बदलती दुनिया में संयुक्त राष्ट्र: शांति की उम्मीद या वैश्विक शक्तियों की राजनीति का मंच

The United Nations in a changing world: a hope for peace or a platform for global power politics

राजेश जैन

दुनिया को आज पहले से कहीं अधिक अंतरराष्ट्रीय सहयोग की जरूरत है, लेकिन देशों के बीच अविश्वास, युद्ध, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और महाशक्तियों के टकराव ने सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता को चुनौती दी है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या संयुक्त राष्ट्र 21वीं सदी की समस्याओं का समाधान करने में सक्षम है या उसे अपनी भूमिका और कार्यप्रणाली में बुनियादी बदलाव करने होंगे?

दुनिया के किसी हिस्से में युद्ध होता है तो उसकी गूंज सीमाओं तक सीमित नहीं रहती। कहीं ऊर्जा संकट गहराता है, कहीं खाद्य पदार्थ महंगे होते हैं, कहीं लाखों लोग घर छोड़ने को मजबूर होते हैं और कहीं युद्ध की आशंका पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने लगती है। जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद और साइबर सुरक्षा जैसी चुनौतियां भी किसी एक देश की सीमाओं में बंधकर नहीं रहतीं। इनके समाधान के लिए देशों के बीच सहयोग जरूरी है। लेकिन सहयोग की जरूरत जितनी बढ़ी है, उसे हासिल करना उतना ही कठिन दिखाई देने लगा है।

यही वह विरोधाभास है, जो संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर विचार करने के लिए मजबूर करता है। एक ओर दुनिया को ऐसा साझा मंच चाहिए, जहां छोटे-बड़े सभी देश बातचीत कर सकें। दूसरी ओर, उसी मंच पर शक्तिशाली देशों के हित, आपसी प्रतिस्पर्धा और राजनीतिक मतभेद सामूहिक कार्रवाई की राह में बाधा बनते हैं। संयुक्त राष्ट्र की सफलता और सीमाओं को समझने के लिए इस विरोधाभास को समझना जरूरी है।

युद्ध रोकने की उम्मीद और सुरक्षा परिषद की सीमाएं

द्वितीय विश्वयुद्ध की तबाही के बाद 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई। इसका मूल उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को युद्ध की विभीषिका से बचाना, अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, मानवाधिकारों का सम्मान बढ़ाना और देशों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना था। उस समय दुनिया ने महसूस किया था कि केवल सैन्य शक्ति और राष्ट्रीय हितों के आधार पर बनी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थायी शांति की गारंटी नहीं दे सकती।

संयुक्त राष्ट्र ने देशों को बातचीत का साझा मंच दिया। शांति स्थापना अभियानों, मानवीय सहायता, शरणार्थियों की मदद और अंतरराष्ट्रीय कानून को मजबूत करने में इसकी भूमिका रही है। लेकिन युद्धों को रोकने की इसकी क्षमता पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। जब किसी बड़े संघर्ष में महाशक्तियों के हित टकराते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र की सीमाएं स्पष्ट दिखाई देने लगती हैं।

इसका सबसे बड़ा उदाहरण सुरक्षा परिषद की वीटो व्यवस्था है। परिषद के पांच स्थायी सदस्य-अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस-किसी महत्वपूर्ण गैर-प्रक्रियात्मक प्रस्ताव को वीटो करके रोक सकते हैं। यह व्यवस्था 1945 की शक्ति-संरचना को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। इसके समर्थकों का तर्क रहा है कि बड़ी शक्तियों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल रखना अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थिरता के लिए जरूरी है। आलोचकों का कहना है कि यही विशेषाधिकार कई बार बहुमत की इच्छा और सामूहिक कार्रवाई को निष्प्रभावी कर देता है।

यही संयुक्त राष्ट्र की मूल दुविधा है। जिस संस्था से उम्मीद की जाती है कि वह अंतरराष्ट्रीय कानून और शांति के सिद्धांतों की रक्षा करेगी, उसकी प्रभावशीलता उन्हीं देशों के सहयोग पर निर्भर करती है जिनके पास सबसे अधिक राजनीतिक और सैन्य शक्ति है। जब ये देश सहमत होते हैं, तो सामूहिक कार्रवाई की संभावना बढ़ती है; जब वे टकराते हैं, तो गंभीर संकटों में भी निर्णय अटक सकते हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि संयुक्त राष्ट्र पूरी तरह अप्रासंगिक हो गया है। बल्कि यह कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की क्षमता और सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति के बीच गहरा संबंध है। संयुक्त राष्ट्र के सामने चुनौती केवल प्रस्ताव पारित करने की नहीं, बल्कि उन्हें प्रभावी कार्रवाई में बदलने की भी है।

