पत्थर बोल उठे: एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ !

The stones spoke: a historical document!

अजीत शर्मा ‘आकाश’

सुप्रसिद्ध पत्रकार और लेखिका डॉ. प्रमिला वर्मा की नवीनतम कृति ‘पत्थर बोल उठे’ में विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित छत्रपति शिवाजी के बारह दुर्गों के इतिहास का अंकन किया गया है। पुस्तक में बताया गया है कि सह्याद्रि की दुर्गम पहाड़ियों पर निर्मित ये बारह किले मराठा शौर्य और स्थापत्य कला के प्रतीक होने के साथ ही उनके ‘हिन्दवी स्वराज्य’ की मजबूत नींव कहे जाते हैं, जिनमें छत्रपति शिवाजी के जीवन का हर अध्याय अंकित है। मराठा स्थापत्य की ‘माची प्रणाली’ द्वारा दुर्गों की बहुस्तरीय सुरक्षा का प्रबंध किया गया था। इनमें विशाल अन्नागार के अम्बरखाने, शस्त्रों का भण्डारण तथा रहस्यमय मार्ग युक्त भूमिगत सुरंगें थीं। यह बहुस्तरीय सुरक्षा शत्रु के लिए अभेद्य होती थी।

शिवाजी के इन बारह किलों के माध्यम से उनके राजनीतिक कौशल, सैन्य रणनीति, स्थापत्य दृष्टि वर्णित होती है। सामरिक महत्व के साथ ही सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राष्ट्रीयता के प्रतीक तथा मराठाकालीन अद्वितीय सैन्य रणनीति एवं भौगोलिक परिस्थितियों के साथ सामंजस्यतापूर्ण स्थापत्य एवं वास्तु कौशल इन किलों की मुख्य विशेषताएं हैं। अपने समय में ये किले मराठा साम्राज्य की रक्षा प्रणाली की रीढ़ थे। इन किलों में मंदिर, जल संरक्षण, गुप्त जलस्रोत, अन्न भंडार कक्ष एवं प्रजा के लिए सुरक्षित आश्रय का निर्माण किया गया था। इनके निर्माण के पीछे एक स्पष्ट उद्देश्य, यथा शत्रु को चकित करना, व्यापार की रक्षा, गुप्त रणनीति, आम्मसम्मान की रक्षा आदि निहित रहता था। लेखिका द्वारा यह बताने की चेष्टा की गयी है कि प्रत्येक किला अपने आप में एक जीवन्त गाथा छिपाये हुए है। ये अप्रतिम योद्धा वीर शिवाजी के साहस, संघर्ष एवं उनकी दूरदर्शिता का गायन करते प्रतीत होते हैं। शिवाजी के इन बारह किलों को यूनेस्को द्वारा किलों को विश्व धरोहर घोषित कर विश्व विरासत सूची में सम्मिलित करते हुए ‘मराठा सैन्य परिदृश्य’ को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता प्रदान की गयी है। इनमें दर्ज इतिहास को सार्वभौमिक ज्ञान की धरोहर माना गया है। अब ये किले वैश्विक मंच पर अद्वितीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व के प्रतीक बन गये हैं।

पुस्तक के लेखन में शुद्ध, साहित्यिक, प्रांजल एवं कहीं-कहीं काव्यमयी भाषा का प्रयोग किया गया है। उत्तुंग, अभेद्य, अजेयता, दुर्गम जैसे संस्कृतनिष्ठ शब्दों का प्रयोग तथा अद्भुत वाक्य-विन्यास रचनाकार की लेखन-क्षमता एवं लेखन की स्तरीयता को प्रदर्शित करते हैं। विषयवस्तु औपन्यासिक शैली में आकर्षक ढंग से प्रस्तुत की गयी है। विभिन्न परिदृश्यों का चित्रण नितान्त स्वाभाविक बन पड़ा है। सरल, सहज एवं प्रवाहमयी भाषा तथां रोचक शैली युक्त विषयवस्तु पाठक को निरन्तर बाँधे रखती है।

लेखिका पाठकों से सीधा संवाद करती हुई प्रतीत होती हैं। पुस्तक की भाषा-शैली पर दृष्टिपात हेतु कुछ अंश उद्धृत हैं-‘‘इन किलों को केवल पत्थर मत समझिए। हर पत्थर में कोई वादा है, कोई प्रतीक्षा, कोई अपूर्ण प्रार्थना। किसी दीवार पर तलवारों की रगड़ है, किसी प्राचीर के पीछे घोड़े की हिनहिनाहट, पर सबसे अधिक, इन सबके बीच एक मौन है… (पृ.-26)’’, ‘‘चारों ओर से यह किला दुर्गम चढ़ाईयों और तीव्र खाइयों से घिरा है। इसकी प्राकृतिक और स्थापत्यिक बनावट शत्रु के लिए चढ़ाई को अत्यंत कठिन बनाती थी-यही इसकी अजेयता का रहस्य रहा। (पृ.-33)’’, ‘‘रायगढ़ केवल पत्थर और कंक्रीट का निर्माण नहीं था, बल्कि सुव्यवस्थित योजना और सशक्त रक्षा तंत्र का प्रतीक था। शिवाजी महाराज ने इसे सैन्य ही नहीं, बल्कि प्रशासनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण केंद्र बनाने का संकल्प लिया था। (पृ.-47)’’, “समय वास्तव में बहुत कुछ बदल देता है। वह स्मृतियों को धुँधला करता है, नामों को पीछे छोड़ देता है और कई बार घटनाओं को भी नए अर्थ दे देता है। फिर भी सह्याद्रि की पर्वतमालाओं और उनसे जुड़े किलों को देखते हुए यह अनुभव होता है कि कुछ निर्णय समय के साथ कमजोर नहीं पड़ते। (पृ.74)’’

यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं प्रतीत होता है कि यह कृति लेखिका के विशिष्ट ऐतिहासिक विषय पर श्रमपूर्वक किये गये कार्य एवं शोध का परिणाम है। इस दृष्टि से पुस्तक पठनीय, सराहनीय एवं संग्रहणीय है। पुस्तक का मुद्रण एवं अन्य तकनीकी पक्ष उत्तम कोटि का है। आवरण पृष्ठ भी विषयानुरूप है। इस प्रकार की श्रेष्ठ कृतियां प्रकाशन की स्तरीयता एवं लोकप्रियता को भी प्रभावित करती हैं।

पुस्तकः पत्थर बोल उठे, लेखिकाः डॉ. प्रमिला वर्मा, प्रकाशकः गुफ़्तगू पब्लिकेशन, प्रयागराज
पृ.सं.: 212, मूल्यः 550 रूपये