अजय कुमार बियानी
शरद ऋतु का आगमन होते ही संपूर्ण भारत शक्ति की उपासना के रंग में सराबोर हो जाता है। देश के विभिन्न हिस्सों में इस कालखंड को नौ दिनों के कठिन उपवास, डांडिया, गरबा और रामलीला के रूप में मनाया जाता है। इसके विपरीत, बंगाल की भौगोलिक सीमाओं में प्रवेश करते ही इस उत्सव का स्वरूप, दर्शन और मनोविज्ञान पूरी तरह बदल जाता है। बंगाल में दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान या बुराई पर अच्छाई की पौराणिक विजय का प्रतीक मात्र नहीं है, बल्कि यह एक अत्यंत भावुक पारिवारिक पुनर्मिलन, सामाजिक समरसता और विश्व के सबसे बड़े सार्वजनिक कला आंदोलन का अनूठा दस्तावेज है। यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक तथा सांस्कृतिक संगठन ने कोलकाता की दुर्गा पूजा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल कर इसे एक अद्वितीय वैश्विक पहचान प्रदान की है।
इस महान उत्सव की विशिष्टता का सबसे प्राथमिक कारण देवी को देखने और उनके साथ संबंध स्थापित करने का बंगाली दृष्टिकोण है। जहाँ पारंपरिक ग्रंथों में माँ दुर्गा को महिषासुर का संहार करने वाली एक अत्यंत उग्र, अदम्य और अलौकिक योद्धा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, वहीं बंगाल के जनमानस में वे ‘उमा’ के रूप में पूजी जाती हैं। उमा यानी इस धरा की अपनी एक लाडली और विवाहित बेटी, जो वर्ष में केवल एक बार अपने ससुराल (कैलाश पर्वत) से पांच दिनों के लिए अपने माता-पिता के घर यानी मायके आती हैं। इस भावनात्मक दृष्टिकोण के कारण यहाँ की प्रतिमाओं में माँ दुर्गा अकेली दृश्यमान नहीं होतीं। उनके साथ उनके चारों बच्चे— ऐश्वर्य की प्रतीक लक्ष्मी, ज्ञान की अधिष्ठात्री सरस्वती, कार्तिकेय और विनायक गणेश भी एक ही वेदिका पर उपस्थित रहते हैं। एक संहारक महिषासुर मर्दिनी को एक वात्सल्यमयी माँ और स्नेही बेटी के रूप में देखना इस पूजा को अत्यंत आत्मीय और मानवीय बना देता है।
धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से भी बंगाल की यह परंपरा अपनी एक अलग राह बनाती है। बंगाल में इस शरदोत्सव को ‘अकाल बोधन’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है असमय जागृत करना। मूल पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, शक्ति की मूल पूजा वसंत ऋतु में चैत्र नवरात्रि के दौरान नियत थी। कालान्तर में, रावण पर विजय प्राप्त करने के उद्देश्य से मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम ने आश्विन मास की शरद ऋतु में देवी का असमय आह्वान किया था। बंगाल इसी अकाल बोधन की स्मृति को जीवित रखता है। उत्सव की अनौपचारिक शुरुआत ‘महालया’ के पावन दिन से होती है। इस दिन तड़के वीरेंद्र कृष्ण भद्र के स्वर में चंडी पाठ की ध्वनि हर घर में गूंजती है और कुमार्टुली के मूर्तिकार अत्यंत श्रद्धा के साथ माँ की मिट्टी की प्रतिमा की आँखों को अंतिम रूप देते हैं, जिसे ‘चक्षुदान’ कहा जाता है। इसके पश्चात, महाषष्ठी से लेकर विजयादशमी तक चलने वाला यह उत्सव अपनी पूरी भव्यता के साथ धरातल पर उतरता है।
