खेल के मैदान पर लड़कियों का बराबर हक क्यों नहीं?

Why don't girls have equal rights on the playground?

नीतू
लूणकरणसर, राजस्थान

खियेरा गांव की रेत भरी पगडंडी पर 13 साल की सोनिया (बदला हुआ नाम) दोपहर 12 बजे मैदान में अपनी कुछ साथियों के साथ खेल रही थी। उसके चेहरे पर चमक थी, लेकिन एक डर भी था, क्योंकि जब वह घर से निकली थी तो उसकी मां ने कहा था कि जल्दी घर आ जाना, क्योंकि उसके पिता घर आने वाले हैं और उन्हें उसका बाहर खेलना पसंद नहीं है। घर के पास स्कूल होने के कारण वह वहां तो जा सकती थी, लेकिन खेल का मैदान दूर होने के कारण दिन के उजाले में भी उसे वहां जाने की अनुमति नहीं थी। स्कूल जाने से पहले और लौटने के बाद वह घर के काम में मां का हाथ बंटाती है और उसके बाद खेलने जाती है। लेकिन पिता के वापस आने से पहले उसे घर लौटना होता है।

सोनिया को खो-खो खेलना बहुत पसंद है। वह स्कूल में भी खाली समय में दोस्तों के साथ खो-खो खेलती है और कई बार इंटर-स्कूल टूर्नामेंट में भाग ले चुकी है। लेकिन उसके पिता को इसके बारे में मालूम नहीं है, क्योंकि उनका मानना है कि खेलना लड़कियों का काम नहीं है। उनके अनुसार लड़कियों को घर का काम सीखना चाहिए ताकि शादी के बाद वे घर संभाल सकें। सोनिया के लिए खेल केवल मनोरंजन नहीं है। वह उसके लिए अपने साथियों के साथ समय बिताने, अपने शरीर को सक्रिय रखने, आत्मविश्वास बढ़ाने और अपनी पसंद का काम करने का अवसर है। लेकिन उसके सामने मैदान तक पहुंचने की आजादी भी एक सवाल बनी हुई है।

यह सिर्फ किसी एक सोनिया की कहानी नहीं है। देश के ग्रामीण इलाकों में आज भी ऐसी अनेक लड़कियां हैं जिनमें खेल की प्रतिभा है, लेकिन उनके सामने खेल का मैदान केवल भौतिक दूरी की वजह से दूर नहीं है। परिवार की अनुमति, घर के काम, सुरक्षा की चिंता, सामाजिक सोच और लड़कियों के लिए तय की गई भूमिकाएं भी उनके और खेल के बीच दीवार बन जाती हैं। राजस्थान जैसे बड़े ग्रामीण राज्य में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाता है, जहां गांवों में रहने वाली लड़कियों के लिए स्कूल और खेल के अवसर एक जैसे नहीं हैं।

राजस्थान में आज भी खेलों में लड़कियों की भागीदारी लड़कों की तुलना में न केवल कम है बल्कि और लड़कियों के लिए खेलों तक सीमित पहुंच एक चुनौती है। हालांकि खेल सुविधाओं को गांवों तक पहुंचाने के प्रयास जरूर हो रहे हैं। राज्य के 2024-25 के संशोधित बजट में ग्रामीण युवाओं को खेल प्रतियोगिताओं के लिए तैयार करने के उद्देश्य से ग्राम पंचायत स्तर पर चरणबद्ध तरीके से खुले जिम और खेल मैदान विकसित करने की घोषणा की गई थी। वहीं 2026-27 के आर्थिक सर्वेक्षण में बताया गया है कि ग्राम पंचायत स्तर पर खुले जिम और खेल मैदान विकसित किए जा रहे हैं। वहीं लड़कियों की खेल भागीदारी बढ़ाने के लिए जयपुर, भरतपुर और उदयपुर में आवासीय गर्ल्स स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट स्थापित करने की बात भी कही गई है।

लेकिन मैदान बना देने से सोनिया जैसी लड़कियों की समस्या अपने आप हल नहीं होगी। यदि मैदान गांव से दूर है और लड़की को वहां जाने की अनुमति नहीं है, तो वह मैदान उसके लिए मौजूद होते हुए भी अनुपलब्ध है। यदि खेल का समय वही है जब लड़की को घर के काम करने होते हैं, तो सुविधा होते हुए भी उसका लाभ उसे नहीं मिलेगा। यदि परिवार को लगता है कि खेलना लड़की के भविष्य के लिए जरूरी नहीं है, तो किसी योजना के तहत दिया गया खेल का सामान भी अलमारी में बंद रह सकता है। इसलिए लड़कियों के खेल के अवसर को केवल मैदान, स्टेडियम और खेल सामग्री की संख्या से नहीं मापा जा सकता।

यह भी ध्यान देने की जरूरत है कि ग्रामीण लड़कियों को केवल खिलाड़ी बनाने की बात करना पर्याप्त नहीं है। खेल उन्हें निर्णय लेने, समूह में काम करने, अपनी बात रखने और सार्वजनिक स्थानों पर आत्मविश्वास के साथ मौजूद रहने का अवसर देता है। खो-खो, कबड्डी, एथलेटिक्स या किसी दूसरे खेल के मैदान में लड़की केवल शरीर को सक्रिय नहीं करती, वह अपने लिए जगह भी बनाती है।

इस बदलाव में परिवारों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। माता-पिता को यह समझना होगा कि लड़की का खेलना उसके घर के काम सीखने या पढ़ाई करने के खिलाफ नहीं है। जिस तरह लड़कों के खेलने को उसके व्यक्तित्व और स्वास्थ्य के विकास का हिस्सा माना जाता है, उसी तरह लड़कियों के खेल को भी देखा जाना चाहिए। सोनिया जैसी लड़कियों को खेल का अवसर देने का अर्थ केवल अगली खिलाड़ी तैयार करना नहीं है। इसका अर्थ यह स्वीकार करना है कि लड़की का जीवन केवल घर, स्कूल और भविष्य की शादी के बीच सीमित नहीं है। उसके पास अपनी पसंद, प्रतिभा, शरीर, समय और सपनों पर भी अधिकार है।

समाज को यह तय करने के बजाय कि लड़कियों को क्या करना चाहिए, उन्हें यह चुनने का अवसर देना होगा कि वे क्या करना चाहती हैं। परिवारों को भी अपने पुराने डर और धारणाओं से बाहर आना होगा। जिस दिन किसी सोनिया को पिता के घर आने से पहले मैदान से भागकर घर लौटने की जरूरत नहीं होगी, उस दिन हम कह सकेंगे कि गांव की लड़कियों के लिए खेल का मैदान वास्तव में खुला है।