विवेक शुक्ला
9 सितंबर 1947 की सुबह दिल्ली में हवा भारी थी। उमस भरी गर्मी भी थी, बेचैनी भी। आज़ादी को सिर्फ़ तीन हफ़्ते हुए थे और बँटवारा राजधानी को अंदर से चीर रहा था। सड़कों पर अफवाहें दौड़ रही थीं, मोहल्लों में आग लग रही थी, लोग अपने घर छोड़कर भाग रहे थे। उसी तनाव भरी सुबह गांधीजी दिल्ली पहुँचे। ये उनकी आखिरी ट्रेन यात्रा थी। उसके बाद वो फिर कभी रेल में बैठकर कहीं नहीं गए।
कोलकाता से वो दो रात पहले निकल चुके थे। वहाँ उन्होंने सांप्रदायिक शांति के लिए काम किया था। हावड़ा स्टेशन पर भीड़ से बचने के लिए उन्हें बेलूर ले जाया गया। बेलूर कोई बड़ा स्टेशन नहीं था, रास्ते का एक छोटा सा ठिकाना था। वे प्लेटफॉर्म पर करीब नौ बजे पहुँचे। पश्चिम बंगाल के मंत्री उन्हें विदा करने आए। ठीक साढ़े नौ बजे 7 सितंबर की रात दिल्ली एक्सप्रेस निकली। ये नाम खुद गांधीजी ने रखा था। उसी दिन उन्होंने मणिबेन पटेल को पत्र लिखा और ट्रेन का नाम बताया। 8 तारीख को भी वो गाड़ी में बैठे-बैठे लिखते रहे।
ट्रेन सीधे दिल्ली जंक्शन नहीं गई। पुराना शहर अब सुरक्षित नहीं रह गया था। पुरानी दिल्ली के स्टेशन पर उतरना खतरे से खाली नहीं था।दिल्ली में दंगे हो रहे थे। इसलिए सुबह 9 सितंबर को गाड़ी शाहदरा में रुकी। प्लेटफॉर्म पर सरदार पटेल खड़े थे, राजकुमारी अमृत कौर थीं, और स्थानीय स्वतंत्रता सेनानी बी.डी. संतोषी अपने साथियों के साथ मौजूद थे। गांधीजी थके हुए दिख रहे थे। स्टेशन छोड़ने से पहले उन्होंने शाहदरा के लोगों से एक बात कही किदंगे करने वालों को अपने मोहल्ले में कामयाब मत होने देना। शहर के कई हिस्से जल रहे थे, लेकिन शाहदरा में शांति बनी रही।
अगले दिन प्रार्थना सभा हुई बिड़ला हाउस में। गांधीजी ने पूछा-दिल्ली जो हमेशा खुश-खुश दिखती थी, क्या वो अब मुर्दों का शहर बन गई है? ये बात उनके संकलित लेखों में दर्ज है। शहर की रौनक जैसे किसी ने चुरा ली हो। गलियों में हँसी कम थी, डर ज्यादा था।
गांधीजी का दिल्ली से पुराना नाता था। पहली बार वो 12 अप्रैल 1915 को दिल्ली जंक्शन उतरे थे, कस्तूरबा के साथ। तब देश गुलाम था, आज़ादी की लड़ाई अभी लंबी थी। वो कश्मीरी गेट के सेंट स्टीफंस कॉलेज में रुके थे। वो फिर आए तो इस बार उनका राजधानी में प्रवेश का रास्ता ही बदल चुका था। दिल्ली जंक्शन नहीं, शाहदरा। वही शहर, लेकिन चेहरा दूसरा।
अब वो मंदिर मार्ग वाली वाल्मीकि बस्ती नहीं लौट सकते थे। वहाँ पर शरणार्थी डेरा डाल चुके थे। लाखों हिंदू और सिख सीमा पार से आ रहे थे, बहुत से मुसलमान पाकिस्तान जा रहे थे। कुछ महीनों में दिल्ली का नक्शा बदल गया था। गांधीजी का नया ठिकाना बना बिड़ला हाउस था। अब उस सड़क का नाम तीस जनवरी मार्ग है।
