंधन की बेहद ही ज्यादा जरूरत है और उस गुणा-भाग में समाजवादी पार्टी से पुराने गंभीर गिले-शिकवे होने के चलते अजय राय किसी भी हाल में फिट नहीं बैठते हैं। इसलिए कांग्रेस ने प्रतापगढ़ की रामपुर खास सीट से लगातार तीसरी बार जीत दर्ज करने वाली लोकप्रिय विधायक आराधना मिश्रा (मोना) के नाम पर अब बहुत बड़ा दांव खेला है, उनकी नियुक्ति के संदर्भ में वैसे देखा जाये तो लंबे समय के बाद उत्तर प्रदेश में कोई खांटी कांग्रेसी नेता प्रदेश अध्यक्ष के पद पर काबिज हुआ है। यहां आपको बता दें कि आराधना मिश्रा (मोना) कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद प्रमोद तिवारी की पुत्री हैं और वह पिता की तरह ही राजनीति के लिए सभी आवश्यक योग्यता और सभी साम-दाम-दंड-भेद की नीतियों में निपुण मानी जाती हैं। कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लगता है कि आराधना मिश्रा (मोना) के माध्यम से पार्टी को महिलाओं व ब्राह्मणों के बीच में पैठ बनाने में भी बेहद मदद मिल सकती है। वहीं अगर आराधना मिश्रा (मोना) को स्वतंत्र रूप से काम करने का अवसर मिला तो वह अपनी मेहनत, व्यवहार कुशलता और प्रमोद तिवारी की लोकप्रियता व संबंधों के दम पर आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी के पक्ष में एक सकारात्मक माहौल धरातल पर बना सकती हैं। वहीं कांग्रेस ने पहले से ही अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम के रूप में दलित चेहरे को यूपी का प्रभारी बना रखा है, वहीं बेहद चर्चित चेहरे सहारनपुर के सांसद इमरान मसूद को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने से मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कांग्रेस की पकड़ कुछ मजबूत होने की उम्मीद है, ऐसी स्थिति में अगर समाजवादी पार्टी व कांग्रेस का गठबंधन होता है तो दोनों दलों को इमरान मसूद की नियुक्ति का लाभ अवश्य मिलेगा। कांग्रेस हाईकमान के इस राजनैतिक दांव को राज्य में एकबार फिर से नए सिरे से पार्टी संगठन को धरातल पर मजबूती देने की रणनीति का बेहद अहम हिस्सा माना जा रहा है। क्योंकि कांग्रेस पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग से परिपूर्ण इस रणनीति का मुख्य मकसद भाजपा, सपा व बसपा के मजबूत वोटबैंक में सेंध लगाते हुए कांग्रेस से छिटके हुए मतदाता को वापस लाना है। हालांकि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की यह रणनीति कितनी सफल होती है, यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन जिस तरह से देश में जाति व धर्म का जहर अपने चरम पर है, कांग्रेस पार्टी के पक्ष में मतदाताओं के बीच दशकों बाद सुगबुगाहट अवश्य होने की उम्मीद है।
वैसे भी जाति-धर्म के समीकरण देखें तो राज्य में लगभग 12% से 14 % ब्राह्मण मतदाता हैं जो 100 से 115 विधानसभा की सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं। यूपी में दलित मतदाताओं की हिस्सेदारी की बात करें तो लगभग 21% से 22% वोट हैं और राज्य की 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं और लगभग 140 से ज्यादा सामान्य (अनारक्षित) सीटों पर भी दलित मतदाताओं का रुख हार-जीत तय करने में अहम है। वहीं राज्य में लगभग 40% के करीब ओबीसी वोटर हैं, जो अकेले दम पर ही लगभग 150 से 180 के करीब सीटों पर प्रत्याशियों की हार जीत तय करने की ताकत रखते हैं। वहीं मुस्लिम वोटर लगभग 18% से 19% हैं जो लगभग 120 से 130 सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं। इसलिए कांग्रेस हाईकमान को उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश में यह नयी संगठनात्मक नियुक्तियां मास्टरस्ट्रोक साबित होंगी और वर्ष 2027 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी को राज्य की राजनीति में एक नई ऊर्जा देने का कार्य अवश्य करेंगी। लेकिन यहां पर हाईकमान को तेजतर्रार प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के हटाने से होने वाले नुकसान के डैमेज कंट्रोल करने का भी ध्यान रखना होगा, इसके लिए अजय राय को बिना किसी देरी के कांग्रेस पार्टी की केंद्रीय टीम में एडजस्ट करके उनका उत्तर प्रदेश में उपयोग करना होगा, तब ही कांग्रेस पार्टी को चुनावी रणभूमि में दशकों के बाद संजीवनी मिल सकती है।





