मोदी के 25 वर्ष : निर्णायक नेतृत्व से बदलते भारत तक

25 years of Modi: From decisive leadership to changing India

गुजरात के मुख्यमंत्री से देश के प्रधानमंत्री तक ढाई दशक की शासन-यात्रा, कैबिनेट के फैसलों में दिखाई देती नीति-निरंतरता और विकसित भारत के संकल्प की कहानी

विनोद सिंह ‘तकियावाला’

भारत की राजनीति में ढाई दशक का समय किसी भी नेतृत्व की कार्यशैली, सोच और प्रशासनिक क्षमता को परखने के लिए पर्याप्त होता है। नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन में शासन के 25 वर्ष पूरे होना इसी दृष्टि से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में जिम्मेदारी संभालने से शुरू हुई यह यात्रा आज प्रधानमंत्री के रूप में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की दिशा तय करने वाले नेतृत्व तक पहुंच चुकी है। इस लंबे कालखंड को केवल चुनावी सफलताओं के आधार पर नहीं, बल्कि शासन की निरंतरता, नीतिगत फैसलों और उनके दूरगामी प्रभावों के संदर्भ में देखना अधिक महत्वपूर्ण है।

प्रधानमंत्री मोदी की शासन शैली की एक प्रमुख विशेषता निर्णय लेने की स्पष्टता रही है। कैबिनेट की बैठकें इसी प्रशासनिक दृष्टिकोण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। प्रत्येक कैबिनेट निर्णय अपने आप में केवल एक सरकारी प्रस्ताव की स्वीकृति नहीं होता, बल्कि वह सरकार की प्राथमिकताओं और भविष्य की दिशा का संकेत भी देता है। कैबिनेट ब्रीफिंग के माध्यम से जब सरकार अपने निर्णयों को देश के सामने रखती है तो उसमें अर्थव्यवस्था, आधारभूत ढांचा, ऊर्जा, शिक्षा, रोजगार, कृषि, सामाजिक सुरक्षा, विज्ञान-तकनीक और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे अनेक क्षेत्रों की समग्र तस्वीर दिखाई देती है।

मोदी के 25 वर्षों की शासन यात्रा को समझने के लिए गुजरात का दौर महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने प्रशासन को विकास की प्रयोगशाला के रूप में आगे बढ़ाया। आधारभूत संरचना, निवेश, औद्योगिक विकास, बिजली, सड़क और प्रशासनिक प्रक्रियाओं में बदलाव पर जोर दिया गया। यही अनुभव बाद में केंद्र की नीतियों में भी दिखाई दिया। प्रधानमंत्री बनने के बाद शासन का दायरा गुजरात से निकलकर पूरे देश तक पहुंचा और निर्णयों का पैमाना भी उसी अनुपात में बढ़ा।

2014 के बाद केंद्र सरकार की कार्यशैली में कैबिनेट के फैसलों को मिशन आधारित दृष्टिकोण से जोड़ने की कोशिश स्पष्ट दिखाई दी। जनधन से वित्तीय समावेशन, स्वच्छ भारत से स्वच्छता, उज्ज्वला से रसोई गैस, आयुष्मान भारत से स्वास्थ्य सुरक्षा, प्रधानमंत्री आवास योजना से आवास, जल जीवन मिशन से नल से जल और डिजिटल इंडिया से डिजिटल सेवाओं तक अनेक योजनाओं ने शासन को सीधे नागरिकों के जीवन से जोड़ने का प्रयास किया।

मोदी सरकार की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों को समयबद्ध कार्यक्रमों में बदलने की रही है। आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, राष्ट्रीय अवसंरचना पाइपलाइन, गति शक्ति, सेमीकंडक्टर निर्माण, हरित ऊर्जा और विकसित भारत 2047 जैसे अभियानों में इसी सोच की झलक मिलती है। हाल के वर्षों में कैबिनेट के निर्णयों में भी उत्पादन क्षमता बढ़ाने, लॉजिस्टिक्स को मजबूत करने, रेलवे और राजमार्गों का विस्तार करने तथा नवीकरणीय ऊर्जा को गति देने पर लगातार जोर दिखाई देता है।

भारत के बुनियादी ढांचे में आया परिवर्तन इस यात्रा का महत्वपूर्ण अध्याय है। रेलवे के आधुनिकीकरण से लेकर समर्पित माल गलियारों, वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनों, नए हवाई अड्डों, एक्सप्रेसवे, बंदरगाहों और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी तक विकास का एक व्यापक नेटवर्क तैयार हुआ है। कैबिनेट द्वारा परियोजनाओं को मंजूरी देने के बाद उनके क्रियान्वयन की निगरानी और समयबद्ध पूरा करने पर भी सरकार का जोर रहा है। इससे शासन में केवल घोषणा के बजाय परिणाम को महत्व देने की प्रवृत्ति मजबूत हुई है।

ऊर्जा क्षेत्र में भी पिछले वर्षों में नीति का फोकस बदलता दिखाई दिया है। भारत की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में आगे बढ़ना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल हुआ है। सौर ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, बैटरी भंडारण और ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर जैसे कार्यक्रम भारत को भविष्य की ऊर्जा अर्थव्यवस्था के लिए तैयार करने की कोशिश हैं। यह परिवर्तन केवल पर्यावरणीय चिंता तक सीमित नहीं है, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, रोजगार, निवेश और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा से भी जुड़ा हुआ है।

