राष्ट्र निर्माता शिक्षक का सम्मान एक ही दिन क्यों?

Why honor the nation-building teacher on just one day?

डॉ. अशोक कुमार भार्गव, पूर्व आईएएस,मप्र

शिक्षक दिवस राष्ट्र निर्माता शिक्षकों के नमन का दिन है जो ज्ञान की रोशनी से विद्यार्थियों को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाते हैं। जो अपने विद्यार्थियों के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए निस्वार्थ भाव से अपना वर्तमान समर्पित कर देते हैं। वे जो वर्तमान पीढ़ी के व्यक्तित्व को परिष्कृत कर राष्ट्र के भविष्य को स्वर्णिम बनाते हैं। वे शिक्षक जो जीवन संग्राम में आने वाली चुनौतियों का सामना करने की सामर्थ्य अपने विद्यार्थियों में सृजित करते हैं। इन्हीं शिक्षकों की गरिमा और यश को गौरान्वित करने का दिवस है शिक्षक दिवस। शिक्षकों के श्रेष्ठतम कार्यों का मूल्यांकन कर उन्हें सार्वजनिक रूप से अलंकृत करने का संकल्प दिवस है शिक्षक दिवस।

निसंदेह किसी भी राष्ट्र के विकास की नींव राष्ट्र निर्माता शिक्षक ही होते हैं। इसीलिए भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षकों को परमेश्वर से भी पहले सम्मान दिया गया है क्योंकि शिक्षक अपने विद्यार्थियों के हृदय में शुभ संस्कारों के सर्जक के नाते ब्रह्मा हैं। उनके रक्षण वर्धन के नाते विष्णु और अशुभ संस्कारों, अन्तरविकारों को नष्ट करने के कारण शिव है अर्थात ब्रह्मा विष्णु और महेश के समन्वित स्वरूप का दूसरा नाम ही गुरु है। जिस प्रकार कुम्हार बाहर से घड़े को ठोकता पीटता है तथा भीतर से हाथ का सहारा देकर खोट निकालकर लोकोपयोगी घट का निर्माण करता है। उसी प्रकार आदर्श शिक्षक भीतर से अपनी सहानुभूति का सहारा देता हुआ ऊपर से आवश्यकतानुसार चोट मारकर गढ गढ कर अपने शिष्य का शुभ निर्माण करता है। कबीरदासजी कहते हैं ” गुरु कुम्हार सिख कुंभ है, गढि गढ़ि काढै खोट। अंतर हाथ सहारे दै, बाहर- बाहर चोट।” ऐसे सुनिर्मित विद्यार्थी ही राष्ट्र के भावी कर्णधार और राष्ट्र निर्माता होते हैं। यदि शिक्षक अपने छात्रों का निर्माण ठीक से न करें तो उसकी गलती राष्ट्र के भविष्य में झलकती है। महर्षि अरविंद ने ठीक ही कहा है अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुरमाली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच सींच कर महाप्राण शक्तियांञ बनाते हैं। इसलिए विद्यार्थियों को भी यह समझ लेना चाहिए की “यह तन विष की बैलरी गुरु अमरित की खान, सीस दिए जो गुरु मिले तो भी सस्ता जान।

डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन महान दार्शनिक, शिक्षक और भारत के द्वितीय राष्ट्रपति थे। इन्होंने कबीरदास की भांति शिक्षकों की महिमा को मंडित करने के लिए अपने प्रशंसकों द्वारा उनका जन्मदिवस सार्वजनिक रूप से मनाने के आग्रह पर अपना जन्मदिवस शिक्षकों के नाम समर्पित कर दिया। और 1962 से प्रति वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाने लगा। किसी भी राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में शिक्षकों की भूमिका अप्रतिम होती है जैसा कि चाणक्य ने स्पष्ट कहा है ‘ शिक्षक कभी साधारण नहीं होता प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।’ डॉ. राधाकृष्णन कहते हैं कि शिक्षक एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को बौद्धिक परंपराएं और तकनीकी कौशल पहुंचाने का केंद्र है। हेनरी ब्रुक्स एडम्स का कहना है कि ‘ एक शिक्षक अनंत काल को प्रभावित करता है, वह कभी नहीं बता सकता कि उसका प्रभाव कहां रुकता है।’

