संदीप त्यागी
पूर्व राष्ट्रीय कार्यसमिति सदस्य, भाजयुमो
देश की राजनीति में यदि संगठन, चुनावी रणनीति और सूक्ष्म प्रबंधन की बात हो, तो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के साथ जिस नाम ने अपनी अलग पहचान बनाई है, वह है सुनील बंसल। उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक, बंसल ने यह साबित किया है कि आधुनिक राजनीति में चुनाव सिर्फ नारों से नहीं, बल्कि मजबूत संगठन और सटीक रणनीति से जीते जाते हैं।
राजस्थान के कोटपुतली में जन्मे बंसल का राजनीतिक सफर छात्र राजनीति से शुरू होकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में विकसित हुआ। शुरुआती दौर में ही उन्होंने संगठन की बारीकियों को समझ लिया था, जो आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
उत्तर प्रदेश मॉडल: माइक्रो मैनेजमेंट की मिसाल
2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के पीछे बंसल की बूथ-स्तरीय रणनीति निर्णायक रही। इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने सामाजिक समीकरणों को साधते हुए, संगठन को गांव-गांव तक सक्रिय किया। परिणामस्वरूप भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला।
बंसल का “माइक्रो मैनेजमेंट मॉडल”—जिसमें बूथ स्तर तक डेटा, कार्यकर्ता और मतदाता की सीधी कनेक्टिविटी शामिल थी—आज भी भाजपा की चुनावी रणनीति की रीढ़ माना जाता है।
पश्चिम बंगाल: संघर्ष से विस्तार तक
आज के परिप्रेक्ष्य में यदि बंसल की रणनीति को समझना हो, तो पश्चिम बंगाल का उदाहरण बेहद महत्वपूर्ण है। बंगाल, जहां वर्षों से ममता बनर्जी का मजबूत राजनीतिक प्रभाव रहा, वहां भाजपा के लिए जमीन तैयार करना आसान नहीं था।
बंसल की रणनीति यहां दो स्तरों पर काम करती दिखी—
पहला, संगठन का विस्तार;
दूसरा, स्थानीय मुद्दों और पहचान की राजनीति को समझकर उसे अपने पक्ष में मोड़ना।
उन्होंने बंगाल में बूथ सशक्तिकरण, शक्ति केंद्र निर्माण और कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया। साथ ही, केंद्रीय योजनाओं को जन-जन तक पहुंचाने का अभियान चलाया गया। परिणामस्वरूप भाजपा ने बंगाल में अपने वोट शेयर और सीटों में अभूतपूर्व वृद्धि दर्ज की और खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया।
नई राजनीति का सूत्र: डेटा + संगठन + संवाद
आज की राजनीति में बंसल की रणनीति तीन स्तंभों पर आधारित मानी जाती है—
- डेटा आधारित निर्णय
- मजबूत संगठन संरचना
- कार्यकर्ताओं से निरंतर संवाद
लखनऊ का ‘वार रूम’ मॉडल अब कई राज्यों में अपनाया जा चुका है। डिजिटल माध्यमों और कॉल सेंटर के जरिए बूथ स्तर तक त्वरित सूचना पहुंचाने की प्रणाली ने चुनावी प्रबंधन को नया आयाम दिया है।
आज का संदर्भ: बदलती राजनीति में बंसल की प्रासंगिकता
वर्तमान समय में जब राजनीति तेजी से बदल रही है और हर चुनाव में नई चुनौतियां सामने आती हैं, तब सुनील बंसल जैसे रणनीतिकार की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। चाहे उत्तर प्रदेश हो, बंगाल हो या अन्य राज्य—बंसल की कार्यशैली ने भाजपा को एक “कैडर आधारित, तकनीकी रूप से सक्षम” पार्टी के रूप में स्थापित करने में अहम योगदान दिया है।
नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में चुनावी सफलताओं की जो श्रृंखला बनी, उसमें सुनील बंसल की संगठनात्मक क्षमता एक मजबूत स्तंभ के रूप में सामने आई है।
निष्कर्ष
आज जब हर चुनाव को “मैनेजमेंट बनाम मैसेज” के नजरिए से देखा जा रहा है, तब सुनील बंसल ने यह साबित किया है कि सही रणनीति, मजबूत संगठन और जमीनी पकड़ के दम पर असंभव दिखने वाली राजनीतिक लड़ाइयों को भी जीता जा सकता है।
इसीलिए, उत्तर प्रदेश से लेकर पश्चिम बंगाल तक, सियासत के गलियारों में उन्हें यूं ही ‘चाणक्य’ नहीं कहा जाता।





