न्‍याय का मंदिर – धर्मस्‍थल

Temple of Justice - Dharmasthala

सुनील सक्‍सेना

किसी भी रचना का शीर्षक पाठक के लिए उस रचना में प्रवेश करने का मुख्‍य द्वार होता है । उपन्‍यास के शीर्षक “धर्मस्‍थल” से यह लगता है कि उपन्‍यास किसी उपासना स्‍थल को पृष्‍ठभूमि में रखकर लिखा गया है । या किसी पूजा स्‍थल में रखे किसी विग्रह के इर्दगिर्द रचा गया है । लेकिन उपन्‍यास के पहले पन्‍ने की शुरूआती लाइन्‍स में ही यह भ्रम दूर हो जाता है जब कथानायक कामिल अपने मित्र विजन को बताता है कि धर्मस्‍थल वो जगह है जहां मनुष्‍य को न्‍याय मिलता है ।

कोर्ट-कचहरी न्‍याय के मंदिर हैं । सबसे बड़ा धर्म न्‍याय है । न्‍याय करने वाला और दण्‍ड देने वाला है “धर्माधिकारी” । धर्मधिकारी का कर्तव्‍य है कि वो ये सुनिश्चित करे कि दोषी बच न जाए और निर्दोष को सजा न हो । नीति, नियम, नैतिकता और सदाचार की रक्षा के लिए ही धर्मस्‍थल बने हैं । मनुष्‍य के लिए ईश्‍वर के बाद उसके आस्‍था का केंद्र ये धर्मस्‍थल और धर्माधिकारी ही हैं ।

प्रियंवद के इस उपन्‍यास में साक्ष्‍यों पर टिकी न्‍याय व्‍यवस्‍था को लेकर वाजिब चिंताएं हैं । सबूतों के आधार पर लिए जाने वाले फैसलों की उन गुंथी हुई पहेलियों के उत्‍तर ढूंढने की ईमानदार कोशिश है । इन धर्मस्‍थलों में कभी कोई साक्ष्‍य को नहीं मानता है तो कभी कोई प्रमाण नहीं स्‍वीकारता है । गवाह बिक जाते हैं । कभी-कभी नंगी आंखों से देखा गया सत्‍य भी साक्ष्‍यों, गवाहों के दांव पेंचों से, कोर्ट- कचहरी के भीतर होते घात-प्रतिघात से झूठा साबित हो जाता है ।

लाओत्‍से ने कहा भी है कि “जो कहा जा सकता है वह सच नहीं हो सकता और जो सच है वह कहा नहीं जा सकता” । हाशिए पर ढेल दिए गए सच तक पहुंचने के लिए अदालतों में संदेह और संशयों के बीच इसे ढूंढने की प्रविधि पर प्रश्‍न खड़े किए जाते रहे हैं । शायद इसीलिए कहा जाता है कि आदलतें फैसला सुनाती हैं, इंसाफ वक्‍त करता है ।

प्रियवंद अपनी रचनाओं में दृश्‍यों का संयोजन, परिवेश की डिटेलिंग किसी आर्ट फिल्‍म के डायरेकटर की तरह करते हैं । मसलन कोई बोसीदा इमारत की बात हो तो दीवारों पर जमी काई, दरारों के बीच से उग आए पौधे, टपकती छतें, धूल में सने-पुते लटकते बिजली के बेतरतीब तार आदि से वो ऐसा मंजर बना देते हैं कि पल भर के लिए पाठक अग-जग भूलकर उसी इमारत के अंदर कहीं टहलने लगता है ।

मंदिरों में बज रही घंटियां हों या मस्जिदों से उठ रही अजान की गूंज ऐसे दृश्‍य रचते वक्‍त प्रियवंद की कलम ऊंचे मयार पर होती है, जहां हर कहानीकार अपने दिल में पहुंचने की हसरत पाले बैठा होता है । पाठक उनके रचे इंद्रजाल में एक बार प्रवेश कर जाए तो उसे जल्‍दी मुक्ति नहीं मिलती जब तक की वो किताब को पूरा न पढ़ ले ।

नायक कामिल के जीवन में गंभीर अर्थपूर्ण प्रेम भी है दाक्षायणी के रूप में । बिल्‍कुल उमर खैयाम की रूबाइयों वाला गहन प्‍यार । मगर ये मोहब्‍बत अपनी मंजि़ल-ए-मक़सूद तक नहीं पहुंचती है । कामिल-दाक्षायणी का प्‍यार दोनों की ही स्‍मृतियों में जीवित रहता है ।

प्रियंवद ने कामिल के मूर्तिकार पिता के माध्‍यम से सृजन की प्रक्रिया का उम्‍दा विश्‍लेषण किया है । किसी कृति को जन्‍म देने के लिए रचनाकार कई बार जीता है मरता है तब जाकर कहीं रचना मुकम्‍मल होती है । फिर से गढ़ने के लिए पूर्व में रचे की हत्‍या करनी होती है । तब अगली रचना का भ्रूण जन्‍म लेता है ।

प्रियंवद चिंतनपरक लेखन और जटिल कथा शिल्‍प के लिए जाने जाते हैं । बावजूद इसके वे अनूठे कहानीकार हैं । लेखन के पुराने और परीक्षित नुस्‍खों को परे रखते हए वे कलात्‍मक प्रयोगधर्मिता के लिए जाने जाते हैं । उनके पास किरदारों को साधारण से विशेष बना देना का हुनर है । पढ़ते वक्‍त लगता है उनके किरदारों से हम अपने जीवन में कभी न कभी टकराए जरूर हैं । प्रियंवद अच्‍छे कलमनवीस हैं जो बिना किसी शोर शराबे के अपनी बात कहते हैं । ये उपन्‍यास पाठक के लिए नए विमर्श के लिए गवाक्ष खोलता है । उपन्‍यास लेखन ओडिसी की तरह है जो कलात्‍मक धैर्य की मांग करता है । प्रियंवद इस पैमाने पर खरे उतरते हैं । धर्मस्‍थल उपन्‍यास इसकी तस्‍दीक़ करता है ।