अरुण कुमार चौबे
विजयपुर उपचुनाव के लिए न्यायालय ने पराजित उम्मीदवार रामनिवास रावत को निर्वाचित घोषित किया है।
यदि किसी भी दल का उम्मीदवार हलफनामे में भ्रमित करने वाली जानकारी देता है या जानबूझ कर तथ्यों छुपाता है अथवा गलत जानकारी देता है, और उसके खिलाफ दायर याचिका पर यदि न्यायालय को निर्णय देना है तो वह निर्वाचन को शून्य घोषित कर सकता है,उस सीट पर फिर से चुनाव कराने की अनुशंसा चुनाव आयोग से कर सकता है। न्यायालय का यह अधिकार नहीं है कि वो निर्धारित करे कि क्षेत्र का विधायक/सांसद/स्थानीय निकाय का निर्वाचित जनप्रतिनिधि कौन होगा।
इसका निर्णय करने का अधिकार तो मतदाताओं को है कि उन्हें किसे जनप्रतिनिधि चुनना चाहिए।
कई अपराधिक प्रवृत्तियां जेल में रहकर या खुले आम कानून का मखौल उड़ाकर भी चुनाव जीत जाती हैं,क्योंकि मतदाता ने उन्हें जनप्रतिनिधि चुना है।
न्यायालय को रामनिवास रावत को विधायक घोषित करने के बजाय शून्य घोषित की विधानसभा सीट पर उपचुनाव कराने की अनुशंसा चुनाव आयोग से करना चाहिए ताकि मतदाता निर्णय कर सकें कि उन्हें किसे जनप्रतिनिधि चुनना है।
रामनिवास रावत न्यायालय के सहारे लोकतंत्र से बचने का कार्य किया है उन्हें तो संवैधानिक शपथ लेने का अधिकार नहीं है। राजनीति और अपराध का मौसेरा रिश्ता है राजा हर्षचंद्र कोई नहीं है ज्यादातर की चादर मैली ही है।
मैली चादर ओढ़कर संवैधानिक शपथ लेना मामूली बात है। यदि रामनिवास रावत में साहस हो तो न्यायालय से मिली विधायकी को तजकर उपचुनाव लड़ने का साहस दिखाए। इस समय तो दलबदल के कारण से रामनिवास रावत की पांचों उंगलियां घी में हैं और सिर कढ़ाई में है, चुनाव जीतने के सारे अमोघ अस्त्र उनके पास हैं फिर वो न्यायालय से थोपी विधायकी लेकर कायरता का परिचय दे रहे हैं वो दलबदलु नेता हैं यदि कोई मूल जनसंघ से भाजपा तक का तपोमिष्ठ नेता होता वो चुनाव के मैदान में उतरकर राजनीतिक विरोधी की धूल चटा देता।
रामनिवास रावत राजनीतिक रूप से निष्प्रभावी है, भाजपा प्रभावी है इसलिए दलबदलू नेता ने भाजपा की शरण ली है।