डॉ.भीमराव अंबेडकर ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव, अधिकार प्राप्ति और मुक्ति का सबसे शक्तिशाली साधन माना। उनकी दृष्टि में शिक्षक राष्ट्र रूपी रथ का सारथी है नौकरी करने वाला मास्टर नहीं। शिक्षा केवल किताबों से ही नहीं मिलती, वह शिक्षक के आचरण और व्यवहार से भी मिलती है। इसलिए शिक्षक में करुणा, समता और बंधुता का भाव होना चाहिए। वह प्रज्ञावान शीलवान और लोकतांत्रिक मूल्यों में आस्था रखने वाला योग्य शिक्षक होना चाहिए। जिस धरा पर कबीर ने गुरु की महिमा को गोविंद से पहले ये कह कर मंडित किया कि ‘हरि रूठै गुरु ठौर है, गुरु रूठै नहीं ठौर, उसी धरा पर क्या शिक्षकों की गरिमा का सम्मान सिर्फ एक दिन होना चाहिए? क्या ये संभव नहीं है कि शिक्षक जो न केवल राष्ट्र निर्माता चरित्र निर्माता हैं उसकी महिमा का सम्मान निरंतर करें क्योंकि राष्ट्र का निर्माण सिर्फ एक दिन में नहीं होता है, वरन उसके लिए अनवरत साधना होती है और शिक्षक भी किसी एक दिन में ही अपने विद्यार्थियों को संपूर्ण नहीं बना देते, वरन वे प्रतिदिन इस दिशा में समर्पण भाव से क्रियाशील रहते हैं। अतः ऐसे आदर्श शिक्षक ही वर्ष में सिर्फ एक दिन नहीं वरन प्रतिदिन प्रतिपल प्रतिक्षण सम्मान के पात्र होते हैं।

भारत की सांस्कृतिक चेतना में शिक्षा और समाज का शाश्वत संबंध रहा है। सभ्यता के प्रारंभ से ही वैविध्यपूर्ण भारतीय समाज में धर्म, दर्शन और शिक्षा राष्ट्र की बुनियाद रही है। नालंदा,तक्षशिला, विक्रमशिला भारतीय शिक्षा पद्धति के गौरवशाली बौद्धिक स्मारक हैं। प्राचीन शिक्षा पद्धति पर वेदों, उपनिषदों,पुराणों आदि के जीवन दर्शन की स्पष्ट छाप थी। भारतीय मनीषियों ने उस समय जब बालक अपनी शिक्षा समाप्त कर गुरु की आज्ञा से गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होता था समाज अभिनंदन करता था। गुरु और शिष्य का आदर्शात्मक संबंध अलौकिक था।नगर के कोलाहल से दूर गुरुकुल व्यवस्था में संघर्षों से मुक्त बौद्धिक शक्ति, चरित्र बल और आध्यात्मिक चेतना से संपन्न हो कर सांसारिक जीवन में उनका प्रवेश अर्थ धर्म काम और मोक्ष के पुरुषार्थ की सिद्धि में सहायक होकर पूर्ण मनुष्य का निर्माण करने वाली थी। किन्तु मध्यकालीन भारतीय समाज में शिक्षा प्रदान करने के प्रमुख माध्यम मकतबा और मदरसा बने रहे जिसके कारण शिक्षा का क्षेत्र बहुत सीमित हो गया। इसके पश्चात आए अंग्रेजों ने शिक्षा के रहे सहे अस्तित्व को भी विकृत कर दिया। अंग्रेज भारतीयों को वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा देने के पक्ष में नहीं थे। सन 1835 में मैकाले ने कहा कि हमें एक ऐसा वर्ग पैदा करना चाहिए जो हमारे और करोड़ों लोगों के बीच जिन पर हम शासन करते हैं, दुभाषिये का काम कर सके। ऐसे व्यक्तियों का वर्ग जो रंग और रक्त से भारतीय हो किन्तु रुचियों, विचारों, नैतिकता और बुद्धि में अंग्रेज हों।

आज़ादी के बाद देश में शिक्षा के बहु आयामी विकास के लिए अनेक स्तरों पर पहल की गई, किंतु मुख्य प्राथमिकता गुणात्मक शिक्षा के स्थान पर परिमाणात्मक विकास पर केंद्रित होने से शिक्षा का चरित्र उपनिवेशवादी बना रहा। आधुनिक राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत की आत्मा और भारतीयता की उद्घोषणा है। यह ऐसी प्रथम शिक्षा नीति है जो भारतीय व्यक्तियों के विचारों के अनुकूल है। हमारे होनहार बच्चों में ज्ञान विज्ञान के मूल स्रोत को जागृत करना इस नीति का मुख्य ध्येय है।यह नीति अंग्रेजों की उस साजिश को भी समाप्त करने का कार्य करती है जिसमें उन्होने भाषा के आधार पर भारतीयों में हीन भावना पैदा करने का प्रयास किया था। यह नीति नागरिक आकांक्षाओं का प्रतिबिंब और भविष्य के भारत की नींव है।

शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहने भर से राष्ट्र का निर्माण नहीं होता जब तक कि शिक्षक को अपने दायित्व निर्वहन में पूरी आज़ादी न दी जाए। शिक्षकों के सामाजिक आर्थिक शैक्षणिक उत्थान के बिना राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव नहीं है। शिक्षक यदि तनाव से मुक्त आनन्द से युक्त और व्यर्थ की गुलामी से मुक्त है , राजनीति के विषैले वातावरण से ग्रस्त नहीं है,प्रशासन के अनावश्यक हस्तक्षेप से मुक्त है तभी वह शिक्षा को सही अर्थों में घटित कर सकता है। अन्यथा वह अपने शिक्षकीय दायित्व के साथ न्याय नहीं कर सकेगा। यह कटु सत्य है कि शिक्षक यदि भूखा है तो समझिए ज्ञान का सागर भी सूखा है।