बंगाल की दुर्गा पूजा का सामाजिक और ऐतिहासिक विकास भी इसे विशिष्ट बनाता है। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी तक यह उत्सव मुख्य रूप से संपन्न जमींदारों और कुलीन परिवारों के महलों तक सीमित था, जिसे ‘बारिर पूजा’ यानी घरेलू पूजा कहा जाता था। यह वर्ग प्रदर्शन और शक्ति के प्रदर्शन का माध्यम था। बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, इस व्यवस्था में एक बड़ा लोकतांत्रिक परिवर्तन आया और यह व्यक्तिगत महलों से निकलकर ‘बारोवारी’ यानी बारह मित्रों या सामुदायिक सहयोग से होने वाली ‘सार्वजनिक पूजा’ के रूप में स्थापित हुआ। इस परिवर्तन ने जाति, धर्म, वर्ग और आर्थिक स्थिति की रूढ़िवादी दीवारों को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। वर्तमान समय में, यह उत्सव किसी एक समुदाय का न रहकर एक व्यापक नागरिक त्योहार बन चुका है, जिसमें हर वर्ग की भागीदारी समान रूप से सुनिश्चित होती है।
आधुनिक युग में बंगाल की दुर्गा पूजा दुनिया के सबसे बड़े ‘ओपन-एयर’ कला प्रदर्शनी के रूप में विकसित हो चुकी है। पूरा कोलकाता शहर और उसके आसपास के क्षेत्र रातों-रात एक विशाल दीर्घा में बदल जाते हैं। यहाँ बनने वाले पंडाल केवल बांस और कपड़े के ढांचे नहीं होते, बल्कि वे वास्तुकला, समकालीन सामाजिक संदेशों, पर्यावरण चेतना और ऐतिहासिक धरोहरों के जीवंत प्रतिरूप होते हैं। मूर्तिकार, चित्रकार, प्रकाश व्यवस्था के विशेषज्ञ और स्थानीय कारीगर महीनों की कड़ी मेहनत से इन पंडालों को एक दृश्य वैभव प्रदान करते हैं। इन अद्भुत कलाकृतियों को देखने के लिए लाखों की संख्या में जनसैलाब दिन और रात का अंतर मिटाकर सड़कों पर उमड़ पड़ता है।
इस उत्सव का एक अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ यहाँ की खान-पान संस्कृति और विशिष्ट लोक नृत्य हैं। जहाँ भारत के अन्य भागों में नवरात्रि के दौरान अत्यंत कड़े उपवास, अन्न का त्याग और सात्विक जीवन शैली का पालन किया जाता है, वहीं बंगाल में इसे एक आनंदोत्सव और आनंद के पर्व के रूप में जिया जाता है। महाअष्टमी के दिन तैयार होने वाला विशेष ‘भोग’ जिसमें खिचड़ी, लाबड़ा और विभिन्न प्रकार के मिष्ठान शामिल होते हैं, बिना किसी भेदभाव के हजारों लोगों में वितरित किया जाता है। इसके साथ ही, ढाक की तीव्र और उन्मादपूर्ण थाप पर मिट्टी के पात्र में सुलगते नारियल के छिलकों और धुएं के साथ किया जाने वाला ‘धुनुची नाच’ इस उत्सव की ऊर्जा को एक अलग ही चरम पर ले जाता है। यह नृत्य आस्था और शारीरिक संतुलन का एक अद्भुत प्रदर्शन है।
इस पांच दिवसीय महाअनुष्ठान का समापन विजयादशमी के दिन एक अत्यंत भावुक विदाई के साथ होता है। जिस प्रकार एक बेटी को उसके ससुराल विदा करते समय पूरा परिवार अश्रुपूर्ण होता है, ठीक वही दृश्य दशमी के दिन विसर्जन के समय देखने को मिलता है। इस दिन विवाहित महिलाएं माँ की प्रतिमा को मिठाई अर्पित करती हैं, उनकी आरती उतारती हैं और एक-दूसरे के चेहरे पर सिंदूर लगाती हैं, जिसे ‘सिंदूर खेला’ कहा जाता है। यह रस्म सौभाग्य, बंधुत्व और उत्सव के उल्लास का प्रतीक है। इसके बाद जब माँ की प्रतिमाओं को पवित्र नदियों में विसर्जित किया जाता है, तो ‘आसछे बछर आबार हवे’ (अगले वर्ष फिर मिलेंगे) के नारों के साथ इस वादे के साथ विदा किया जाता है कि यह लाडली बेटी अगले वर्ष फिर अपने मायके लौटेगी। इस प्रकार, बंगाल की दुर्गा पूजा धर्म की संकीर्ण सीमाओं को लांघकर कला, सामाजिक समरसता और शुद्ध मानवीय संवेदनाओं का एक ऐसा महासागर बन जाती है, जो विश्व में कहीं और देखने को नहीं




