धरती का बदलता चेहरा और आदमी की घटती जगह

The changing face of the Earth and the shrinking space for man

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

बाढ़ आती है तो सिर्फ घर नहीं, पूरी जिंदगी बह जाती है। सूखा पड़ता है तो खेतों के साथ उम्मीदें दरकती हैं। गर्मी देह झुलसा दे तो मजदूर के सामने सवाल होता है—रोटी कमाए या जान बचाए? भारत में मौसम अब विस्थापन का कारण बन चुका है। वह घर और रोजगार छीनकर लाखों लोगों को ठिकाना बदलने पर मजबूर कर रहा है। 2024 में आपदाओं ने करीब 54 लाख आंतरिक विस्थापन दर्ज किए—2012 के बाद सबसे ऊँचा आँकड़ा; करीब दो-तिहाई बाढ़ से जुड़े थे। 2025 में यह संख्या 6.72 लाख हुई, पर संकट नहीं थमा; भारत तब भी दुनिया के सर्वाधिक आपदा-विस्थापन वाले देशों में रहा। विडंबना है कि प्रकृति ने जिन्हें बेदखल किया, नीति ने उन्हें अब तक स्पष्ट पहचान नहीं दी।

यही हमारी नीति का बड़ा विरोधाभास है। जलवायु परिवर्तन पर मिशन हैं, आपदा प्रबंधन की संस्थाएँ और राहत-पुनर्वास के प्रावधान हैं—लेकिन ‘जलवायु प्रवासी’ की स्पष्ट नीति-श्रेणी नहीं। घर छोड़ने वाला आपदा-पीड़ित, शहर जाने वाला आर्थिक प्रवासी और खेत छोड़ने वाला ग्रामीण प्रवासी कहलाता है; पर दर्ज नहीं कि उसे घर से किसने निकाला—बदलता मौसम। सुंदरबन के द्वीप समुद्र और कटाव से सिकुड़ रहे हैं। घोरामाड़ा इसका उदाहरण है, जहाँ जमीन का गायब होना जीवन के आधार खिसकने का संकट है। सवाल शब्द का नहीं, जिम्मेदारी का है। नाम नहीं होगा तो योजना में जगह नहीं, योजना नहीं होगी तो बजट नहीं—और विस्थापित राहत की कतार में रहेगा।

भारत का प्रवास संकट विराट है। विभिन्न अध्ययनों में आंतरिक प्रवासियों की संख्या करीब 40 करोड़ आँकी गई है। इनमें बड़ी संख्या उस अनौपचारिक अर्थव्यवस्था की है, जो शहरों की इमारतें और सड़कें बनाती, सामान ढोती, घर चलाती और खेतों में फसल उगाती है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार करीब 90 प्रतिशत श्रमबल अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ा है। मजदूरी पहले ही अस्थिर है; अब मौसम भी। गर्मी बढ़ती है तो काम के घंटे घटते हैं, बीमारी बढ़ती है और आय गिरती है। रोज कमाने वाले मजदूर के लिए दो-चार दिन का काम छूटना महज नुकसान नहीं, चूल्हे पर सीधी चोट है। उसके लिए मौसम की मार आखिरकार रोटी की मार बन जाती है।

गर्मी की असली मार थर्मामीटर में नहीं, मजदूर की जेब में दिखती है। 2026 में अप्रैल-मई के दौरान देश के कई हिस्सों में तापमान 40 डिग्री से ऊपर रहा; बांदा में 47.6 डिग्री और दिल्ली में 43-44 डिग्री तक पहुँचा। निर्माण मजदूर, ईंट-भट्ठे का श्रमिक, रिक्शा चालक और सड़क किनारे विक्रेता—इनके लिए ‘वर्क फ्रॉम होम’ विकल्प नहीं। धूप में निकलेंगे तभी चूल्हा जलेगा। गर्मी दिन में ही नहीं मारती; गर्म रातें शरीर को तपिश से उबरने नहीं देतीं। अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण एवं विकास संस्थान के 2026 के एक अध्ययन के अनुसार, गर्मी से अनौपचारिक श्रमिक साल में 15–24 दिन काम खो सकते हैं और आर्थिक नुकसान जीडीपी के करीब 2 प्रतिशत तक पहुँच सकता है। जलवायु संकट गरीब के शरीर और अर्थव्यवस्था, दोनों पर दर्ज हो रहा है।

