अशोक भाटिया
आधुनिकता की अंधी दौड़ और जमीन की सीमित उपलब्धता ने हमारे शहरों का भूगोल पूरी तरह बदल दिया है, जिसके परिणामस्वरूप कल तक जो शहर क्षैतिज रूप से फैलते थे, वे आज लंबवत यानी आसमान की तरफ भाग रहे हैं। कंक्रीट के ये ऊंचे-ऊंचे टॉवर, चमचमाती कांच की खिड़कियां और बादलों को छूती बहुमंजिला इमारतें आज तरक्की और वैश्विक पहचान का नया प्रतीक बन चुकी हैं, लेकिन इस तथाकथित भव्यता के पीछे एक ऐसा खौफनाक सच छिपा है जिससे हम अक्सर आंखें मूंद लेते हैं। वह कड़वा सच इन आसमान छूती इमारतों में बुनियादी सुरक्षा व्यवस्था का जमीनी स्तर पर पूरी तरह से नदारत होना है, जिसके कारण महानगरों की ये ऊंची इमारतें आज विकास का पैमाना कम और ‘लिविंग टाइम बम’ ज्यादा नजर आने लगी हैं। हाल ही में नोएडा के सेक्टर-94 स्थित सुपरनोवा (स्पायरा) बिल्डिंग की 43वीं मंजिल से एक युवक द्वारा छलांग लगाकर जान देने की खौफनाक घटना ने इस व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी है । आए दिन होने वाले हादसे, लिफ्ट में अचानक अटकती सांसें और गगनचुंबी टावरों की बालकनियों से गिरती मासूम जिंदगियां इस बात की गवाह हैं कि हम बहुमंजिला इमारतों के निर्माण और उनकी वास्तुकला में जितने आगे निकल चुके हैं, उनकी सुरक्षा के सबसे प्राथमिक मानकों में उतने ही आदिम युग में जी रहे हैं। बिल्डरों द्वारा विलासिता के नाम पर बेचे जाने वाले इन आलीशान कंक्रीट के महलों में रहने वाले लोग हर पल एक अनजाने खतरे के साए में जीने को मजबूर हैं, क्योंकि गगनचुंबी संरचनाओं का निर्माण करते समय सुरक्षा को पहली प्राथमिकता बनाने के बजाय उसे सबसे आखिरी पायदान पर धकेल दिया गया है, जो सीधे तौर पर एक बड़े मानवीय संकट को आमंत्रण दे रहा है।
किसी भी ऊंची इमारत के निर्माण के लिए देश में ‘नेशनल बिल्डिंग कोड’ और स्थानीय नागरिक निकायों द्वारा बेहद कड़े और स्पष्ट नियम तय किए गए हैं, जिनके तहत एक निश्चित ऊंचाई से अधिक की इमारत में अत्याधुनिक फायर फाइटिंग सिस्टम, दोहरे आपातकालीन निकास, स्वचालित स्प्रिंकलर, वैज्ञानिक वेंटिलेशन और उच्च स्तरीय भूकंपरोधी तकनीक का होना अनिवार्य है। लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत और भयावह नजर आती है क्योंकि अधिकांश मामलों में बिल्डर्स अपने मुनाफे को अधिकतम करने के चक्कर में सुरक्षा उपकरणों की गुणवत्ता से बहुत बड़ा समझौता करते हैं, जहां घटिया स्तर के फायर अलार्म, सूखी और जंग लगी पानी की पाइपलाइनें और केवल कागजों पर काम करने वाले स्प्रिंकलर सिस्टम इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। सबसे बड़ा और गंभीर सवाल प्रशासनिक जवाबदेही पर उठता है कि आखिर बिना किसी पुख्ता भौतिक जांच के इन गगनचुंबी इमारतों को स्थानीय प्रशासन द्वारा ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ और ‘ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट’ कैसे जारी कर दिया जाता है। नोएडा की हालिया घटना, जहां एक व्यक्ति आसानी से 43वीं मंजिल पर जाकर रेलिंग से लटक गया और कूद गया, यह स्पष्ट करती है कि इन सोसायटियों की आंतरिक सुरक्षा, बालकनी व छतों के सुरक्षा ग्रिल और निगरानी तंत्र में कितनी बड़ी चूक है। यह बिना किसी छिपे तथ्य के साफ है कि भ्रष्टाचार, लालफीताशाही और बिल्डर-प्रशासन का अपवित्र गठजोड़ मासूम नागरिकों की गाढ़ी कमाई और उनकी जिंदगी पर बहुत भारी पड़ रहा है, क्योंकि भ्रष्टाचार की इस कमजोर नींव पर खड़ी ऊंची इमारतें किसी भी दिन एक बड़े जनसंहार का कारण बन सकती हैं।
