राजेश जैन
वह 1992 का कोई दिन रहा होगा। मैं तब मास कम्युनिकेशन का विद्यार्थी था। पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखने की तैयारी कर रहा था और यह समझने की कोशिश कर रहा था कि आखिर एक पत्रकार को किसके साथ खड़ा होना चाहिए-सत्ता के साथ, विपक्ष के साथ, किसी विचारधारा के साथ या सिर्फ अपने पेशे के साथ? इसी दौरान दिल्ली से प्रकाशित एक चर्चित हिंदी दैनिक के संपादकीय पेज पर विनीत नारायण का एक लेख पढ़ा। वह नवोदित पत्रकारों के लिए लिखा गया था। उसका संदेश था-वामपंथ पढ़ो, दक्षिणपंथ समझो, समाजवाद और पूंजीवाद को जानो… सबको समझो और फिर अपने विवेक से तय करो कि क्या सही है। तीन दशक की पत्रकारिता के बाद भी मुझे लगता है कि पत्रकारिता के लिए इससे बेहतर शुरुआती पाठ मुश्किल है।
यह बात आज भी उतनी ही सही है। इसलिए किसी विचारधारा को अपना भगवान मत बनाइए। उसे पढ़िए, समझिए, उसके तर्क को जानिए, उसकी उपलब्धियों को स्वीकार कीजिए और उसकी कमियों पर सवाल उठाइए। क्योंकि पत्रकार का काम किसी विचारधारा की चौकीदारी करना नहीं, उसका काम है-सत्ता से सवाल करना, समाज को सूचना देना और तथ्यों के आधार पर जनता को पूरी तस्वीर दिखाना। मेरे लिए पत्रकारिता का पहला सिद्धांत यही है।
किसके साथ है पत्रकार
यह सवाल पत्रकारों से अक्सर पूछा जाता है-आप किसके साथ हैं? सरकार के साथ या विपक्ष के साथ? वामपंथ के साथ या दक्षिणपंथ के साथ? इसका जवाब बहुत सीधा होना चाहिए-पत्रकार को किसी राजनीतिक खेमे के साथ नहीं, तथ्य के साथ होना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार जनता की बनाई हुई व्यवस्था है। जनता उसे चुनती है, जनता उससे सवाल कर सकती है और जनता उसे बदल भी सकती है। इसलिए पत्रकार सरकार का दरबारी नहीं हो सकता।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पत्रकार विपक्ष का प्रवक्ता भी नहीं है। सरकार आपकी पसंद की हो तो भी सवाल पूछना है। सरकार आपकी नापसंद की हो तो भी सवाल पूछना है। सरकार अच्छा काम करे तो उसे बताना है। गलती करे तो सवाल करना है। यही पत्रकारिता है।
अगर पत्रकार सत्ता की आलोचना केवल इसलिए करता है क्योंकि वह सत्ता विरोधी है, तो वह भी उतना ही गलत है जितना वह पत्रकार जो सत्ता की हर बात इसलिए सही मान लेता है क्योंकि वह सत्ता समर्थक है। पत्रकारिता का पैमाना सत्ता से दूरी नहीं, तथ्य से निकटता है।
सरकार की आलोचना विपक्ष का समर्थन नहीं
आज पत्रकारिता के सामने सबसे बड़ी उलझनों में से एक यह है कि सरकार से सवाल करते ही पत्रकार को विपक्ष का समर्थक मान लिया जाता है। महंगाई पर सवाल उठाइए-कहा जाएगा सरकार के खिलाफ हैं। बेरोजगारी पर लिखिए-कहा जाएगा सरकार को बदनाम कर रहे हैं। शिक्षा व्यवस्था की कमियां बताइए-पूछा जाएगा एजेंडा क्या है? स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाइए-कहा जाएगा सरकार विरोधी हैं। लेकिन सवाल यह है कि पत्रकार अगर यह सवाल नहीं पूछेगा तो कौन पूछेगा? सवाल पूछना किसी विचारधारा का पेटेंट नहीं है। सरकार की आलोचना करना सरकार से नफरत करना नहीं है। उसी तरह सरकार की किसी उपलब्धि को रिपोर्ट करना उसकी भक्ति नहीं है। लोकतंत्र में आलोचना और समर्थन के बीच एक तीसरी जगह भी होती है-तथ्य। पत्रकार को उसी जगह खड़ा होना चाहिए।
विचारधारा को समझिए, लेकिन उसका अनुयायी बनने की जल्दी मत कीजिए
