‘चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल: अर्जित लोकतंत्र की बुनियाद पर चोट’

Questions over the Election Commission's impartiality: A blow to the foundations of hard-won democracy

दिलीप कुमार पाठक

लोकतंत्र में वोट सिर्फ एक अधिकार नहीं, बल्कि नागरिक और सत्ता के बीच का वह पवित्र भरोसा है जिसकी ईमानदारी बनाए रखने का जिम्मा चुनाव आयोग पर होता है। लेकिन जब मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर देश की सडकें आंदोलन से गूंजने लगें और 13 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गायब होने के आरोप लगें, तो सवाल सिर्फ एक संस्था की कार्यप्रणाली पर नहीं उठता। सवाल उस अर्जित लोकतंत्र की बुनियाद पर जाकर टिक जाता है, जिसे हमने दशकों के भरोसे से सींचा है। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर मुंबई के शिवाजी पार्क तक जो नौजवान सड़कों पर उतरे हैं, उसे सामान्य राजनीतिक ड्रामा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। छात्र संगठनों, विपक्षी पार्टियों और युवाओं के इस देशव्यापी विरोध प्रदर्शन ने यह साफ कर दिया है कि मामला अब जनता के बुनियादी अधिकारों से जुड़ चुका है। इस पूरे विवाद के केंद्र में चुनाव आयोग के अपने आधिकारिक आंकड़े हैं। आयोग द्वारा चलाए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी मतदाता सूची सुधार अभियान के तहत अब तक ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से करीब 13.3 करोड़ नाम हटाए गए हैं, यह संख्या किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिहाज से बहुत बड़ी है। प्रदर्शनकारियों और विपक्ष का सबसे गंभीर आरोप यह है कि हटाए गए इन नामों में से 71.5 फीसदी यानी करीब 9.5 करोड़ वोटर्स को गैर-मौजूद या स्थायी रूप से शिफ्टेड श्रेणी बताकर बाहर किया गया है। आरोप लग रहे हैं कि डेटा क्लीनिंग की आड़ में नए वोटर्स और विपक्ष के मजबूत गढ़ों को निशाना बनाया गया है। हालांकि, चौतरफा दबाव के बाद आयोग ने 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में फॉर्म छह के जरिए नाम दोबारा जोड़ने का एक महीने का विशेष अभियान शुरू कर दिया है, लेकिन इससे यह सवाल नहीं छिप जाता कि इतनी बड़ी तादाद में गड़बड़ी होने ही क्यों दी गई?

सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि चुनाव आयोग ने इन कटौतियों के पीछे अपने ठोस प्रशासनिक तर्क दिए हैं। आयोग का रुख है कि यह पूरी कवायद तकनीकी शुद्धिकरण, आधार लिंकिंग और डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर के नियमों के तहत की गई है, ताकि दोहरी प्रविष्टियों और बोगस वोटिंग को हमेशा के लिए रोका जा सके। कानूनी तौर पर मतदाता सूची को साफ करना आयोग का संवैधानिक कर्तव्य है। लेकिन चिंता की बात तब बढ़ जाती है जब खुद इस व्यवस्था के भीतर से गंभीर आपत्तियां सामने आने लगती हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक खुद चुनाव आयोग के भीतर दो चुनाव आयुक्तों ने केंद्रीय डेटाबेस और वोटर लिस्ट सुधारने की इस पूरी आंतरिक प्रक्रिया को लेकर पिछले दस महीनों में 14 बार गंभीर लिखित आपत्तियां जताई हैं। बात सिर्फ दिल्ली मुख्यालय की नहीं है, जमीनी स्तर पर गोवा जैसे राज्य से यह रिपोर्ट आई कि सॉफ्टवेयर की तकनीकी खामी के कारण जांच में बिल्कुल सही पाए गए 97 मतदाताओं के नाम अंतिम लिस्ट में शामिल ही नहीं हो सके।

डिजिटल इंडिया और पारदर्शिता के इस दौर में अगर देश के 13 करोड़ से ज्यादा नागरिक एक तकनीकी अभियान के कारण चुनावी प्रक्रिया से बाहर हो जाते हैं, तो यह व्यवस्था की एक बड़ी चूक है। लोकतंत्र की असली ताकत केवल सरकार बनाना नहीं है, बल्कि चुनाव कराने वाले पूरे सिस्टम पर हर एक नागरिक का अटूट विश्वास होना है। इस संकट का समाधान केवल राजनीतिक रैलियों या चुनावी अधिसूचनाओं से नहीं निकलेगा, बल्कि इसके लिए एक त्रिस्तरीय सुधार की जरूरत है। सबसे पहले, वोटर लिस्ट से नाम हटाने की प्रक्रिया का वॉर्ड और पंचायत स्तर पर ‘पब्लिक ऑडिट’ होना चाहिए। दूसरा, तकनीकी सॉफ्टवेयर में सुधार के लिए सभी राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों के साथ एक सर्वदलीय तकनीकी समिति बनाई जाए। अंत में, चुनाव आयोग को केवल प्रशासनिक बहानों से बाहर निकलकर इस पूरी मतदाता सूची का श्वेत-पत्र जारी करना होगा। इस स्वायत्तता को बचाना सिर्फ सड़कों पर बैठे युवाओं या पार्टियों का काम नहीं है, बल्कि यह हमारे पूरे लोकतांत्रिक अस्तित्व की रक्षा का सबसे बड़ा सवाल है।