स्वदेश कुमार
ग्रेटर नोएडा के दादरी थाने में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजकुमार भाटी के खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नया उबाल आ गया है। उनके खिलाफ यह कानूनी कार्रवाई भड़काऊ भाषण देने और अवैध रूप से बाहरी फंडिंग हासिल करने के आरोपों के तहत की गई है। यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जब दिल्ली के रानी झांसी रोड स्थित अंबेडकर भवन में भारतीय बौद्ध महासभा द्वारा आयोजित ‘धम्म दीक्षा’ कार्यक्रम का एक वीडियो सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल गया। इस वीडियो में समाजवादी पार्टी के प्रमुख चेहरा और प्रवक्ता राजकुमार भाटी को मंच पर हाथ उठाकर डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा 1956 में दी गई ऐतिहासिक 22 प्रतिज्ञाओं को दोहराते हुए देखा गया। इन प्रतिज्ञाओं में पारंपरिक हिंदू रीति-रिवाजों को न मानने, ब्रह्मा-विष्णु-महेश और राम-कृष्ण को भगवान स्वीकार न करने तथा उनकी पूजा न करने की कठोर शपथ शामिल थी। वीडियो के सामने आते ही भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी दलों ने समाजवादी पार्टी को ‘हिंदू विरोधी’ मानसिकता वाली पार्टी करार देते हुए चौतरफा हमला बोल दिया, जिसने अंततः इस मामले को पुलिस थाने की चौखट तक पहुंचा दिया।
भाटी के इस यू-टर्न पर बहुजन और बौद्ध संगठनों ने भी आपत्ति जताई है और इसे बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिज्ञाओं का अपमान बताया है। आलोचकों का कहना है कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक रूप से 22 प्रतिज्ञाएं लेता है, तो वह बौद्ध धम्म में दीक्षित माना जाता है, लेकिन पार्टी की डांट और राजनीतिक भविष्य के डर से भाटी अब अपने कदम पीछे खींच रहे हैं। दादरी पुलिस ने इस मामले में दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर गहन जांच शुरू कर दी है, जिसमें भाषण की मूल रिकॉर्डिंग और उनके संगठन को मिलने वाली आर्थिक मदद के स्रोतों की कड़ियों को खंगाला जा रहा है। उत्तर प्रदेश के जातिगत और धार्मिक समीकरणों को देखते हुए यह विवाद समाजवादी पार्टी के ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।
वैसे, भारतीय राजनीति के इतिहास में यह कोई पहली घटना नहीं है, जब किसी नेता के धर्म बदलने या किसी दूसरे धर्म की ओर झुकाव रखने पर इतना बड़ा बवंडर खड़ा हुआ हो। राजनीति में रहते हुए धर्म परिवर्तन करने की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक मिसाल खुद संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पेश की थी। 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने अपने लाखों समर्थकों के साथ हिंदू धर्म का त्याग कर बौद्ध धर्म अपना लिया था। उन्होंने महसूस किया था कि हिंदू समाज में व्याप्त छुआछूत और जातिवाद के दलदल से दलित समाज को मुक्ति दिलाने का यही एकमात्र रास्ता है। इसी ऐतिहासिक मौके पर उन्होंने वे 22 प्रतिज्ञाएँ तैयार की थीं, जिन्हें आज भी नव-बौद्ध अपनाते हैं और जिसे लेकर आज राजकुमार भाटी विवादों में घिरे हैं। बाबा साहब उस समय देश के सबसे बड़े दलित नेता थे और उनके इस कदम ने भारत की सामाजिक और चुनावी राजनीति को हमेशा के लिए बदलकर रख दिया था।