डिजिटल शासन ने भी मोदी युग की प्रशासनिक पहचान बनाई है। आधार, मोबाइल और बैंक खाते के त्रिकोण से लेकर डिजिटल भुगतान, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और सरकारी सेवाओं के ऑनलाइन विस्तार तक तकनीक को शासन का माध्यम बनाया गया। कोविड-19 के कठिन दौर में डिजिटल प्रणालियों ने सरकारी सहायता, टीकाकरण और भुगतान व्यवस्था को बड़े पैमाने पर संचालित करने में भूमिका निभाई। आज भारत का डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना मॉडल दुनिया में चर्चा का विषय है।

विदेश नीति के क्षेत्र में भी पिछले 25 वर्षों की यात्रा को अलग दृष्टि से देखा जा सकता है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में निवेश और वैश्विक संपर्क पर जोर देने वाले नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में भारत की कूटनीतिक पहुंच को व्यापक बनाया। भारत ने एक ओर अमेरिका, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के साथ रणनीतिक संबंध मजबूत किए, वहीं दूसरी ओर रूस, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ भी सक्रिय संबंध बनाए रखे। जी-20 की अध्यक्षता और भारत की वैश्विक भूमिका ने इस कूटनीतिक विस्तार को नई पहचान दी।

मोदी के शासन के 25 वर्ष केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं हैं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों और फैसलों का मूल्यांकन निरंतर होना चाहिए। रोजगार, कृषि आय, सामाजिक असमानता, महंगाई, संस्थागत जवाबदेही और नीतियों के जमीनी क्रियान्वयन जैसे सवाल लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा बने रहेंगे। यही लोकतंत्र की शक्ति है कि उपलब्धियों के साथ चुनौतियों पर भी चर्चा होती रहे।

फिर भी यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि ढाई दशक तक लगातार सत्ता और शासन की जिम्मेदारी संभालने वाले भारतीय नेताओं की सूची बहुत छोटी है। नरेंद्र मोदी का राजनीतिक जीवन इसलिए भी विशिष्ट है कि उन्होंने राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर लंबे समय तक प्रशासन चलाया है।

मुख्यमंत्री के रूप में प्राप्त अनुभव ने प्रधानमंत्री के रूप में उनकी शासन शैली को प्रभावित किया और प्रधानमंत्री के रूप में प्राप्त राष्ट्रीय अनुभव ने भारत की विकास यात्रा को एक व्यापक वैश्विक संदर्भ दिया।

आज कैबिनेट ब्रीफिंग में जब किसी नई परियोजना, नीति या सुधार की घोषणा होती है तो उसके पीछे केवल तत्कालीन आवश्यकता नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की अर्थव्यवस्था और समाज को प्रभावित करने वाली सोच भी दिखाई देती है। यही कारण है कि कैबिनेट के फैसलों को मोदी के 25 वर्षों के शासन-अनुभव से जोड़कर देखना उपयोगी है। इन फैसलों में निरंतरता, विस्तार और भविष्य की तैयारी—तीनों तत्व दिखाई देते हैं।
ढाई दशक की यह यात्रा अब एक नए चरण में प्रवेश कर रही है। विकसित भारत 2047 का लक्ष्य सामने है। अगले वर्षों में भारत को दुनिया की प्रमुख आर्थिक शक्ति बनाने, विनिर्माण और तकनीक में आत्मनिर्भरता बढ़ाने, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने, हरित ऊर्जा की ओर बढ़ने और आधारभूत ढांचे को विश्वस्तरीय बनाने की चुनौती है। इन लक्ष्यों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नीतियां कितनी प्रभावी ढंग से जमीन पर उतरती हैं और शासन व्यवस्था कितनी जवाबदेह तथा जनकेंद्रित रहती है।

नरेंद्र मोदी के शासन के 25 वर्षों का सबसे बड़ा निष्कर्ष यही है कि उन्होंने भारतीय राजनीति में दीर्घकालिक लक्ष्य, निर्णायक निर्णय और प्रशासनिक निरंतरता को एक साथ जोड़ने की कोशिश की है। गुजरात से शुरू हुई यात्रा दिल्ली तक पहुंची और अब उसका लक्ष्य विकसित भारत है। कैबिनेट के निर्णय इस यात्रा के तत्कालीन पड़ाव हैं, जबकि 2047 का संकल्प उसकी दीर्घकालिक मंजिल।

इसलिए मोदी के 25 वर्ष केवल एक राजनीतिक उपलब्धि का आंकड़ा नहीं, बल्कि भारतीय शासन व्यवस्था में आए बदलावों को देखने की एक महत्वपूर्ण खिड़की हैं।आने वाला समय इन फैसलों और नीतियों के अंतिम परिणामों का मूल्यांकन करेगा, लेकिन यह निर्विवाद है कि पिछले 25 वर्षों में नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति और शासन की कार्यशैली पर अपनी एक अलग छाप छोड़ी है।