प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
2047 में जब भारत अपनी आज़ादी का शताब्दी वर्ष मनाएगा, तब दुनिया केवल हमारी अर्थव्यवस्था का आकार नहीं, बल्कि यह भी परखेगी कि उस समृद्धि में कितने भारतीय सहभागी बने। प्रश्न यह नहीं होगा कि भारत 25 या 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन गया, बल्कि यह होगा कि आर्थिक शक्ति अंतिम व्यक्ति तक पहुंची या नहीं। क्या विकसित भारत का सपना हर नागरिक की वास्तविकता बनेगा, या केवल संपन्न वर्ग की उपलब्धि रह जाएगा? आज भारत जिस विकास पथ पर बढ़ रहा है, उसकी रफ्तार प्रभावशाली है, लेकिन दिशा पर गंभीर मंथन आवश्यक है। विकास तब तक अधूरा है, जब तक उसका लाभ सीमित वर्ग से निकलकर पूरे राष्ट्र तक नहीं पहुंचता। अन्यथा वह प्रगति नहीं, असमानता का विस्तार बन जाती है। इसलिए 2047 का सबसे बड़ा प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक और नैतिक भी है।
आज के आर्थिक संकेतक उम्मीद जगाते हैं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आकलनों के अनुसार, यदि भारत अगले दो दशकों तक 7.5–8% की वृद्धि बनाए रखता है, तो 2047 तक उसकी अर्थव्यवस्था 25–35 ट्रिलियन डॉलर (ईवाई, पीएचडीसीसीआई सहित विभिन्न आकलनों के अनुसार) तक पहुंच सकती है। प्रति व्यक्ति आय 15,000–22,000 डॉलर रहने का अनुमान है। करोड़ों लोगों का गरीबी रेखा से बाहर निकलना बड़ी उपलब्धि है। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू चिंताजनक है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 के अनुसार राष्ट्रीय आय का 58% शीर्ष 10% आबादी के पास है, जबकि निचली 50% आबादी को केवल 15% आय मिलती है। कुल संपत्ति का 65% शीर्ष 10% के पास केंद्रित है, जबकि आधी आबादी के हिस्से में महज 6% संपत्ति है। यह केवल आंकड़ों का अंतर नहीं, बल्कि विकास मॉडल का प्रतिबिंब है।
असल चुनौती विकास की रफ्तार नहीं, उसकी प्रकृति है। भारत की आर्थिक वृद्धि मुख्यतः पूंजी-गहन उद्योगों, प्रौद्योगिकी और सेवा क्षेत्र पर आधारित रही है। इन क्षेत्रों ने राष्ट्रीय आय बढ़ाई, लेकिन व्यापक रोजगार नहीं दिए। श्रम-गहन विनिर्माण अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका। नतीजतन हर वर्ष लाखों युवा रोजगार बाजार में उतरते हैं, पर गुणवत्तापूर्ण अवसर नहीं मिलते। मध्यम वर्ग पर दबाव बढ़ रहा है और सामाजिक गतिशीलता धीमी पड़ रही है। पीएलएफ़एस 2025-26 के अनुसार महिला श्रम बल भागीदारी बढ़कर लगभग 32–40% (शहरी क्षेत्रों में करीब 25%) हुई है, फिर भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए यह पर्याप्त नहीं है। कृषि से उद्योग और सेवाओं की ओर श्रमिकों का संक्रमण भी सुस्त है, जिससे करोड़ों लोग कम उत्पादकता वाले कार्यों में अटके हैं। यही वजह है कि विकास के आंकड़े चमकते हैं, लेकिन उनकी रोशनी समाज के बड़े हिस्से तक नहीं पहुंचती।