दुनिया की मौजूदा व्यवस्था आज की वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती

संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के समय दुनिया की राजनीतिक और आर्थिक संरचना आज से बहुत अलग थी। तब उपनिवेशवाद का प्रभाव व्यापक था, अनेक वर्तमान स्वतंत्र देश अस्तित्व में नहीं आए थे और वैश्विक शक्ति का संतुलन सीमित देशों के इर्द-गिर्द केंद्रित था। आज एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक देश अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वीटो अधिकारों की संरचना में बुनियादी बदलाव नहीं हुआ है। भारत जैसे देश लंबे समय से सुरक्षा परिषद के विस्तार और अधिक प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। अफ्रीकी देशों सहित कई अन्य क्षेत्रों की भी मांग है कि वैश्विक निर्णय प्रक्रिया आज की दुनिया की जनसंख्या, क्षेत्रीय विविधता और बदलते शक्ति-संतुलन को बेहतर ढंग से प्रतिबिंबित करे। सुरक्षा परिषद में सुधार की वार्ताएं जारी हैं, लेकिन सदस्य देशों के बीच इस बात पर सहमति बनाना कठिन रहा है कि नए सदस्य कौन हों, उनकी शक्तियां क्या हों और वीटो व्यवस्था का भविष्य क्या हो।

यहां सुधार की मांग केवल प्रतिष्ठा या अधिक देशों को प्रतिनिधित्व देने का सवाल नहीं है। इसका संबंध संस्था की वैधता और निर्णयों पर वैश्विक भरोसे से भी है। यदि दुनिया के बड़े हिस्से को लगता है कि अंतरराष्ट्रीय फैसलों में उसकी आवाज कमजोर है, तो सामूहिक व्यवस्था के प्रति विश्वास कम हो सकता है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि सुरक्षा परिषद का विस्तार अपने आप में प्रभावशीलता की गारंटी नहीं है। अधिक प्रतिनिधित्व के साथ निर्णय प्रक्रिया को सक्षम बनाना भी जरूरी होगा। इसलिए सुधार का उद्देश्य केवल परिषद का आकार बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे अधिक प्रतिनिधि, जवाबदेह और कार्यक्षम बनाना होना चाहिए।

संयुक्त राष्ट्र केवल युद्ध और कूटनीति तक सीमित नहीं

संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर करना अधूरा होगा कि उसने कितने युद्ध रोके या कितने प्रस्ताव पारित किए। स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य सुरक्षा, बाल अधिकार, शरणार्थियों की सहायता और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में भी संयुक्त राष्ट्र तथा उसकी विभिन्न एजेंसियों की भूमिका महत्वपूर्ण है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन, यूनिसेफ, एफएओ और अन्य संस्थाएं अलग-अलग क्षेत्रों में देशों के बीच सहयोग, तकनीकी सहायता और मानवीय कार्यक्रमों को समर्थन देती हैं। इनका काम कई बार सुर्खियों में नहीं आता, लेकिन इसका असर आम लोगों के जीवन पर पड़ता है।

आज जलवायु परिवर्तन, महामारियां, खाद्य संकट और डिजिटल तकनीक से जुड़ी चुनौतियां किसी एक सरकार के प्रयासों से पूरी तरह हल नहीं हो सकतीं। एक देश उत्सर्जन कम करने के लिए कदम उठाए, लेकिन दूसरे देश सहयोग न करें, तो जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण कठिन होगा। इसी तरह किसी महामारी, साइबर खतरे या अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखला में व्यवधान के प्रभाव सीमाओं से परे जा सकते हैं।