बहुमंजिला इमारतों में सबसे बड़ा, तात्कालिक और विनाशकारी खतरा आग का होता है और जैसे-जैसे इमारत की ऊंचाई बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे वहां राहत, बचाव और अग्निशमन कार्य करना अत्यधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण होता जाता है। भारतीय शहरों के अग्निशमन विभागों के पास आज भी 20-30 मंजिलों से ऊपर तक पहुंचने वाली हाइड्रोलिक सीढ़ियां और अत्याधुनिक उपकरण बेहद सीमित संख्या में हैं, जिसके कारण अगर किसी 40वीं या 50वीं मंजिल पर भीषण आग लग जाए, तो पूरी व्यवस्था आंतरिक सुरक्षा प्रणालियों पर निर्भर हो जाती है। विडंबना यह है कि अधिकांश आवासीय सोसायटियों में ये आंतरिक प्रणालियां रखरखाव के अभाव में पूरी तरह ठप पड़ी होती हैं, और इससे भी बदतर स्थिति यह है कि आपातकालीन सीढ़ियों को या तो स्थाई रूप से ताला मारकर बंद कर दिया जाता है या फिर वहां कबाड़ और फालतू सामान भरकर उन्हें पूरी तरह अवरुद्ध कर दिया जाता है। आग लगने की स्थिति में लिफ्ट का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित होता है, और जब आपातकालीन सीढ़ियां भी बंद या अवरुद्ध मिलती हैं, तो ऊपरी मंजिलों पर रहने वाले लोग एक तरह से मौत के जाल में पूरी तरह फंस जाते हैं, जहां जहरीले धुएं और वेंटिलेशन की कमी के कारण आग की लपटों से ज्यादा दम घुटने से मौतें होती हैं, जो यह साबित करने के लिए काफी है कि आधुनिक वास्तुकला में इंसानी सुरक्षा को कितनी बेरहमी से नजरअंदाज किया गया है।
ऊंची इमारतों में रहने वाले लोगों की दैनिक जिंदगी पूरी तरह से लिफ्ट की आवाजाही पर टिकी होती है क्योंकि बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बीमार लोगों के लिए गगनचुंबी टावरों में यह ऊपर-नीचे जाने का एकमात्र सहारा है, लेकिन आज यही लिफ्ट जीवन रेखा कम और रोजमर्रा के खौफ का दूसरा नाम बन चुकी हैं। देश के विभिन्न हिस्सों से आए दिन लिफ्ट के अचानक अनियंत्रित होकर गिरने, मंजिलों के बीच में अटक जाने या तकनीकी खराबी के कारण घंटों तक उसमें मासूम लोगों के फंसे रहने की दिल दहला देने वाली खबरें आती रहती हैं। कई सोसायटियों में ‘ऑटोमैटिक रेस्क्यू डिवाइस’ या तो स्थापित ही नहीं किए जाते या फिर बिजली बचाने और मेंटेनेंस का खर्च कम करने के नाम पर उन्हें बंद रखा जाता है, जिसके कारण बिजली गुल होने की स्थिति में लिफ्ट में हवा और रोशनी तुरंत बंद हो जाती है और लोग गंभीर मानसिक व शारीरिक आघात के शिकार हो जाते हैं। लिफ्ट का नियमित, प्रमाणित और कड़ा सुरक्षा ऑडिट न कराना सीधे तौर पर सोसायटियों के बिल्डरों और मेंटेनेंस एजेंसियों की आपराधिक लापरवाही की श्रेणी में आता है, क्योंकि वे जानते हैं कि उनकी यह सुस्ती और अनदेखी किसी भी दिन किसी बेकसूर की जान ले सकती है, फिर भी वे मुनाफे की हवस में अंधे बने हुए हैं।