यह असमानता केवल आय की नहीं, अवसरों की भी है। देश का एक छोटा वर्ग विश्वस्तरीय अस्पतालों, निजी विश्वविद्यालयों, आधुनिक कौशल संस्थानों और वैश्विक सुविधाओं तक पहुंच रखता है, जबकि करोड़ों लोग आज भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य, शिक्षा और कौशल विकास से वंचित हैं। क्षेत्रीय विषमता भी गहरा रही है। कुछ राज्य निवेश, उद्योग और अधोसंरचना के दम पर तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं, जबकि अनेक राज्य विकास की दौड़ में पीछे छूट रहे हैं। यदि यही तस्वीर बनी रही, तो 2047 में भारत 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था होने का दावा करेगा, लेकिन उसके भीतर दो भारत बसेंगे—एक समृद्ध, आधुनिक और अवसरों से परिपूर्ण; दूसरा अभाव, सीमित संभावनाओं और संघर्ष से घिरा। ऐसी खाई किसी विकसित राष्ट्र की नहीं, असंतुलित विकास की पहचान है।
यही रास्ता भारत को मध्य-आय जाल (मिडिल-इनकम ट्रैप) की ओर ले जा सकता है। दुनिया के अनेक देशों ने शुरुआती दौर में तेज़ आर्थिक वृद्धि हासिल की, लेकिन मानव पूंजी, उत्पादकता और समावेशी संस्थागत सुधारों की अनदेखी ने उनकी प्रगति ठहरा दी। भारत के सामने भी यही चुनौती है। हमारा जनसांख्यिकीय लाभांश दुनिया का सबसे बड़ा अवसर है, पर यदि करोड़ों युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल और उत्पादक रोजगार नहीं मिले, तो यही शक्ति भविष्य का सबसे बड़ा आर्थिक और सामाजिक दायित्व बन सकती है। उधर जलवायु परिवर्तन, जल संकट और बढ़ता शहरी दबाव विकास की राह कठिन बनाएंगे। इसलिए केवल निवेश जुटाना या जीडीपी बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा; विकास की गुणवत्ता और समावेशिता को भी समान प्राथमिकता देनी होगी।
आशा की सबसे मजबूत वजह यही है कि भारत के पास संभावनाओं का अभाव नहीं, विकल्पों की प्रचुरता है। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, नवाचार से संचालित स्टार्टअप संस्कृति और सुदृढ़ लोकतांत्रिक व्यवस्था हमारी ऐसी ताकतें हैं, जिन पर समावेशी विकास की नई इमारत खड़ी की जा सकती है। आवश्यकता केवल विकास की प्राथमिकताएं बदलने की है। पूंजी निर्माण के साथ उसे रोजगार सृजन की धुरी बनाना होगा। श्रम-गहन विनिर्माण, निर्यातोन्मुख उद्योग और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों में नई ऊर्जा भरनी होगी। शिक्षा और स्वास्थ्य में बड़े निवेश से मानव पूंजी सशक्त करनी होगी। क्षेत्रीय संतुलन ऐसा हो कि विकास कुछ महानगरों तक सीमित न रहे, बल्कि हर राज्य और जिले तक पहुंचे। साथ ही ऐसी प्रगतिशील नीतियां अपनानी होंगी, जो धन सृजन को गति दें और उसके न्यायसंगत वितरण को भी सुनिश्चित करें।
2047 का भारत अमीर बनेगा या सिर्फ अमीरों का भारत, इसका फैसला इतिहास नहीं, आज की नीतियां करेंगी। यदि विकास कुछ लोगों की सफलता तक सिमट गया, तो आने वाली पीढ़ियों को आर्थिक उपलब्धियों के साथ सामाजिक असमानता भी विरासत में मिलेगी। लेकिन यदि समावेश, उत्पादकता, न्याय और समान अवसर विकास का आधार बने, तो भारत केवल आर्थिक महाशक्ति नहीं, सामाजिक रूप से भी विकसित राष्ट्र होगा। क्योंकि किसी देश की समृद्धि उसके अरबपतियों की संख्या से नहीं, बल्कि सबसे कमजोर नागरिक की गरिमा, अवसर और जीवन-स्तर से आंकी जाती है। 2047 तक भारत यह कसौटी बदल सकता है—बशर्ते विकास की यात्रा में कोई भारतीय पीछे न छूटे। तभी आज़ादी के सौ वर्ष केवल उत्सव नहीं, साझा समृद्धि और राष्ट्रीय विजय का स्वर्णिम अध्याय बनेंगे।