मेरी दृष्टि में शिक्षकीय दायित्व बहुत पवित्र किन्तु कठिन है। गगन को चूमती हुई अट्टालिकाओं को निर्मित करना सरल है। उफनती नदी के वेग को नियंत्रित कर नहरें निर्मित करना भी सरल है। चट्टानों के सीने चीर कर सड़कें बनाना भी सरल है, किंतु राष्ट्र के लिए एक आदर्श और उपयोगी पीढ़ी को निर्मित करना बहुत कठिन है। और यह कठिन दायित्व हमारे प्रथम गुरु पूज्य माता और पिता के बाद शिक्षक निभा रहे हैं। यह सही है कि हमारे हाथों की उंगलियां एक जैसी नहीं होती। किसी तालाब में कुछ गंदी मछलियाँ हों तो वह पूरा तालाब गंदा नहीं हो जाता। शिक्षकीय समुदाय संख्या की दृष्टि से बहुत विशाल है। हो सकता है कि कुछ शिक्षक अपने निजी स्वार्थ के लिए राजनीति के विषैले माहौल में रहते हों। कुछ शिक्षक निष्ठा से अपने दायित्व का निर्वहन भी नहीं करते। समय पर विद्यालय नहीं आते। कुछ साधारण शिक्षक हैं जो पढ़ाते हैं। कुछ श्रेष्ठ शिक्षक हैं जो व्याख्या करते हैं और कुछ उत्कृष्ट शिक्षक भी हैं जो छात्रों के मन में सीखने की जिज्ञासा पैदा करते हैं ।अतः हम समग्र शिक्षक समुदाय को लांछित नहीं कर सकते। वे शिक्षक जो अपने कर्तव्यों के प्रति उदासीन और लापरवाह है उनके विरुद्ध कार्रवाई के पर्याप्त प्रावधानों से ठीक किया जा सकता है।

सोशल मीडिया, इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के चमत्कारी दौर में भी शिक्षक अनेक चुनौतियों और विषमताओं के बावजूद ज्ञान की रश्मियों से अपने विद्यार्थियों को आलोकित कर।उनमें जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने का जीवट सृजित कर रहे हैं। उनके चिंतन के क्षितिज का विस्तार कर उनके विचारों के वैभव को निखार रहे हैं। तभी तो यह देश आगे बढ़ रहा है प्रगति कर रहा है। आज हमारे देश में विभिन्न क्षेत्रों में वैश्विक स्तर पर उपलब्धियों के जो नित नए आयाम स्थापित हो रहे हैं उसकी बुनियाद में कहीं न कहीं हमारे शिक्षकों का समर्पण भी है। तो ऐसी स्थिति में शिक्षकों का सम्मान सिर्फ एक दिन ही क्योंवर्ष के बाकी 364 दिन क्यों नहीं होना चाहिए। हमारे देश में ऐसे आदर्श शिक्षकों की कमी नहीं है जिनका जीवन प्रेरणा और प्रोत्साहन का प्रकाश स्तम्भ है। एक विद्यालय तीन विद्यार्थी विलंब से पहुंचे, तब तक प्रार्थना समाप्त हो चुकी थी। स्कूल के प्राचार्य ने इन चारों को स्कूल के मैदान में तीन चक्कर लगाने की सजा दी। तीनों विद्यार्थी प्राचार्य के आदेश के पालन में मैदान के चक्कर लगाना शुरू कर दिए। दो चक्कर लगाने के बाद उन्होंने देखा कि उनके पीछे पीछे प्राचार्य भी हांफते हुए दौड़ रहे हैं। छात्रों ने रुककर प्राचार्य से पूछा सर आप किस लिए दौड़ रहे हैं? हम आपके आदेश का पालन कर तो रहे हैं। तब प्राचार्य ने जो उत्तर दिया वह उनके आदर्श चरित्र की पराकाष्ठा का है। प्राचार्य ने कहा कि मेरी तमाम कोशिशों के बाद भी यदि मैं छात्रों को अनुशासन और समय की महत्ता नहीं समझा सका तो इसका अर्थ ये हुआ कि मेरे प्रयासों में ही कहीं त्रुटि है। इसलिए जितनी गलती आपकी है उससे ज्यादा मेरी गलती है। चूंकि मुझे कोई सजा नहीं दे सकता इसलिए मैंने अपनी सजा खुद ही तय कर दी है और जब तक मैं इस स्कूल के विद्यार्थियों को समय का अनुशासन नहीं समझा पाऊंगा तब तक मैं भी उनके साथ मैदान के चक्कर लगाऊंगा। क्या ऐसे आदर्श शिक्षक के सम्मान में हमें श्रद्धावनत नहीं होना चाहिए।