वाल्मीकि मंदिर वाले छोटे कमरे में वो 1 अप्रैल 1946 से 10 जून 1947 तक रहे थे।कुल 214 दिन। आज उस जगह की देखभाल करने वाले कृष्ण विद्यार्थी कहते हैं कि जब गांधीजी वहाँ थे तो पूरी तरह सुरक्षित थे। वाल्मीकि समुदाय दिन-रात पहरा देता था। सुबह-शाम वो बच्चों को हिंदी और अंग्रेज़ी पढ़ाते थे। नेता लोग बाहर इंतज़ार करते रहते, जब तक क्लास खत्म न हो जाए। नेहरू आते थे। खान अब्दुल गफ्फार खान भी आए, एक से ज्यादा बार उनके साथ रुके। लुई फिशर भी आए, इंटरव्यू लेने। उसी इंटरव्यू से बाद में किताब बनी, और उसी किताब पर रिचर्ड एटनबरो की फिल्म बनी।
उसी छोटे कमरे से वो नोआखाली गए, बिहार गए, कोलकत्ता गए।जहाँ-जहाँ दंगे भड़के। कहा था कि लौटकर फिर बच्चों को पढ़ाएँगे। जब तक वो लौटे, देश आज़ाद हो चुका था। आज़ादी के साथ बँटवारा भी आ गया। शाहदरा से बिड़ला हाउस जाते हुए रास्ते में उन्होंने शहर के कुछ हिस्से अभी भी जलते देखे होंगे। मकान खाली पड़े होंगे, सामान सड़कों पर बिखरा होगा, लोग चेहरे ढँके भाग रहे होंगे।
बिड़ला हाउस में उन्होंने सब धर्मों की प्रार्थना शुरू की। ब्रदर सोलोमन जॉर्ज कहते हैं कि शुरू के दिनों में सिर्फ़ हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और सिख ग्रंथों के अंश पढ़े जाते थे। ब्रदर सोलोमन जॉर्ज राजधानी में राजघाट और शांति वन में होने वाली सर्वधर्म प्रार्थना सभा से लंबे समय से जुड़े हुए हैं। नोआखाली, बिहार और कोलकत्ता के बाद अब बारी दिल्ली की थी। हिंसा जल्दी नहीं रुकी। आखिरी 144 दिन उन्होंने बिड़ला हाउस के छोटे से ग्राउंड फ्लोर वाले कमरे में बिताए।
14 सितंबर को वो ईदगाह गए, मोतिया खान गए। दोनों जगह हिंदू, सिख और मुसलमान उन्हें अपनी तबाही की कहानी सुना रहे थे। 13 जनवरी 1948 को उन्होंने अनिश्चितकालीन उपवास शुरू कर दिया। पाँच दिन बाद, 18 जनवरी को, तमाम समुदायों के नेताओं ने शांति का लिखित वादा किया। तब उन्होंने उपवास तोड़ा। कुछ देर के लिए लगा कि दिल्ली सुन रही है।
फिर 30 जनवरी 1948 आया। प्रार्थना सभा के लिए निकलते समय गोली चली। गांधीजी गिर गए। उसके बाद उनकी अस्थियाँ नई दिल्ली रेलवे स्टेशन और दिल्ली जंक्शन से देश के अलग-अलग कोनों को गईं। नदियों में विसर्जित हुईं, शहरों में पहुँचाई गईं। एक आखिरी रेल यात्रा-जो उन्होंने खुद नहीं की, लेकिन उनकी याद ने की। अबहर साल 9 सितंबर को स्वतंत्रता सेनानी बी.डी. संतोषी के पुत्र और सोशल वर्कर नरेश कौशिक और कई लोग शाहदरा रेलवे स्टेशन पर जाकर गांधी जी का स्मरण करते हैं।





