उपचुनावों में करारी शिकस्त के बाद अब किस पर ठीकरा फोड़ेगी कांग्रेस?

After the crushing defeat in the by-elections, who will Congress blame now?

अशोक भाटिया

भारतीय लोकतंत्र का मिजाज अब पूरी तरह बदल चुका है, लेकिन देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस का चुनावी शिकस्त के बाद का बर्ताव आज भी पुराना और पूरी तरह अनुमानित नजर आता है। हाल ही में अक्टूबर 2026 में संपन्न हुए लोकसभा और विधानसभा उपचुनावों के नतीजों ने एक बार फिर कांग्रेस की सांगठनिक कमजोरियों और वैचारिक खोखलेपन को पूरी तरह उजागर कर दिया है। असम की प्रतिष्ठित नगांव लोकसभा सीट से लेकर पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम और मुस्लिम-बहुल रेजीनगर विधानसभा क्षेत्र, तथा पुदुचेरी की थट्टांचवडी सीट तक—हर तरफ कांग्रेस को करारी और अपमानजनक हार का सामना करना पड़ा है। इस ताजा चुनावी झटके ने राजनीतिक गलियारों में एक गंभीर और बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि लगातार मिल रही इन पराजयों के बाद अब कांग्रेस अपनी नाकामी का ठीकरा किस संवैधानिक संस्था, व्यक्ति या व्यवस्था के सिर पर फोड़ेगी?

कांग्रेस और उसके शीर्ष नेतृत्व का यह इतिहास रहा है कि जब भी चुनावी नतीजे उनके विपरीत आते हैं, वे बिना किसी पुख्ता सबूत के देश की सबसे विश्वसनीय संवैधानिक संस्थाओं पर कीचड़ उछालना शुरू कर देते हैं। इन उपचुनावों के मतदान से ऐन पहले, दिल्ली की सड़कों पर राहुल गांधी और विपक्ष के नेताओं द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर किया गया उग्र प्रदर्शन इसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा था। कांग्रेस ने स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन की आड़ में ‘करोड़ों मतदाताओं के नाम काटे जाने’ और ‘वोट चोरी’ का एक भ्रामक नैरेटिव गढ़ने की पुरजोर कोशिश की, जिसे सुप्रीम कोर्ट के वैधानिक स्पष्टीकरणों और स्वतंत्र जांचों ने पूरी तरह खारिज कर दिया। भारतीय जनता पार्टी का इस पर बेहद कड़ा और तार्किक पक्ष है कि जब कांग्रेस हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक या तेलंगाना में चुनाव जीतती है, तब लोकतांत्रिक प्रक्रिया और निर्वाचन प्रणाली बिल्कुल पवित्र हो जाती है, लेकिन असम के नगांव या बंगाल के रेजीनगर में जनता जब उन्हें नकार देती है, तो वही व्यवस्था ‘कठपुतली’ नजर आने लगती है। यह दोहरा रवैया न केवल देश के करोड़ों मतदाताओं के विवेक का अपमान है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारतीय लोकतंत्र की छवि को धूमिल करने का एक गैर-जिम्मेदाराना प्रयास भी है।

पश्चिम बंगाल की रेजीनगर विधानसभा सीट के चुनावी नतीजे कांग्रेस के पारंपरिक तुष्टिकरण के नैरेटिव पर सबसे बड़ा और सीधा प्रहार हैं। लगभग 70 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले इस निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार शंखराव सरकार ने करीब 75,000 से अधिक वोटों के विशाल अंतर से ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इस सीट पर कांग्रेस दूर-दूर तक मुकाबले में भी नजर नहीं आई। कांग्रेस हमेशा से यह मानकर चलती रही है कि देश का अल्पसंख्यक मतदाता उसका बंधुआ वोट बैंक है, जिसे केवल बहुसंख्यक राष्ट्रवाद का डर दिखाकर हर बार हासिल किया जा सकता है। लेकिन रेजीनगर की समझदार जनता ने यह साबित कर दिया है कि अब देश का हर नागरिक, चाहे वह किसी भी मजहब से ताल्लुक रखता हो, केवल ‘मुफ्त के खोखले वादों’ या ‘डराने की राजनीति’ के बहकावे में आने वाला नहीं है। जनता अब सड़कों के निर्माण, आधुनिक अस्पतालों, बेहतर शिक्षा और औद्योगिक पार्कों जैसे बुनियादी विकास को प्राथमिकता दे रही है। कांग्रेस अपनी इस वैचारिक और रणनीतिक हार को स्वीकार करने के बजाय, इस जनादेश को भी “ध्रुवीकरण का दुष्परिणाम” बताकर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश कर रही है, जो यह दर्शाता है कि पार्टी अभी भी जमीनी हकीकत को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।