आधुनिक भारतीय राजनीति की बात करें तो दिल्ली सरकार में आम आदमी पार्टी के कद्दावर मंत्री रहे राजेंद्र पाल गौतम का मामला भी राजकुमार भाटी प्रकरण से हूबहू मेल खाता है। अक्टूबर 2022 में दिल्ली के करोल बाग में आयोजित एक सामूहिक धम्म दीक्षा कार्यक्रम में राजेंद्र पाल गौतम शामिल हुए थे। उस कार्यक्रम में भी हजारों लोगों के साथ हिंदू देवी-देवताओं की पूजा न करने की यही 22 प्रतिज्ञाएँ दोहराई गई थीं। जैसे ही इसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, भारतीय जनता पार्टी ने इसे सीधे तौर पर अरविंद केजरीवाल की पार्टी से जोड़कर चुनावी मुद्दा बना दिया। गुजरात चुनाव पास होने के कारण आम आदमी पार्टी को भारी राजनीतिक नुकसान का डर सताने लगा। भारी दबाव के बीच राजेंद्र पाल गौतम को न केवल अपने मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा, बल्कि बाद में उन्होंने आम आदमी पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थाम लिया था। यह घटना दर्शाती है कि लोकतांत्रिक राजनीति में जब कोई नेता अपने धार्मिक विश्वासों को सार्वजनिक मंच पर लाता है, तो उसकी कीमत उसके पूरे राजनीतिक करियर को चुकानी पड़ सकती है।
इसी तरह दक्षिण भारत की राजनीति में द्रविड़ आंदोलन के अग्रदूत और करिश्माई नेता मुथुवेल करुणानिधि और ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ की विरासत ने हमेशा धर्म और राजनीति के अंतर्संबंधों को चुनौती दी। हालांकि उन्होंने औपचारिक रूप से किसी संगठित धर्म को अपनाने के बजाय नास्तिकता का मार्ग चुना, लेकिन उनके परिवार और पार्टी के कई नेताओं ने समय-समय पर ईसाई या अन्य धर्मों के प्रति अपनी आस्था खुलकर व्यक्त की। आंध्र प्रदेश की राजनीति में वाई.एस. राजशेखर रेड्डी और उनके पुत्र वाई.एस. जगन मोहन रेड्डी का परिवार भी राजनीति और धर्म के एक अलग समीकरण को पेश करता है। जगन मोहन रेड्डी का परिवार मूल रूप से हिंदू पृष्ठभूमि से आने के बावजूद ईसाई धर्म का अनुयायी है। जब वे सत्ता में आए, तो विपक्ष ने उन पर तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम जैसे पवित्र हिंदू स्थलों के प्रबंधन में ईसाई एजेंडे को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। राजनीति में रहते हुए अपनी धार्मिक पहचान को बदलना या एक विशिष्ट धार्मिक पहचान को बनाए रखना हमेशा से ही चुनावी नफे-नुकसान का जरिया बनता रहा है।
पूर्वोत्तर भारत के राज्यों, विशेषकर नागालैंड, मिजोरम और मेघालय में भी कई ऐसे जनजातीय नेता हुए हैं, जिन्होंने अपनी पारंपरिक लोक मान्यताओं या हिंदू-बौद्ध धर्म को छोड़कर ईसाई धर्म अपनाया, ताकि वे स्थानीय बहुसंख्यक ईसाई आबादी के साथ खुद को जोड़ सकें। वहां की क्षेत्रीय राजनीति में धर्म का यह बदलाव नेताओं को सत्ता की सीढ़ियां चढ़ने में बेहद मददगार साबित हुआ। इसके विपरीत, उत्तर भारत की राजनीति पूरी तरह से सनातनी और रूढ़िवादी धागों से बुनी हुई है, जहां किसी भी स्थापित नेता द्वारा हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ एक शब्द भी बोलना या ऐसी किसी प्रतिज्ञा का हिस्सा बनना आत्मघाती कदम माना जाता है। यही कारण है कि राजकुमार भाटी जैसे कद्दावर समाजवादी चेहरे को भी अपनी राजनीतिक जमीन खिसकती देख तुरंत बैकफुट पर आना पड़ा और खुद को एक ‘सच्चा सनातनी हिंदू’ साबित करने की होड़ में जुटना पड़ा। दादरी थाने की यह एफआईआर आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश की सियासी फिजा में ध्रुवीकरण को कितना तेज करेगी, यह पुलिस की तफ्तीश और अदालत के रुख पर निर्भर करेगा।





