निर्मल रानी
चुनावी धांधली और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर पिछले 13 दिनों से राजधानी दिल्ली लगातार प्रदर्शनों से जूझ रही है। 10 अक्टूबर को जहां कॉकरोच जनता पार्टी ने विपक्षी दलों के समर्थन से जंतर मंतर सहित दिल्ली के कई प्रमुख स्थलों पर बड़े प्रदर्शन किये वहीँ 12 अक्टूबर का दिन विपक्षी इण्डिया गठबंधन द्वारा बुलाये गए विशाल रैली व प्रदर्शन के नाम रहा। 12 अक्टूबर के इस अभूतपूर्व प्रदर्शन को विपक्षी दलों की सबसे बड़ी रैली व प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। इस रैली व प्रदर्शन में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे,राहुल गाँधी,प्रियंका गाँधी,विपक्ष-शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के अतिरिक्त समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव , एन सी पी नेता सुप्रिया सुले, शिवसेना के संजय राउत, सी पी आई एम एल के दीपांकर भट्टाचार्य,आर जे डी के तेजस्वी यादव, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी आदि अनेक बड़े नेता शामिल हुये। इस प्रदर्शन के दौरान भी जब दिल्ली पुलिस ने बैरिकेड्स लगाकर नेताओं को रोकने की कोशिश की, तो अखिलेश यादव, महुआ मोइत्रा, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई नेता बैरिकेड्स पर चढ़ गए, जिसके बाद पुलिस ने कई प्रमुख नेताओं को हिरासत में भी लिया। बाद में राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दल इस मामले को लेकर याचिका दायर करने सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
इस प्रदर्शन को रोकने या इसे विफल करने के लिये सरकार की ओर से हर संभव प्रयास किये गए। बल प्रयोग से लेकर,सड़कों पर नुकीली कीलें बिछाने, प्रदर्शनकारियों से लेकर अनेक आम राहगीरों तक को गिरफ़्तार करने की अनेक घटनाएं देखने को मिलीं। कनाट प्लेस से लेकर संसद भवन तक का इलाक़ा पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया। देश के इतिहास का यह पहला प्रदर्शन था जिसे कवर करने से रोकने की ग़रज़ से अनेक प्रमुख मीडिया घरानों के पत्रकारों से लेकर कई स्वतंत्र व सोशल मीडिया जर्नलिस्ट्स व यू ट्यूबर्स को भी हिरासत में लिया गया। कई के साथ मारपीट भी की गयी। बी बी सी सहित अनेक पत्रकारों के साथ पुलिस बदसलूकी से पेश आती दिखाई दी। जिन मीडिया संस्थानों के पत्रकारों को दिल्ली में प्रदर्शन कवर करने के दौरान पुलिस ने हिरासत में लिया था उनमें बिज़नेस स्टैंडर्ड,नवभारत टाइम्स,रॉयटर्स के अलावा स्क्रॉल, न्यूज़ लॉन्ड्री,बूम,एमओ,मॉलिटिक्स इंडिया,उल्टा चश्मा आदि के कई पत्रकार शामिल हैं। जाने माने पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता को भी दिल्ली में जबरन हिरासत में लिया गया जबकि ऑल्ट न्यूज़ के पत्रकार को अहमदाबाद में व स्क्रॉल के एक अन्य पत्रकार को पुणे में हिरासत में लिया गया। नवरात्रि के पहले ही दिन हो रहे इस आंदोलन में “कई महिला पत्रकारों को पीटा,घसीटा गया और हिरासत में लिया गया। यहाँ तक कि कई महिला पत्रकारों ने तो पुलिस पर यौन हमले का भी आरोप लगाया। सवाल यह है कि क्या जनहित के कार्यक्रमों को कवर करना कोई अपराध है जिसकी वजह से पुलिस को यह सब करना पड़ा ? जबकि इस प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए गए पत्रकार पेशेवर तरीक़े से अपना काम अंजाम दे रहे थे? भारत का संविधान पत्रकारों के रिपोर्टिंग करने, सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने और जनहित के मुद्दों को नागरिकों के सामने लाने के अधिकार की रक्षा करता है। अनुच्छेद 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है और प्रेस की स्वतंत्रता को भी इसी अनुच्छेद का हिस्सा माना गया है। ऐसे में क़ानून व्यवस्था के नाम पर इस तरह का तानाशाही रवैय्या ग़ैर संवैधानिक नहीं तो और क्या है ? क्या इसी भारत को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने न केवल ‘मदर ऑफ़ डेमोक्रेसी’, बताया था बल्कि अपनी बातों के समर्थन में मीडिया से जुड़े कुछ आंकड़े भी बताए थे ?