पत्रकार के लिए विचारधाराओं को समझना इसलिए जरूरी है क्योंकि जिस विचार को हम जानते ही नहीं, उसकी आलोचना भी ईमानदार नहीं हो सकती। वामपंथ को ही लें। आज आठ घंटे का कार्यदिवस, श्रमिक अधिकार, न्यूनतम मजदूरी, ट्रेड यूनियन, कार्यस्थल की सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी बातें सामान्य लगती हैं। लेकिन इन अधिकारों के पीछे लंबा संघर्ष है। औद्योगिक क्रांति के दौर में यूरोप के कारखानों में मजदूरों की स्थिति बेहद खराब थी। पुरुषों के साथ महिलाएं और बच्चे लंबे समय तक काम करते थे। कार्यस्थल की सुरक्षा कमजोर थी और श्रमिकों के पास सामूहिक शक्ति बहुत कम थी।
फिर सवाल उठे। श्रमिक आंदोलन खड़े हुए। ट्रेड यूनियन बनीं। समाजवादियों और अन्य सामाजिक आंदोलनों ने पूंजी और श्रम के रिश्ते पर बहस शुरू की। आठ घंटे के कार्यदिवस से लेकर श्रमिक अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा तक अनेक मुद्दे सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बने। इन संघर्षों में वामपंथी आंदोलनों और ट्रेड यूनियनों की भूमिका रही। इसे स्वीकार करने में किसी को संकोच नहीं होना चाहिए। लेकिन यहीं पत्रकारिता की दूसरी कसौटी भी सामने आती है-एक ही विचारधारा के इतिहास में केवल उपलब्धियां खोजकर रुक जाना भी पत्रकारिता नहीं है।
मार्क्स आधुनिक राजनीतिक और आर्थिक चिंतन के महत्वपूर्ण विचारक हैं। उनके विचारों ने दुनिया की राजनीति और अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। उनसे असहमत होना संभव है, लेकिन उनके प्रभाव को नकारना इतिहास को नकारना होगा। साथ ही, मार्क्सवाद के नाम पर बनी राजनीतिक व्यवस्थाओं के दमन, राजनीतिक स्वतंत्रता पर प्रतिबंध और मानवीय त्रासदियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यानी इतिहास को पूरा पढ़ना होगा। सिर्फ उजाला नहीं, अंधेरा भी।
यही कसौटी हर विचारधारा पर लागू होनी चाहिए। यही नियम दक्षिणपंथ, समाजवाद, पूंजीवाद या किसी भी दूसरी विचारधारा के लिए होना चाहिए। पत्रकार को यह सुविधा नहीं हो सकती कि अपनी पसंद की विचारधारा की उपलब्धियों को इतिहास माने और उसकी कमियों को अपवाद और विरोधी विचारधारा की कमियों को उसका पूरा इतिहास मान ले। विचारधारा को इतिहास की कसौटी पर परखा जाना चाहिए, इतिहास को विचारधारा की कसौटी पर नहीं। यही अंतर पत्रकारिता और प्रचार के बीच है। प्रचार पहले निष्कर्ष तय करता है और फिर उसके समर्थन में तथ्य खोजता है। पत्रकारिता पहले तथ्य खोजती है और फिर निष्कर्ष तक पहुंचती है।
असली खतरा विचारधारा नहीं, खेमेबंदी है
मुझे लगता है कि आज पत्रकारिता के सामने विचारधाराओं से भी बड़ी चुनौती खेमेबंदी की है। अगर पत्रकार सरकार की तारीफ करता है तो उसे सत्ता का आदमी कहा जाता है। सरकार की आलोचना करता है तो विपक्ष का आदमी। विपक्ष की आलोचना करता है तो सरकार का समर्थक और अगर दोनों से सवाल करता है तो पूछा जाता है-आखिर यह किसके साथ है? मेरा जवाब सीधा है-जनता के साथ। सवाल के साथ। तथ्य के साथ।
पत्रकार का कोई राजनीतिक खेमा नहीं होना चाहिए। उसका पक्ष खबर का तथ्य होना चाहिए। पत्रकार की असली परीक्षा अपने पसंदीदा नेता के सामने होती है निष्पक्षता की बात करना आसान है। उसे निभाना कठिन। खासकर तब, जब सवाल किसी ऐसे नेता या राजनीतिक दल से जुड़ा हो जिसे पत्रकार स्वयं पसंद करता हो। जिस नेता को मैं पसंद करता हूं, उसके खिलाफ तथ्य हों तो मुझे उसे लिखना चाहिए। जिस नेता को मैं पसंद नहीं करता, उसके पक्ष में तथ्य हों तो मुझे वह भी लिखना चाहिए। यही पत्रकारिता की असली परीक्षा है।
