शाहाना के गोल्डन जुबली फिनाले में टैगोर, परंपरा और नारी शक्ति का भव्य उत्सव

A Grand Celebration of Tagore, Tradition, and Women's Empowerment at Shahana's Golden Jubilee Finale

मुंबई (अनिल बेदाग): शाहाना (टैगोर सेंटर फॉर इंडियन म्यूजिक एंड कल्चर) ने अपने 51वें स्थापना वर्ष के गोल्डन जुबली समारोह का भव्य समापन दादर स्थित खचाखच भरे वीर सावरकर ऑडिटोरियम में किया। शास्त्रीय नृत्य, रंगमंच, रवींद्र संगीत और कविता से सजी यह विशेष संध्या भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत का यादगार उत्सव बन गई।

समारोह का मुख्य आकर्षण ‘राजेंद्रनंदिनी – द वॉरियर प्रिंसेस’ रहा, जो रवींद्रनाथ टैगोर की कालजयी रचना ‘चित्रांगदा’ का अभिनव रूपांतरण था। शाहाना की मानद क्रिएटिव हेड अनुश्री बनर्जी ने इसका निर्देशन और कोरियोग्राफी की। अनुश्री बनर्जी ने कहा, “टैगोर केवल बंगालियों के लिए नहीं हैं। टैगोर भारत के हैं और पूरी दुनिया के हैं।” उन्होंने इस प्रस्तुति के माध्यम से टैगोर के लैंगिक समानता, आत्मसम्मान और बाहरी सुंदरता से परे आंतरिक सौंदर्य के संदेश को रेखांकित किया।

मणिपुरी नृत्य की जानी-मानी कलाकार पुर्बिता मुखर्जी ने चित्रांगदा के किरदार को अपनी भावपूर्ण और गरिमामय प्रस्तुति से जीवंत कर दिया। वहीं भरतनाट्यम और रवींद्रिक शैली के कलाकार अनिलकुमार सिंह ने अर्जुन की भूमिका में प्रभावशाली अभिनय और नृत्य कौशल का परिचय दिया।

अनिलकुमार सिंह ने कहा, “सबसे शक्तिशाली क्षण वह था, जब यह एहसास हुआ कि अर्जुन की सबसे बड़ी जीत युद्ध के मैदान में नहीं, बल्कि अपने भीतर हुई थी।” शाम का एक और भावुक पड़ाव ‘आलोकधारा’ रहा, जो शाहाना के संस्थापकों इंद्राणी आचार्य, सुनंदा मजूमदार और स्निग्धा बसु को समर्पित रवींद्र संगीत की एक आत्मीय प्रस्तुति थी। श्रमणा चट्टोपाध्याय, मेघ और पलाशी घोष ने अपनी मधुर प्रस्तुतियों से वातावरण को भावनाओं और संगीत से भर दिया। वहीं उपमन्यु भट्टाचार्य की कविता और अरूप चौधरी के संगीत निर्देशन ने इस विशेष संध्या की गरिमा को और बढ़ाया।

टैगोर की विचारधारा, भारतीय शास्त्रीय परंपराओं और नारी शक्ति के संदेश को एक साथ पिरोता शाहाना का यह गोल्डन जुबली फिनाले केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि कला, समानता और मानवीय मूल्यों के प्रति एक सशक्त श्रद्धांजलि बनकर सामने आया।