क्या चीन हिंद महासागर में भारत के लिए बन रहा चुनौती ?

Is China emerging as a challenge for India in the Indian Ocean?

अजेश कुमार

चीन जिस तेजी से अपनी नौसैनिक क्षमता का विस्तार कर रहा है, उसका असर केवल पश्चिमी प्रशांत तक सीमित रहने वाला नहीं है।

विमानवाहक पोतों की बढ़ती संख्या, आधुनिक लड़ाकू विमानों की तैनाती और समुद्री अभियानों के लिए विकसित की जा रही नई तकनीक यह संकेत देती है कि बीजिंग अपनी नौसेना को लंबी दूरी तक प्रभावी ढंग से संचालित करने की क्षमता देना चाहता है। लेकिन चीन की मौजूदा तैयारी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उसके जहाजों की संख्या नहीं, बल्कि उन्हें संचालित करने वाले मानव संसाधन पर बढ़ता जोर है। कैरियर पायलटों की भर्ती और प्रशिक्षण की उसकी नीति इसी बड़े बदलाव की ओर इशारा करती है। सवाल इसलिए यह नहीं है कि चीन के पास कितने विमानवाहक पोत हैं, बल्कि यह है कि वह इन पोतों को कितने प्रभावी और कितने लंबे समय तक ऑपरेशनल रख सकता है। अगर चीन इस क्षमता को हासिल कर लेता है, तो हिंद महासागर में भारत के सामने चुनौती निश्चित रूप से अधिक जटिल हो सकती है।

विमानवाहक पोत किसी देश की नौसैनिक शक्ति का सबसे दिखाई देने वाला प्रतीक जरूर है, लेकिन उसकी वास्तविक क्षमता उसके डेक पर खड़े जहाज या विमान से कहीं आगे जाती है। एक कैरियर को प्रभावी युद्धक मंच बनाने के लिए प्रशिक्षित पायलट, तकनीकी कर्मचारी, डेक क्रू, कमांडर, प्रशिक्षक, रखरखाव व्यवस्था और मजबूत लॉजिस्टिक नेटवर्क की जरूरत होती है। इसके अलावा पायलटों की ऐसी संख्या भी चाहिए, जो केवल नियमित उड़ानों के लिए नहीं, बल्कि प्रशिक्षण, आराम, आपात स्थिति और लगातार ऑपरेशन के दौरान रोटेशन की जरूरत पूरी कर सके। चीन अब इसी व्यापक जरूरत को समझते हुए अपनी तैयारी को केवल जहाज और विमान बनाने तक सीमित नहीं रख रहा है।

यही कारण है कि कैरियर पायलटों की भर्ती उसके नौसैनिक विस्तार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। शुरुआती दौर में चीन को सीमित संख्या में अनुभवी नौसैनिक पायलटों के सहारे विमानवाहक पोत संचालन की क्षमता विकसित करनी पड़ी थी। लेकिन यह मॉडल बड़े बेड़े के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता था। अब वह एक ऐसी व्यवस्था बनाने की कोशिश कर रहा है, जिसमें अनुभवी पायलटों के साथ-साथ युवाओं को भी शुरुआती स्तर से कैरियर एविएशन के लिए तैयार किया जाए। हाईस्कूल स्तर के युवाओं, नौसैनिक विमानन संस्थानों के छात्रों, विज्ञान और इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों तथा अन्य सैन्य और नागरिक स्रोतों से प्रतिभाओं की तलाश इसी रणनीति का हिस्सा है।

यह बदलाव भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे चीन की महत्वाकांक्षा की दिशा स्पष्ट होती है। अगर किसी देश को केवल प्रतीकात्मक नौसैनिक शक्ति दिखानी हो तो वह कुछ बड़े जहाज और आधुनिक विमान हासिल करके भी ऐसा कर सकता है। लेकिन बड़े पैमाने पर पायलटों की भर्ती और प्रशिक्षण पर निवेश तभी किया जाता है, जब भविष्य में उस क्षमता को लगातार इस्तेमाल करने की योजना हो। चीन का मौजूदा प्रयास बताता है कि वह विमानवाहक पोतों को अपनी नौसैनिक शक्ति का स्थायी और नियमित हिस्सा बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

भारत के लिए असली चुनौती यहीं से शुरू होती है। चीन की नौसैनिक ताकत का बढ़ना अपने आप में भारत के लिए तत्काल खतरा नहीं है, लेकिन उसकी समुद्री पहुंच, ऑपरेशनल अनुभव और लंबे समय तक दूर समुद्री क्षेत्रों में मौजूद रहने की क्षमता बढ़ती है तो रणनीतिक संतुलन पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। हिंद महासागर भारत की भौगोलिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं का क्षेत्र है। यहां किसी बाहरी शक्ति की बढ़ती समुद्री सक्रियता को केवल जहाजों की आवाजाही के रूप में नहीं देखा जा सकता। यदि चीन भविष्य में विमानवाहक पोतों को पश्चिमी प्रशांत से आगे नियमित रूप से संचालित करने की क्षमता हासिल करता है, तो भारत को अपनी समुद्री निगरानी, वायु शक्ति और लॉजिस्टिक तैयारियों को उसी अनुपात में मजबूत करना होगा।