निष्पक्षता का अर्थ यह नहीं कि पत्रकार के निजी विचार नहीं होंगे। पत्रकार भी समाज का हिस्सा है। उसके अपने विचार और पसंद-नापसंद हो सकती हैं।
लेकिन रिपोर्टिंग का पैमाना निजी पसंद नहीं हो सकता। पत्रकार को समय-समय पर अपने पूर्वाग्रहों की भी जांच करनी चाहिए। क्या मैं अपने पसंदीदा नेता के लिए अलग पैमाना तो नहीं अपना रहा? क्या मैं विरोधी नेता की गलती को जरूरत से ज्यादा बड़ा तो नहीं बना रहा? क्या मैं ऐसी खबर को नजरअंदाज तो नहीं कर रहा जो मेरी अपनी धारणा के खिलाफ जाती है? यही आत्मपरीक्षण पत्रकारिता को विश्वसनीय बनाता है।
पत्रकार का काम केवल सवाल करना नहीं, सच्च बताना भी है
यह भी समझना जरूरी है कि पत्रकारिता का अर्थ केवल सरकार की आलोचना करना नहीं है। अगर किसी गांव में सड़क बनी है, किसी अस्पताल की व्यवस्था बेहतर हुई है, किसी सरकारी योजना से लोगों को लाभ मिला है या किसी नीति से वास्तविक सुधार हुआ है तो पत्रकार को यह भी बताना चाहिए। जनता को सरकार की विफलता जानने का जितना अधिकार है, उपलब्धि जानने का भी उतना ही अधिकार है। लेकिन यहां एक बारीक फर्क है। सरकारी उपलब्धि की रिपोर्टिंग और सरकारी प्रचार में अंतर है। सरकार कहती है कि योजना से एक लाख लोगों को फायदा हुआ। पत्रकार का काम सिर्फ यह लिख देना नहीं कि ‘एक लाख लोगों को फायदा हुआ।’ पत्रकार पूछेगा-एक लाख कौन हैं? लाभ कैसे मिला? कितना पैसा खर्च हुआ? कितने लोग पात्र होने के बावजूद छूट गए? क्या जमीन पर भी वही तस्वीर है जो सरकारी आंकड़ों में दिखाई जा रही है? यही सवाल खबर को प्रेस विज्ञप्ति से पत्रकारिता में बदलता है।
पत्रकार को सत्ता से ही नहीं, अपने समाज से भी सवाल करना चाहिए
लोकतंत्र में सवाल केवल सरकार से नहीं होते। समाज से भी होते हैं। जब कोई नागरिक अपने नेता की हर गलती को सही साबित करने लगे, जब पार्टी की निष्ठा सत्य से बड़ी हो जाए, जब विचारधारा इंसान से बड़ी हो जाए और जब राष्ट्र के नाम पर सवाल पूछना बंद कर दिया जाए-तब पत्रकार को समाज से भी सवाल करना चाहिए। क्योंकि पत्रकारिता का काम किसी खुशहाल भ्रम को बनाए रखना नहीं है। उसका काम असुविधाजनक सच को सामने लाना भी है।
कई बार सबसे जरूरी सवाल वही होता है जिसे सुनना किसी को पसंद नहीं होता।
लोकतंत्र चुनाव से नहीं, सवालों से भी चलता है
तीन दशक की पत्रकारिता ने मुझे यह सिखाया है कि लोकतंत्र को केवल सत्ता से खतरा नहीं होता। लोकतंत्र को तब भी खतरा होता है जब समाज सवाल पूछना छोड़ देता है। जब नागरिक मान लेता है कि उसका नेता गलत हो ही नहीं सकता। जब राजनीतिक दल की गलती भी सही लगने लगती है। जब विचारधारा इंसान से बड़ी हो जाती है। जब राष्ट्र के नाम पर सवाल बंद कर दिए जाते हैं और जब पत्रकार सवाल पूछने से पहले यह सोचने लगे कि सवाल पूछने पर कौन नाराज होगा। ऐसे समय में पत्रकारिता की जरूरत कम नहीं, और बढ़ जाती है। क्योंकि लोकतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता। वह सवालों से चलता है। असहमति से चलता है। चर्चा से चलता है। बहस, आलोचना से चलता है और उस नागरिक से चलता है जो अपने चुने हुए प्रतिनिधि से पूछ सके-आपने जो वादा किया था, उसका क्या हुआ?