सुरक्षा व्यवस्था केवल आलीशान और आधुनिक उपकरणों को दीवारों पर टांग देने से पूरी नहीं होती, बल्कि संकट के समय उनका सही और त्वरित उपयोग करना आना भी उतना ही जरूरी है, लेकिन सच्चाई यह है कि गगनचुंबी इमारतों में रहने वाले हजारों निवासियों को यह बुनियादी ज्ञान भी नहीं होता कि किसी आपदा के समय उन्हें खुद को कैसे बचाना है। नियमतः हर छह महीने में पूरी सोसाइटी के लिए अग्निशमन विभाग की देखरेख में ‘मॉक ड्रिल’ का अनिवार्य आयोजन होना चाहिए, जिसमें आग, भूकंप या लिफ्ट संकट से निपटने का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए, परंतु आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में न तो रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशंस इसके लिए गंभीर हैं और न ही निवासी खुद इसमें रुचि लेते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि सोसायटियों के सुरक्षा गार्ड्स और मेंटेनेंस स्टाफ को आपदा प्रबंधन की बुनियादी समझ नहीं होती; नोएडा की घटना में पास ही काम कर रहे एसी तकनीशियनों ने तो प्रयास किया, लेकिन पूरी बिल्डिंग का सुरक्षा तंत्र मूकदर्शक बना रहा। यह सामूहिक अज्ञानता और अकर्मण्यता संकट के समय भयानक भगदड़ और बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान का मुख्य कारण बनती है, जिसे समय रहते सुधारा नहीं गया तो परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना होगा।
भारत के कई प्रमुख महानगर, विशेषकर दिल्ली-एनसीआर और उसके आस-पास के क्षेत्र, भूकंप के अत्यधिक संवेदनशील जोन के अंतर्गत आते हैं, इसके बावजूद इन क्षेत्रों में बिना किसी दूरदर्शिता के धड़ल्ले से 30 से 50 मंजिला इमारतें खड़ी की जा रही हैं जो सीधे तौर पर प्रकृति को चुनौती देने जैसा है। क्या ये गगनचुंबी इमारतें वास्तव में भूकंपरोधी तकनीकों से निर्मित हैं, इस यक्ष प्रश्न का कोई भी प्रामाणिक और वैज्ञानिक उत्तर न तो बिल्डरों के पास है और न ही उन्हें मंजूरी देने वाले स्थानीय प्राधिकरणों के पास क्योंकि स्ट्रक्चरल सेफ्टी की नियमित जांच का हमारे देश में कोई पुख्ता तंत्र ही मौजूद नहीं है। निर्माण के समय उपयोग की जाने वाली निर्माण सामग्री, जैसे सीमेंट, सरिया और कंक्रीट की गुणवत्ता की जांच केवल कागजी खानापूर्ति और फाइलों को बंद करने तक सीमित होती है, जिससे इमारतों की आंतरिक संरचना कमजोर रह जाती है। यदि आने वाले समय में इन घने बसे क्षेत्रों में कोई मध्यम या तीव्र तीव्रता का भूकंप आता है, तो इन गगनचुंबी इमारतों का क्या हश्र होगा और कंक्रीट के ये ऊंचे पहाड़ कितनी बड़ी तबाही लाएंगे, इसकी कल्पना मात्र से रूह कांप जाती है क्योंकि इन निर्माणों ने पर्यावरण और भूमिगत जल स्तर को भी गंभीर नुकसान पहुंचाया है।
इस आसन्न और भयावह संकट से पार पाने के लिए अब केवल खोखले आश्वासनों, जांच कमेटियों के गठन और कागजी खानापूर्ति से काम नहीं चलेगा, बल्कि हमें तुरंत प्रभाव से बेहद कड़े और सुधारात्मक कदम उठाने होंगे जिसके तहत सुरक्षा मानकों का उल्लंघन करने वाले बिल्डर्स, आर्किटेक्ट्स और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं में आपराधिक मुकदमे दर्ज कर जेल की सजा का प्रावधान होना चाहिए। इसके साथ ही, हर छह महीने या एक साल में प्रत्येक बहुमंजिला इमारत का एक स्वतंत्र, सरकारी मान्यता प्राप्त थर्ड-पार्टी एजेंसी द्वारा ‘स्ट्रक्चरल और फायर सेफ्टी ऑडिट’ होना अनिवार्य किया जाए और उसकी विस्तृत रिपोर्ट को ऑनलाइन सार्वजनिक किया जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।