हालांकि इस चुनौती को बढ़ा-चढ़ाकर देखने की भी जरूरत नहीं है। हिंद महासागर में प्रभावी कैरियर ऑपरेशन करना पश्चिमी प्रशांत में ऑपरेशन करने से अलग चुनौती है। दूरी बढ़ने के साथ ईंधन, रखरखाव, स्पेयर पार्ट, हथियार, संचार और खुफिया सहायता की जरूरत भी बढ़ती है। किसी विमानवाहक पोत को एक क्षेत्र में भेज देना आसान है, लेकिन उसे महीनों तक प्रभावी स्थिति में बनाए रखना अलग बात है। इसलिए चीन के लिए पायलटों की तैयारी जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उसकी दूर समुद्री लॉजिस्टिक क्षमता भी होगी। भारत को इसी पूरी तस्वीर को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बनानी चाहिए।

भारत की पहली प्राथमिकता मानव संसाधन होनी चाहिए। नौसेना के पास विमानवाहक पोत संचालन का लंबा अनुभव है और यह भारत की बड़ी ताकत है। लेकिन किसी भी सैन्य बढ़त को स्थायी नहीं माना जा सकता। तकनीक बदलती है, जहाज बदलते हैं और युद्ध की प्रकृति बदलती है। इसलिए भारत को पर्याप्त संख्या में कैरियर पायलट तैयार करने के साथ प्रशिक्षकों और तकनीकी विशेषज्ञों की भी मजबूत श्रृंखला बनानी होगी। यदि जहाज और विमान उपलब्ध हों लेकिन उन्हें संचालित करने वाले प्रशिक्षित लोग पर्याप्त संख्या में न हों, तो महंगी सैन्य परिसंपत्तियां अपनी पूरी क्षमता हासिल नहीं कर पाएंगी।

दूसरी जरूरत प्रशिक्षण ढांचे के विस्तार की है। कैरियर एविएशन का प्रशिक्षण सामान्य सैन्य विमानन से कहीं अधिक जटिल होता है। समुद्र के बीच सीमित स्थान वाले डेक पर विमान उतारना और उड़ाना अत्यधिक कौशल और निरंतर अभ्यास की मांग करता है। इसलिए भारत को सिम्युलेटर, जमीन आधारित कैरियर ट्रेनिंग सुविधाओं और प्रशिक्षण विमानों की उपलब्धता बढ़ानी होगी। हर अभ्यास के लिए वास्तविक विमानवाहक पोत का इस्तेमाल न करना पड़े, इसके लिए जमीन पर अधिक उन्नत प्रशिक्षण ढांचा विकसित किया जा सकता है। इससे पायलटों को शुरुआती स्तर पर अधिक अभ्यास मिलेगा और वास्तविक कैरियर ऑपरेशन का समय अधिक महत्वपूर्ण प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।

भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण चुनौती कैरियर-आधारित लड़ाकू विमानों की पर्याप्त उपलब्धता है। विमानवाहक पोत और उसके लड़ाकू विमान को अलग-अलग परियोजनाओं की तरह देखने की प्रवृत्ति रणनीतिक रूप से नुकसानदेह हो सकती है। पोत की क्षमता तभी पूरी होगी, जब उसके पास पर्याप्त संख्या में विश्वसनीय और ऑपरेशनल विमान हों। इसके लिए विमान की खरीद, रखरखाव, स्पेयर पार्ट और पायलट प्रशिक्षण को एक ही दीर्घकालिक योजना का हिस्सा बनाना होगा। केवल नए प्लेटफॉर्म खरीदना पर्याप्त नहीं होगा; उनकी उपलब्धता और लगातार इस्तेमाल की क्षमता अधिक महत्वपूर्ण होगी।

तीसरा बड़ा क्षेत्र तकनीकी कर्मचारियों और डेक क्रू का है। कैरियर ऑपरेशन में पायलट जितने महत्वपूर्ण हैं, उतने ही वे लोग भी हैं जो विमान की तैयारी, रखरखाव, हथियार प्रणाली, ईंधन और डेक ऑपरेशन संभालते हैं। किसी विमानवाहक पोत की युद्धक क्षमता एक टीम की सामूहिक दक्षता पर निर्भर करती है। इसलिए भारत को कैरियर एविएशन के लिए एक ऐसा मानव संसाधन मॉडल तैयार करना चाहिए, जिसमें पायलटों के साथ तकनीकी कर्मचारियों की भी निरंतर भर्ती, विशेषज्ञता और प्रशिक्षण सुनिश्चित हो।

चौथी चुनौती ऑपरेशनल अनुभव की है। आधुनिक सैन्य तकनीक खरीदी जा सकती है, लेकिन युद्धक अनुभव खरीदा नहीं जा सकता। लगातार समुद्री अभ्यास, लंबी दूरी के ऑपरेशन और विभिन्न परिस्थितियों में कैरियर ऑपरेशन का अभ्यास ही वास्तविक क्षमता विकसित करता है। भारत के पास इस क्षेत्र में चीन की तुलना में पुराना अनुभव है, लेकिन इस बढ़त को बनाए रखने के लिए नियमित और बड़े पैमाने पर अभ्यास जरूरी हैं। आने वाले समय में भारत को केवल अपने जलक्षेत्र में ही नहीं, बल्कि हिंद महासागर के व्यापक क्षेत्र में समुद्री ऑपरेशन की क्षमता को मजबूत करना होगा।