पिछले दिनों प्रदर्शन के दौरान जंतर मंतर,कनॉट प्लेस व संसद मार्ग आदि कई जगहों पर जिसतरह से पत्रकारों के साथ पेश आया गया उसने तो उस आपातकाल के ज़ुल्म को भी पीछे छोड़ दिया जिसे लेकर वर्तमान सरकार कांग्रेस को आज भी घेरती रहती है। लोकतान्त्रिक सरकार होने का दावा करने वालों को यह बताना होगा कि जब भारत का संविधान पत्रकारों के रिपोर्टिंग करने, सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने और जनहित के मुद्दों को नागरिकों के सामने लाने के अधिकार की रक्षा करता है ऐसे में उन्हें अपने दायित्व निभाने से रोकने के क्या मायने हैं ? साफ़ ज़ाहिर है कि सरकार देश में फैले सत्ता विरोधी जनाक्रोश को देश व दुनिया से छुपाना चाहती है। वह नहीं चाहती कि दुनिया को यह पता चले कि चुनावी धांधलियों के ख़िलाफ़ देश के लोग ख़ासकर युवा किस तरह सरकार का विरोध करते हुये सड़कों पर उतर आये हैं। और वह यह भी नहीं चाहती कि इस आंदोलन को कुचलने के लिये सरकार के इशारे पर की जा रही बर्बर पुलिस कार्रवाई को दुनिया देख सके। यही वजह है कि जहाँ दर्जनों पत्रकारों को पुलिस ने हिरासत में लिया,अनेक पत्रकारों के साथ बदसलूकी,मारपीट की कई महिला पत्रकारों के साथ अशोभनीय हरकतें कीं वहीं दर्जनों पत्रकारों को प्रदर्शन स्थल तक जाने से भी रोका गया।
एक और नई बात इस प्रदर्शन में यह भी देखने को मिली कि सत्ता प्रायोजित दर्जनों लोग पत्रकार की वेश में हाथों में माइक लिये इधर उधर घूमते नज़र आये। यह लोग प्रदर्शन की रिपोर्टिंग करने या प्रदर्शनकारियों से बात करने के बजाये उन पत्रकारों को ही घेर कर सवाल पूछने लगते जोकि घटना की रिपोर्टिंग कर रहे या प्रदर्शनकारियों से सवाल पूछ रहे थे। ये उन पत्रकारों का ही इंटरवियू लेते व उन्हें बहस में उलझा कर सत्ता को सही ठहरने व प्रदर्शनकारियों को ही कटघरे में खड़ा करने की बातें करते। जिसकी वजह से वह पत्रकार असहज महसूस करते और उन्हें रिपोर्ट करने में अड़चन पैदा होती। यह ढर्रा कई बार कई जगहों पर देखा गया। गोया जानबूझकर एक ऐसी प्रवृति अपनाई गयी जिससे या तो पुलिसिया क़हर से मीडिया कर्मी भयभीत होकर स्वयं रिपोर्ट करना छोड़ दें या उन्हें पकड़ कर प्रदर्शनस्थल से दूर ले जाया जाये या फिर उन्हें नक़ली ‘पत्रकारों’ के झुण्ड में घेरकर उन्हीं से दस सवाल पूछकर उलझाये रखा जाये ताकि वे वास्तविकता को देख न सकें व उसकी रिपोर्ट न कर सकें।
इसके अतिरिक्त कनॉट प्लेस के आउटर सर्किल पर ही भारी पुलिस बल द्वारा अनेक पत्रकारों को रोका गया ताकि वे जंतर मंतर या धरने के क़रीब जा भी न सकें। याद रखना चाहिये कि चुनावी धांधलियों के चर्चे भी पूरी दुनिया में हो चुके हैं और हो रहे हैं साथ ही विश्व पंचायत संयुक्त राष्ट्र भी अपनी चिंताएं ज़ाहिर कर चुका है। जो सरकार पहले ही देश के मीडिया के बड़े हिस्से को किसी न किसी रूप में प्रबंधित कर चुकी है उसके द्वारा चंद ईमानदार पत्रकारों व स्वतंत्र पत्रकारों पर नियंत्रण कर देश के वास्तविक हालात पर पर्दा डालने की कोशिश करना लोकतंत्र का गला घोंटने का एक और शातिराना प्रयास है।