मैं आज भी मानता हूं-आप नए पत्रकार है तो वामपंथ पढ़िए, दक्षिणपंथ पढ़िए, समाजवाद पढ़िए, पूंजीवाद पढ़िए, गांधी पढ़िए, मार्क्स पढ़िए, अंबेडकर पढ़िए, लोहिया पढ़िए,सावरकर पढ़िए, नेहरू पढ़िए, दीनदयाल उपाध्याय पढ़िए…जितना संभव हो, उतना पढ़िए। लेकिन अंत में अपने विवेक से तय कीजिए कि क्या सही है। किसी विचारधारा को पढ़ना उसका अनुयायी बनना नहीं है। किसी विचारधारा की आलोचना करना उसका दुश्मन बनना नहीं है और सरकार से सवाल पूछना सरकार का दुश्मन होना नहीं है। पत्रकार का काम किसी विचारधारा को जिताना या हराना नहीं है। उसका काम है-तथ्य सामने रखना, संदर्भ देना, सवाल पूछना और जनता को पूरी तस्वीर दिखाना।
पत्रकार का पक्ष किसी राजनीतिक खेमे का नहीं, तथ्य का होना चाहिए। लेकिन ‘तथ्य के साथ’ होना भी पर्याप्त नहीं है। पत्रकार को यह देखना होगा कि तथ्य का संबंध किससे है-आखिर उसके पीछे आम आदमी की जिंदगी है। बेरोजगारी सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, किसी युवा का भविष्य है। महंगाई सिर्फ प्रतिशत नहीं है, किसी परिवार का बिगड़ता बजट है। खराब स्वास्थ्य व्यवस्था सिर्फ प्रशासनिक आंकड़ा नहीं है, किसी मरीज की परेशानी है। पेपर लीक सिर्फ एक खबर नहीं है, हजारों विद्यार्थियों की मेहनत और उम्मीद का सवाल है। यहीं पत्रकारिता का असली अर्थ सामने आता है।
पत्रकार को सत्ता से सवाल इसलिए नहीं करना है कि वह सत्ता विरोधी है। उसे सरकार की उपलब्धि इसलिए नहीं बतानी है कि वह सरकार समर्थक है। उसे विपक्ष की आलोचना इसलिए नहीं करनी है कि वह किसी खेमे में है। उसे यह सब इसलिए करना है क्योंकि जनता को पूरी और तथ्यपरक तस्वीर जानने का अधिकार है। लोकतंत्र में सरकार और देश एक नहीं होते। नेता और राष्ट्र एक नहीं होते। राजनीतिक दल और संविधान एक नहीं होते। सरकारें बदलती हैं, दल बदलते हैं, नेता आते-जाते हैं; लेकिन जनता का सवाल और लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही बनी रहनी चाहिए। इसीलिए पत्रकार को हर खबर से पहले एक ही सवाल अपने सामने रखना चाहिए-मैं जो लिख रहा हूं, क्या वह तथ्य के प्रति ईमानदार है और क्या इससे पाठक को वास्तविक स्थिति समझने में मदद मिलेगी? अगर जवाब हां है तो पत्रकार अपना काम कर रहा है।