इसके साथ ही भारत को समुद्री निगरानी और सूचना क्षमता पर भी विशेष ध्यान देना होगा। चीन की किसी संभावित समुद्री मौजूदगी का जवाब केवल विमानवाहक पोत से नहीं दिया जा सकता। लंबी दूरी के समुद्री निगरानी विमान, ड्रोन, उपग्रह, पनडुब्बियां, युद्धपोत और तटीय निगरानी प्रणालियां मिलकर समुद्री क्षेत्र की वास्तविक तस्वीर तैयार करती हैं। यदि भारत को हिंद महासागर में अपनी बढ़त बनाए रखनी है, तो उसे समुद्र के ऊपर और नीचे दोनों स्तरों पर लगातार निगरानी की क्षमता विकसित करनी होगी। किसी संभावित खतरे का पता जितनी जल्दी लगेगा, प्रतिक्रिया की तैयारी उतनी ही प्रभावी होगी।

भारत को हिंद महासागर में साझेदार देशों के साथ समुद्री सहयोग को भी और मजबूत करना होगा। समुद्री सुरक्षा अब किसी एक देश की क्षमता का विषय नहीं रह गई है। सूचना साझा करना, संयुक्त अभ्यास, लॉजिस्टिक सहयोग और समुद्री निगरानी के नेटवर्क भारत की सामूहिक क्षमता को बढ़ा सकते हैं। चीन की बढ़ती समुद्री पहुंच के बीच भारत के लिए यह जरूरी होगा कि वह हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी भूमिका को केवल एक बड़ी नौसैनिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि क्षेत्रीय समुद्री सुरक्षा के प्रमुख केंद्र के रूप में मजबूत करे।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत को चीन के कदम का जवाब केवल संख्या की दौड़ से नहीं देना चाहिए। अगर चीन के पास अधिक जहाज हैं तो भारत का लक्ष्य केवल उससे अधिक जहाज हासिल करना नहीं हो सकता। युद्धक क्षमता का मूल्यांकन जहाजों की संख्या से आगे जाकर किया जाना चाहिए। कितने पोत वास्तव में ऑपरेशनल हैं, कितने विमान उपलब्ध हैं, कितने प्रशिक्षित पायलट तैयार हैं, तकनीकी कर्मचारी कितने सक्षम हैं, कितने समय तक दूर समुद्र में अभियान चलाया जा सकता है और संकट की स्थिति में कितनी तेजी से अतिरिक्त क्षमता जुटाई जा सकती है—यही वास्तविक प्रश्न हैं।

चीन की तैयारी भारत के लिए एक चेतावनी जरूर है, लेकिन यह घबराने का कारण नहीं है। भारत के पास भौगोलिक स्थिति, हिंद महासागर की गहरी समझ, नौसैनिक परंपरा और विमानवाहक पोत संचालन का अनुभव जैसी महत्वपूर्ण ताकतें हैं। चुनौती इन ताकतों को भविष्य की जरूरतों के अनुरूप ढालने की है। चीन जिस तरह आज पायलटों और तकनीकी मानव संसाधन की तैयारी कर रहा है, भारत को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि कल उसके पास अपने जहाजों और विमानों को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित लोग हों।

आखिरकार, हिंद महासागर की आने वाली प्रतिस्पर्धा केवल जहाजों की नहीं, बल्कि क्षमता की प्रतिस्पर्धा होगी। चीन का पायलट प्रशिक्षण कार्यक्रम इस बात का संकेत है कि वह अपनी नौसैनिक शक्ति को केवल संख्या में नहीं, बल्कि उसकी निरंतर उपयोगिता में बदलना चाहता है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह चीन की बढ़ती क्षमता का इंतजार करने के बजाय आज ही अपनी तैयारी की कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करे। बेहतर प्रशिक्षण, पर्याप्त पायलट, मजबूत तकनीकी मानव संसाधन, आधुनिक लड़ाकू विमान, नियमित कैरियर अभ्यास, प्रभावी लॉजिस्टिक नेटवर्क और व्यापक समुद्री निगरानी—इन सभी को एक साथ आगे बढ़ाना होगा। भारत की समुद्री बढ़त केवल इस बात से तय नहीं होगी कि उसके पास कितने विमानवाहक पोत हैं, बल्कि इससे तय होगी कि संकट की घड़ी में वह अपनी पूरी नौसैनिक शक्ति को कितनी तेजी, निरंतरता और दक्षता के साथ इस्तेमाल कर सकता है। चीन ने इस दिशा में अपनी तैयारी शुरू कर दी है। भारत के लिए सही समय यही है कि वह अपनी मौजूदा बढ़त को भविष्य की स्थायी रणनीतिक क्षमता में बदल दे।