नीति और हकीकत की खाई दिखती है, फिर भी भरती नहीं। 2025 में इंडियन इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमन सेटलमेंट्स ने राष्ट्रीय, राज्य और शहर स्तर की 94 नीतियों व हस्तक्षेपों की समीक्षा की। पाया कि 73 में से 94 (करीब 78 प्रतिशत) हस्तक्षेप जलवायु के लिहाज से अंधे थे; जलवायु परिवर्तन, आपदा जोखिम और सामाजिक सुरक्षा को जोड़ने वाला अनुकूलनशील ढाँचा कुछ ही पहलों में दिखा। राशन की पोर्टेबिलिटी में प्रगति हुई, लेकिन आवास, स्वास्थ्य, श्रम-सुरक्षा और कल्याण स्थान-आधारित हैं। शहरों को मजदूर चाहिए, परिवार की जिम्मेदारी नहीं। शहर उसकी मेहनत को स्थायी और मौजूदगी को अस्थायी मानता है। कैसी अर्थव्यवस्था है, जिसमें आदमी जरूरी है, मगर उसका अधिकार नहीं?

मणिपुर की कहानी अलग कारण से महत्वपूर्ण है। वहाँ विस्थापन जलवायु नहीं, हिंसा से हुआ; इसलिए इसे जलवायु प्रवास कहना गलत होगा। लेकिन यह दिखाता है कि लंबा विस्थापन नागरिक को कैसे ‘अस्थायी’ जीवन में स्थायी रूप से फँसा देता है। आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र (आईडीएमसी) के अनुसार 2025 के अंत तक मणिपुर में करीब 78 हजार लोग अब भी आंतरिक विस्थापन में थे, जबकि हिंसा को दो साल से अधिक बीत चुके थे। यही चिंता जलवायु से विस्थापित परिवारों की भी है। गाँव छूटा तो अपने पराए हुए, शहर पहुँचे तो बाहरी ठहरे। महिलाएँ और बच्चे सबसे अधिक भुगतते हैं—पढ़ाई छूटती है, स्वास्थ्य सेवाएँ दूर होती हैं, आवास असुरक्षित होता है और परिवार की सामाजिक जड़ें उखड़ जाती हैं।

आँकड़े कई बार सच बताते नहीं, छिपा देते हैं। जनगणना में देरी और विभागों की अलग परिभाषाएँ प्रवास की तस्वीर धुँधली करती हैं। सरकारी आँकड़ों में प्रवासी सिर्फ ‘कहाँ से आया’ और ‘कहाँ गया’ होता है; ‘क्यों गया’ दर्ज नहीं होता। कारण दर्ज न हो तो जलवायु की भूमिका अदृश्य रहेगी। सूखे से निकला किसान मजदूर, बाढ़ से भागा परिवार विस्थापित और गर्मी में काम खोता श्रमिक सिर्फ गरीब बनकर रह जाएगा। शब्द बदलते ही समस्या और जिम्मेदारी बदल जाती है। प्रवास को विकास का सामान्य लक्षण कहना आधा सच है। बेहतर अवसर के लिए जाना प्रवास है; लेकिन बदलती जलवायु जब जाने को मजबूर करे और लौटने का रास्ता बंद कर दे, तो यह आर्थिक फैसला नहीं, बेदखली है।

अब जरूरत दया की नहीं, नीति की है। ‘जलवायु प्रवासी’ को पहचान मिले; बाढ़, समुद्री क्षरण और सूखे से उजड़े परिवारों का पुनर्वास हो; किसानों को स्थानीय आजीविका मिले; प्रवासी मजदूरों के लिए राशन, स्वास्थ्य, आवास और शिक्षा पोर्टेबल हों; गर्मी में पानी, छाया और विश्राम श्रमिक अधिकार बनें; और जलवायु, आपदा व प्रवास को जोड़कर राष्ट्रीय से नगर स्तर तक नीति बने। प्रकृति ने फैसला सुना दिया है—लोग चल पड़े हैं। अब सरकार को तय करना है कि वह उन्हें सिर्फ ‘प्रवासी’ मानेगी या उनकी बेदखली की वजह पहचानेगी। घर बहने के बाद बन सकता है; पहचान बह जाए तो आदमी कहाँ लौटे? भारत को अब जलवायु से लड़ने की नहीं, उससे उजड़ते नागरिकों को पहचानने की जरूरत है। क्योंकि विस्थापन दिखे, वजह न दिखे—तो विकास अधूरा है।