सितंबर 2024 में विश्व नेताओं ने संयुक्त राष्ट्र के भविष्य शिखर सम्मेलन में ‘भविष्य के लिए समझौता’ अपनाया। इसमें सतत विकास, शांति, डिजिटल सहयोग, युवा पीढ़ी और वैश्विक शासन में सुधार जैसे विषय शामिल किए गए। यह इस बात का संकेत है कि संयुक्त राष्ट्र के सदस्य बदलती चुनौतियों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय सहयोग को आगे बढ़ाने की जरूरत स्वीकार करते हैं। लेकिन किसी समझौते की वास्तविक सफलता उसके उद्देश्यों के क्रियान्वयन से ही मापी जाएगी।

भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र क्यों महत्वपूर्ण है

भारत के लिए संयुक्त राष्ट्र का महत्व केवल एक अंतरराष्ट्रीय मंच की सदस्यता तक सीमित नहीं है। भारत की विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता, संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और विकासशील देशों के हितों की रक्षा महत्वपूर्ण विषय रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र ऐसा मंच प्रदान करता है, जहां भारत अपनी प्राथमिकताओं को सामने रख सकता है और विभिन्न देशों के साथ साझा मुद्दों पर सहयोग कर सकता है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में लंबे समय से सैनिकों और अन्य कर्मियों का योगदान दिया है। साथ ही, वह सुरक्षा परिषद में सुधार और अधिक प्रतिनिधित्व की मांग करता रहा है। भारत के लिए यह अवसर भी है कि वह वैश्विक स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, तकनीक और विकास से जुड़े मुद्दों पर विकासशील देशों की चिंताओं को सामने रखे।

फिर भी संयुक्त राष्ट्र से हर विवाद का समाधान हो जाने की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं होगा। किसी भी अंतरराष्ट्रीय संस्था की सफलता सदस्य देशों की सहमति, संसाधनों और निर्णय लागू करने की इच्छा पर निर्भर करती है। भारत सहित सभी देशों के सामने चुनौती यह है कि वे राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए उन वैश्विक नियमों और संस्थाओं को भी मजबूत करें, जिनसे अंतरराष्ट्रीय स्थिरता और सहयोग को लाभ मिलता है।

प्रासंगिकता का नहीं, सुधार की जरूरत का सवाल

संयुक्त राष्ट्र की आलोचना जरूरी है, लेकिन उसकी सीमाओं को देखकर उसके महत्व को पूरी तरह खारिज कर देना समाधान नहीं है। यदि साझा अंतरराष्ट्रीय मंच कमजोर होता है, तो छोटे और कमजोर देशों के पास अपनी बात रखने के अवसर और सीमित हो सकते हैं। वैश्विक समस्याओं पर सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा और एकतरफा फैसलों का प्रभाव बढ़ सकता है।

इसलिए संयुक्त राष्ट्र में सुधार की जरूरत को तीन स्तरों पर समझना होगा। पहला, सुरक्षा परिषद को अधिक प्रतिनिधि बनाना और वीटो के इस्तेमाल में जवाबदेही बढ़ाना। दूसरा, शांति स्थापना, मानवीय सहायता और विकास कार्यक्रमों को पर्याप्त संसाधन तथा प्रभावी सहयोग उपलब्ध कराना। तीसरा, सदस्य देशों को अपने राजनीतिक मतभेदों के बावजूद अंतरराष्ट्रीय कानून और साझा प्रतिबद्धताओं का सम्मान करने के लिए तैयार करना।

अंततः संयुक्त राष्ट्र न तो दुनिया की सभी समस्याओं का जादुई समाधान है और न ही केवल औपचारिक बैठकों का मंच। उसकी उपयोगिता इस बात में है कि वह संवाद, सहयोग और नियम आधारित व्यवस्था के लिए अवसर उपलब्ध कराता है। लेकिन उस अवसर को परिणाम में बदलने की जिम्मेदारी सदस्य देशों की भी है। 24 अक्टूबर का दिन इसलिए केवल स्थापना की वर्षगांठ मनाने का अवसर नहीं होना चाहिए। यह सोचने का मौका भी है कि क्या दुनिया विवादों को बातचीत से सुलझाने के लिए पर्याप्त प्रयास कर रही है और क्या अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को आज की जरूरतों के अनुरूप बनाया जा रहा है।

संयुक्त राष्ट्र की असली परीक्षा इस बात में नहीं है कि दुनिया में मतभेद कितने हैं, बल्कि इस बात में है कि उन मतभेदों के बावजूद देश शांति, न्याय और मानवता के साझा हितों के लिए कितना सहयोग कर पाते हैं।