जब चुनाव आयोग और ईवीएम पर उठाए गए सवाल जनता के बीच बेअसर साबित होने लगते हैं, तो कांग्रेस अपने तरकश से ‘केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग’ का पुराना तीर निकाल लेती है। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ताओं का यह लगातार आरोप रहता है कि भाजपा सरकार केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो और प्रवर्तन निदेशालय का भय दिखाकर विपक्षी नेताओं को प्रताड़ित करती है और स्वतंत्र रूप से प्रचार नहीं करने देती। लेकिन सच यह है कि ये तमाम जांच एजेंसियां माननीय अदालतों और न्यायपालिका के कड़े निर्देशों तथा प्राथमिक साक्ष्यों के आधार पर ही कानूनी कार्रवाई करती हैं। चुनाव में पराजय मिलने पर इसे जनता का साफ फैसला मानने के बजाय “सत्तारूढ़ दल द्वारा लोकतंत्र के दमन” का परिणाम घोषित कर देना कांग्रेस की आदत बन चुकी है। भाजपा और राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि कांग्रेस लगातार विक्टिम कार्ड खेलकर अपनी आंतरिक कमजोरियों, नेतृत्वहीनता और दिशाहीन नीति को छिपाने का प्रयास करती है, लेकिन देश की जागरूक जनता अब इस राजनीतिक ड्रामे के पीछे की असलियत को बहुत अच्छी तरह समझ चुकी है।

इन उपचुनावों के नतीजों ने न केवल कांग्रेस की सांगठनिक अक्षमता को उजागर किया है, बल्कि विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के भीतर की गहरी दरारों को भी सरेआम कर दिया है। तमिलनाडु में सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कड़गम द्वारा कांग्रेस की रणनीतियों पर सरेआम सवाल उठाना और राहुल गांधी के आंदोलन से खुद को दूर रखना यह साफ करता है कि क्षेत्रीय दल अब कांग्रेस के बोझ को ढोने के मूड में नहीं हैं। पुदुचेरी की थट्टांचवडी सीट पर कांग्रेस की करारी हार ने यह साबित कर दिया है कि दक्षिण भारत में भी उसकी पकड़ लगातार ढीली हो रही है। क्षेत्रीय दलों को अब यह भली-भांति समझ आ गया है कि कांग्रेस के पास न तो कोई स्पष्ट राष्ट्रीय विजन है और ना ही भाजपा के मजबूत विकासवादी नैरेटिव का कोई व्यावहारिक तोड़। शीर्ष स्तर पर खुद को विपक्ष का इकलौता चेहरा साबित करने की राहुल गांधी की होड़ ने गठबंधन के अन्य मजबूत सहयोगियों के भीतर एक गंभीर असुरक्षा और असंतोष की भावना पैदा कर दी है, जिसका सीधा चुनावी नुकसान ज़मीन पर देखने को मिल रहा है।

जब बाहरी बहानों की सारी सीमाएं समाप्त हो जाती हैं, तो कांग्रेस का आंतरिक तंत्र एक विशेष रक्षात्मक मुद्रा अपना लेता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य ‘गांधी परिवार’ के शीर्ष नेतृत्व को किसी भी प्रकार की जवाबदेही से सुरक्षित बचाना होता है। इन उपचुनावों में भी, असम के नगांव में सिबामनी बोरा की करारी हार और बंगाल के नंदीग्राम में मिली शिकस्त के बाद, प्रदेश स्तर के नेताओं की आपसी गुटबाजी, स्थानीय स्तर पर कमजोर प्रबंधन और भीतरघात को मुख्य कारण ठहराया जाने लगा है। प्रादेशिक अध्यक्षों और स्थानीय प्रभारियों पर हार का सारा ठीकरा फोड़कर शीर्ष नेतृत्व को पूरी तरह पाक-साफ घोषित कर दिया जाता है। इस सामंती और दरबारी संस्कृति के कारण पार्टी के भीतर कभी भी ईमानदार और पारदर्शी आत्ममंथन नहीं हो पाता। जब तक पार्टी हार के वास्तविक कारणों—जैसे कार्यकर्ताओं की उपेक्षा, राष्ट्रीय विजन का अभाव और जमीनी मुद्दों से दूरी—पर खुलकर चर्चा नहीं करेगी, तब तक सुधारात्मक कदम उठा पाना पूरी तरह असंभव है।

अक्टूबर 2026 के ये उपचुनाव कांग्रेस के लिए महज एक चुनावी हार नहीं हैं, बल्कि एक गंभीर और निर्णायक चेतावनी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा- एनडीए का ‘विकसित भारत’ का संकल्प, बुनियादी ढांचे का तीव्र विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा की मजबूत नीतियां देश के मतदाताओं के दिलों में गहरा विश्वास पैदा कर चुकी हैं। जनता अब खोखली बयानबाजी, संसद से सड़क तक के ड्रामे और संवैधानिक संस्थाओं पर किए जाने वाले निराधार हमलों से पूरी तरह ऊब चुकी है। कांग्रेस को अब यह समझना ही होगा कि चुनाव सोशल मीडिया के नैरेटिव या विदेशी दौरों पर दिए गए बयानों से नहीं, बल्कि देश के आम नागरिकों के सुख-दुख में उनके साथ खड़े होने और जमीनी स्तर पर कड़ा संघर्ष करने से जीते जाते हैं। अगर कांग्रेस अब भी अपनी हर वैधानिक हार का ठीकरा चुनाव आयोग, ईवीएम, केंद्रीय एजेंसियों या परिस्थितियों पर फोड़ती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब भारतीय राजनीति के मुख्य पटल से उसका अस्तित्व पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएगा। समय की मांग है कि कांग्रेस बहानों की राजनीति को छोड़कर एक जिम्मेदार और रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाना सीखे।