डॉ. प्रियंका सौरभ
समुद्र जितना जीवनदायी है, उसका रौद्र रूप उतना ही विनाशकारी हो सकता है। भारत की करीब 7,500 किलोमीटर लंबी तटरेखा देश की अर्थव्यवस्था, व्यापार, मत्स्य पालन और पर्यटन के लिए बेहद अहम है। लेकिन यही तटीय क्षेत्र हर साल चक्रवातों, समुद्री तूफानों, बाढ़ और तटीय कटाव का खतरा भी झेलते हैं। चक्रवात अर्नब ने एक बार फिर तटीय भारत की संवेदनशीलता और आपदा प्रबंधन की तैयारियों पर सवाल खड़े किए हैं। सवाल केवल यह नहीं है कि चक्रवात कब और कहां आएगा, बल्कि यह भी है कि उससे निपटने के लिए हमारी तैयारी कितनी मजबूत है। बदलते मौसम के दौर में अब आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने के बजाय पहले से नुकसान कम करने की रणनीति बनानी होगी।
चक्रवातों से निपटने में सबसे बड़ी चुनौती उनके बदलते स्वरूप और तीव्रता का अनुमान लगाना है। आधुनिक तकनीक और मौसम पूर्वानुमान में सुधार के बावजूद कई बार चक्रवात कम समय में अधिक शक्तिशाली हो जाते हैं। ऐसे में प्रशासन के पास लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और राहत सामग्री जुटाने के लिए बहुत कम समय बचता है। तेज हवाओं के साथ भारी बारिश, समुद्र में उठने वाली ऊंची लहरें और नदियों में बाढ़ एक साथ तबाही मचा सकती हैं। जलवायु परिवर्तन और समुद्र के बढ़ते तापमान ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है।
तटीय क्षेत्रों में कमजोर बुनियादी ढांचा भी बड़ी समस्या है। चक्रवात के दौरान बिजली के खंभे गिर जाते हैं, सड़कें जलमग्न हो जाती हैं और संचार सेवाएं ठप पड़ जाती हैं। इससे राहत और बचाव कार्य प्रभावित होते हैं। कई तटीय शहरों में अनियोजित निर्माण, जल निकासी की खराब व्यवस्था और निचले इलाकों में बस्तियों का विस्तार खतरे को बढ़ा रहा है। ऐसे में आपदा के समय लोगों को बचाने के साथ-साथ बिजली, पानी, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी जरूरी सेवाओं को जल्द बहाल करना भी बड़ी चुनौती बन जाता है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग की पूर्व चेतावनी प्रणाली पहले से बेहतर हुई है, लेकिन चुनौती अब भी यह है कि चेतावनी समय पर हर व्यक्ति तक पहुंचे। समुद्र में मछली पकड़ने वाले मछुआरों, दूरदराज के गांवों और छोटे द्वीपों में रहने वाले लोगों तक सूचना पहुंचाना आसान नहीं है। कई बार लोग चेतावनी को गंभीरता से नहीं लेते या घर और आजीविका छोड़ने के डर से सुरक्षित स्थानों पर जाने में देरी करते हैं। इसलिए केवल चेतावनी जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि लोगों को उसके खतरे और उससे बचने के उपायों के बारे में समझाना भी जरूरी है।
चक्रवात का असर सभी पर समान नहीं पड़ता। गरीब परिवार, महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग और दिव्यांग सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। जिन परिवारों की आजीविका खेती, मछली पकड़ने या दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है, उनके लिए घर छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जाना भी आसान नहीं होता। उन्हें अपनी संपत्ति, पशुओं और रोजगार की चिंता सताती है। चक्रवात के बाद मछली पकड़ने का काम बंद हो जाता है, खेतों में खारा पानी भर जाता है और छोटे कारोबार ठप पड़ जाते हैं। इससे प्रभावित परिवारों के सामने लंबे समय तक आर्थिक संकट बना रहता है।
प्राकृतिक सुरक्षा कवच का कमजोर होना भी चिंता का विषय है। मैंग्रोव वनों की कटाई, आर्द्रभूमियों का विनाश और समुद्र तटों पर बढ़ता निर्माण चक्रवातों के खतरे को बढ़ाते हैं। मैंग्रोव वन समुद्री लहरों की ताकत कम करने और तटीय इलाकों को बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। तटीय क्षेत्रों में विकास जरूरी है, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर होने वाला विकास भविष्य के लिए बड़ा संकट बन सकता है।
इन चुनौतियों से निपटने के लिए सबसे पहले पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना होगा। मौसम विभाग की तकनीकी क्षमता बढ़ाने के साथ उपग्रहों, डॉप्लर रडार और समुद्री निगरानी तंत्र का विस्तार जरूरी है। चेतावनी केवल मोबाइल संदेशों तक सीमित न रहे। सायरन, सामुदायिक रेडियो, स्थानीय प्रशासन और पंचायतों के माध्यम से भी सूचना लोगों तक पहुंचाई जाए। चेतावनी स्थानीय भाषा में हो और उसमें यह साफ बताया जाए कि लोगों को क्या करना है और कहां जाना है।
इसके साथ ही तटीय इलाकों में मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करना होगा। चक्रवात आश्रयस्थलों की संख्या बढ़ाने, सुरक्षित निकासी मार्ग बनाने और अस्पतालों, बिजलीघरों तथा पेयजल व्यवस्था को आपदा के लिहाज से मजबूत करने की जरूरत है। आश्रयस्थलों में महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगों की जरूरतों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। नियमित मॉक ड्रिल से लोगों को आपदा के समय सही कदम उठाने का अभ्यास कराया जा सकता है।
आपदा प्रबंधन में स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी जरूरी है। पंचायतों, स्वयंसेवी संगठनों, मछुआरा समितियों और युवाओं को आपदा प्रबंधन योजनाओं से जोड़ा जाना चाहिए। स्कूलों में आपदा संबंधी जागरूकता और प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाए। स्थानीय लोगों को अपने क्षेत्र के जोखिम की बेहतर जानकारी होती है। इसलिए उनकी भागीदारी से राहत और बचाव कार्य अधिक प्रभावी बनाए जा सकते हैं।
प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर भी नुकसान कम किया जा सकता है। मैंग्रोव वनों, आर्द्रभूमियों और तटीय वनस्पतियों का संरक्षण किया जाए। संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर रोक लगे और तटीय विनियमन के नियमों का सख्ती से पालन हो। इसके अलावा मछुआरों, किसानों और छोटे कारोबारियों के लिए बीमा, आर्थिक सहायता और आजीविका पुनर्वास की व्यवस्था जरूरी है, ताकि आपदा के बाद वे दोबारा अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
चक्रवात अर्नब ने यह समझने का अवसर दिया है कि प्राकृतिक आपदाओं से पूरी तरह बचना संभव नहीं, लेकिन बेहतर तैयारी से उनके नुकसान को जरूर कम किया जा सकता है। भारत ने मौसम पूर्वानुमान और लोगों की निकासी के मामले में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन तटीय क्षेत्रों में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। अब जरूरत राहत और बचाव तक सीमित रहने की नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाने की है जो आपदा से पहले ही नुकसान को कम कर सके। आखिरकार, सुरक्षित तट केवल मजबूत इमारतों से नहीं बनते, बल्कि जागरूक नागरिकों, जवाबदेह प्रशासन और संरक्षित पर्यावरण से बनते हैं।





